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धर्म क्या है

Posted On: 22 Oct, 2010 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

atharvavedamanoj

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अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देव्मृत्विज्म|

होतारं रत्नधातमम||

अर्थात- यज्ञ के जो हैं पुरोहित रित्विकों के देव हैं,

और होताओं को देते रत्न जो उनको नमन||

प्रथमतः मैंने यह विचार किया की कम से कम मैं तो धर्म की कोई चर्चा ही नहीं करूँगा,किन्तु सर्वोच्च सत्ता ने पुनः हस्तक्षेप किया,अन्तः से स्फुरणा हुई कि नहीं लिखना ही पड़ेगा|मरता क्या न करता? ‘’निमित्तमात्रं भाव सव्यसाचिन”|उसके आदेश कि अवहेलना करना किसके बस कि बात है?

सीधे विषय पर आते हैं – धर्म किसे कहते  हैं? यह ऋग्वेद के प्रथम मंडल के प्रथम सूक्त में ही स्पष्ट कर दिया गया है और इसके स्पष्टीकरण के लिए चरों वेद,अठारह पुराण,ब्राह्मण,उपनिषद,उपपुराण,रामायण,महाभारत इत्यादि ग्रंथों कि रचना कि गई,फिर भी या तो प्रश्न उलझता ही गया अथवा उसे जानबूझ कर राक्षसी उद्देश्यों कि प्राप्ति के लिए उलझा दिया गया|वैसे भी स्थूल बुद्धि,सूक्ष्म चीजों को कैसे ग्रहण कर सकती है? “द्वापर” में जब मैथिलि शरण गुप्त लिखते हैं –

धर्म एक बस अग्नि धर्म है-

जो आवे सो क्षार|

जल भी उड़े वाष्प बन करके,

मल भी हो अंगार||

तो वह कुछ और नहीं बस धर्म कि ही बात करते हैं| पता नहीं उन्होंने यह महानतम बात कंस जैसे दुरात्मा के मुख से क्यों कहलवा दी? इसके विपरीत इसी काव्य में कृष्ण का क्राइस्टीकरण करते हुए मात्र एक पद जोड़ा गया है, वह भी “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज” का पद्यानुवाद कर कवि के दाइत्व से मुक्ति के रूप में| शायद उस समय भी सत्य का पक्ष लेने वालों को कंस समझा जाता रहा हो?

जब ‘’देव्य्थर्वशीर्षोपनिषद’’ में ‘’तां दुर्गा दुर्ग्माम देवीं दुराचारवघातिनिम” अर्थात दुराचार का दमन करने वाली वह दुर्गा हैं कहा जाता है,तब धर्म कि चर्चा होती है|जब ऋग्वेद में ‘’अहं रुद्राय धनुरातनोमी ब्र्म्ह्द्वइषे शरवे हन्तवा उ” अर्थात मैं ही ब्र्म्ह्द्वेषियों का वध करने के लिए रूद्र का धनुष तानती हूँ कहा जाता है, तब धर्म कि चर्चा होती है| कृष्ण ने कभी नहीं कहा कि मैं धर्म हूँ, उन्होंने कहा ‘’धर्मसंस्थापनार्थाय” ‘To maintain the supreme order” धर्म कि संस्थापना के लिए|राम ने कभी नहीं कहा कि मैं धर्म हूँ, लेकिन जब उन्होंने कहा ‘’निशिचर हीन करहूँ माहि,भुज उठाय प्रण कीन्ह’’ तब वे धर्म कि बात करते हैं| सामान्यतया यहाँ भी और अन्यत्र भी धर्म के लक्षणों कि ही चर्चा कि जाती है धर्म कि नहीं| हमारे बहुत से धर्मगुरु भी पता नहीं किस भावना के चलते यह धर्म लोगों को नहीं बताते|

आप कहीं भी देख लीजिए एक ही बात कही गई है,’’पाप को भी मारो और पापी को भी मारो” यहाँ तक कि ‘’पुर्जा पुर्जा कटी मरे,तबहु न छाँड़े खेत”कि भावना के साथ| जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा कि ‘’जिन मनुष्यों का विचार क्षण प्रतिक्षण बदलता रहता है,वे दुर्बल हैं उनका कोई आत्मबल नहीं” तब वे धर्म कि ही चर्चा करते हैं|इसके विपरीत जब लोग कहते हैं कि विविध धर्मों के मध्य भावात्मक एकता के तत्व विद्यमान हैं तब वे सरासर झूठ बोलते हैं,एकदम गलत| अगर मुझे कहना हो तो मैं यह कहूँगा कि विविध मतों के मध्य भावात्मक एकता के तत्व विद्यमान हैं,आप धर्म को नहीं समझ सकते|

कुछ लोग ओं को धर्म मानते हैं| कौन सा ओं? ऋग्वेदियों का प्रणव,यजुर्वेदियों का ओंकार सामवेदियों का उद्गीथ बौद्ध,जैन,सिक्ख,इस्लाम,ईसाईयत सभी में तो ओं है|आप अ,उ,म को अलिफ़,लाम,मीम कर दे तो क्या भावना बदल जायेगी?नहीं| यह है भावात्मक एकता|तुम्हे नहीं पता तो लो मैं बताता हूँ| “क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैती तदैव रूपम रमणीयताया” जो प्रतिपल नवीन हो वह धर्म है|ऐसा नहीं कि हजरत ने जो कह दिया अब उसमे संशोधन कि कोई गुंजाइश नहीं और जो भी इसके विरुद्ध बोलेगा उसका सर कलम कर दिया जाएगा|यह तो सरासर अधर्म है,पाखंड है,रुढिवादिता है और ऐसी कुत्सित विचारधारा का विनाश होना ही चाहिए|

अगर कोई यह कहता है कि सम्पूर्ण विश्व में मात्र एक ही तरह कि विचारधारा होनी चाहिए तब यह अधर्म है और यदि कोई कहता है कि एक राज्य में एक ही तरह कि विचारधारा होनी चाहिए , तब यह धर्म है| क्योंकि विश्व में अलग अलग तरह कि विचारधाराओं के मंथन से सुविचार प्राप्त होंगे और एक ही राज्य में अनेक विचारधाराओं कि उपस्थिति से राज्य कि प्रभुसत्ता संकट में पड़ जायेगी| यह हुआ राजनैतिक धर्म और यदि इस लिहाज से देखा जाय तो आंबेडकर जी गाँधी से अधिक धार्मिक नजर आयेंगे क्योंकि वे गांधीवादी पाखंड के विरुद्ध शुद्ध  धार्मिक बात किया करते थे|

यह तो उल्टी बात हुई|व्यास जी कहते हैं “’परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम” और गोस्वामी जी कहते हैं ‘’परहित सरिस धर्म नहीं भाई” और आप लड़ने को धर्म मान रहे हैं| हाँ, बिलकुल  ऐसा ही है| देखो मैंने भी व्यास और तुलसीदास के विपरीत नहीं कहा| अब आप परोपकार मानते किसे हैं? सड़क पर हृदयाघात से पीड़ित व्यक्ति को कराहते छोड़ देना अधर्म है, लेकिन आप खुद ही तो बाईपास सर्जरी करने नहीं लगेंगे| फिर, रोगी को आस्पताल पहुंचा देना धर्म है और खुद ही डाक्टरी करने लगना अधर्म है| आपको लेटने और डार्लि को पढ़ना पड़ेगा| पुलिस, डाकू का परोपकार करने लगे|भिखारी,भिखारी का परोपकार करने लगे| रोगी, रोगी का परोपकार करने लगे तो क्या आप इसे धर्म कहेंगे? और क्या यह संभव है?

कुछ लोग भक्ति को ही धर्म मानने लगे है| रुद्राक्ष कि माला लेकर मैंने भी गायत्री का तांत्रिक जप किया है| यह तो धर्म पर चलना हुआ नहीं…हाँ …अब जो मैं कर रहा हूँ वह धर्म पर चलना है| स्पष्ट है ‘’श्रवणं,कीर्तनं विष्णो” धर्म नहीं है…मात्र धर्म का एक अंग है| जब शचीन्द्र नाथ सान्याल कहते हैं “लड़ीबो, मरिबो, मारीबो, मानिबो ना” तब वह धर्म होता है| “ Power flows from the barrel of the gun” अधर्म है किन्तु GUN धर्म है| फिर उल्टी बात, अरे भैया परशुराम ने कहा है फरसा ही धर्म है “अग्रश्चतुरोवेदा पृष्टतः सशरंधनु,उभयोरपि समर्थानाम शापादपि, शरादपि” अर्थात धनुष बाण और वेद दोनों धर्म है| अभी भी समझ में नहीं आया| अरे मुर्ख! अन्याय का मूलोच्छेदन ही धर्म है| धर्मः धारयते प्रजानाम  अर्थात धारण करने वाला धर्म तो फिर धर्मो रक्षति रक्षितः अर्थात इसकी रक्षा करो क्योंकि यह तुम्हारी रक्षा करेगा|

शेष फिर कभी

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