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नारद गुरु 3

Posted On: 29 Mar, 2010 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

atharvavedamanoj

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जगदीश्वर की कृपा से नारद गुरु बिना कोई भाड़ा दिये काशी पहुँच गये।काशी के महाश्मशान मेँ अनेक लाशेँ जल रही थी।मृत्युलोक मेँ मृत्यु ही अंतिम सत्य है,यह जानते हुए भी प्राणी अपने आपको अमर समझ कर, स्वयं को धन,जन और बाहुबल से संपन्न करने हेतु वह सबकुछ करता है,जो उसे नहीँ करना चाहिये और जब अंतिम समय आता है तो उसे जगत की निस्सारता का बोध होता है और अंततोगत्वा वह हाँथ मल कर रह जाता है। महाश्मशान के वातावरण ने नारद गुरु के मन मेँ तीव्र वैराग्य का भाव जागृत कर दिया। ठीक इसी समय श्मशान की उद्विग्नता को चीरती हुई मधुर स्वर लहरी नारद गुरु के कानोँ से जा टकरायी? रात्रि का गहन अंधकार, कालरात्रि को प्रिय नवरात्रि की सप्तमी तिथि, महाश्मशान का भयानक परिवेश और उस पर मधुर वाद्य की मंगल ध्वनि ? आखिर यह सब क्या है ? उत्कंठा और जिज्ञासा नारद की पहचान है, फिर भला वह अपने आपको आगे बढ़ने से कैसे रोक पाते? वे ध्वनि की दिशा मेँ आगे बढ़े और उत्सव स्थल पर पहुँचते ही सारा माजरा उनके समझ मेँ आ गया। दरअसल सप्तमी तिथि के उपलक्ष्य मेँ मसान काली का श्रृंगार किया गया था और मसान काली के उपासकोँ ने इस अवसर पर नगरवधुओँ को बुलाकर नृत्य और संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया था। नारद गुरु संगीत-प्रिय तो हैं ही,लिहाजा वे वहीँ रुक गये और संगीत का आनंद लेने लगे। काऽ गुरु! ई कऊन मदारी आई गईल हौ? दर्शकोँ मेँ से किसी ने नारद गुरु को इंगित करते हुए कहा। का बताईँ गुरु? देक्खै में तऽ कुछ-कुछ नारद गुरुआ के तरे लगत हौ? का गुरु तू नारद हउआऽ? नारद गुरु को काटो तो खून नहीँ,कहाँ तो वे मंच पर थिरकते नर्तक और नर्तकियोँ के मुँह से “लव सेक्स और धोखा डार्लिँग लव सेक्स और धोखा” सुनने मेँ व्यस्त थे और कहाँ कल के एक सिरफिरे लौँडे ने उनके अज्ञातवास को सार्वजनिक सभा मेँ परिवर्तित कर दिया।ऐ लौँडे! चल मेरे साथ। नारद गुरु ने उस युवक की कलाई पकड़ी और उसे भीड़ से खींचते हुए बाहर ले आये। ऐ युवक! चुप रह,अब आगे से तुमने मुझे सबके सामने नारद गुरु के नाम से संबोधित किया, तो समझ ले कि ऐसा श्राप दूँगा कि तेरी सातोँ पुश्तेँ अंधी पैदा होँगी। नारद गुरु ने आँखे तरेर कर कहा। श्राप की बात सुनकर युवक बेचारा सुकुड़दुम्म हो गया। उसने डरते हुए कहा,’लेकिन गुरु! तोहार ई स्टाइलवा कहाँ जाइ? तोहके तऽ कउनोँ मिला देक्खतै चीन्ह जाइ। अब नारद बड़े सोच मेँ पड़ गये। उन्हेँ कलियुग का वातावरण थोड़ा-थोड़ा भाने लगा था। उन्होँने सोचा कि तीनोँ लोक मेँ तम्बूरा लेकर नारायण-नारायण रटते रहना यूँ भी बेरोजगारी से अधिक और कुछ नहीँ।क्योँ न हमेशा के लिये इस कलियुग मेँ इसी भूलोक पर सेटल हो जाया जाये? वैसे भी भगवान विष्णु तीनोँ लोकोँ के अधिपति हैँ,जब भी उन्हेँ धरती का समाचार जानने की इच्छा होगी वे स्वर्गलोक से मुझे कान्टेक्ट कर लिया करेँगे, और नारद ने यह सारी बातेँ टेलीपैथी के जरिये भगवान विष्णु तक पहुँचा दी।भगवान विष्णु ने भी सोचा, चलो पिंड छूटा। हर समय मेरे नाम का पासपोर्ट लेकर जब देखो तब स्वर्गलोक के एडमिनिस्ट्रेटिव जोन मेँ घुस जाया करता था।लेकिन इस बार की नारद लीला पर भगवान विष्णु मुस्कुराये बिना नहीँ रह सके और कहा जा बच्चू जा, इस बार के कलियुग मेँ ही तो तुझे आटे दाल का भाव मालूम होगा। नारद गुरु ने अपने आपको सँभाला और युवक की ओर मुखातिब होकर कहा,’युवक! अब मुझे यह बताओ कि मुझे अपना व्यक्तित्व बदलने के लिये क्या करना होगा? ताकि मुझे पृथ्वी लोक का कोइ भी प्राणी पहचान न सके। वैसे भी बड़े हैरत की बात है कि न तो लखनऊ मेँ लोगोँ ने मुझे पहचाना और न ही मायावती मेँ,आखिर तुमने मुझे पहचान कैसे लिया? युवक समझ चुका था कि नारद गुरु अब उसके पैतरे मेँ आ चुके हैँ और अब इस दाँव को खोना हाँथ आई लक्ष्मी से अपने ही हाँथोँ हाँथ धो देना है। उसने अकड़ते हुए कहा,देखलाऽ कुल सराप ओराप भुलाइ गइला, अब तोहके चारि ठे वचन देवै के होइ,पहिला,हम तोहके नारद गुरु कहि सकिला.दूसरका तोहके हम्मैँ गुरु मानै के होइ.तीसर तोहके हमरे रोजी-रोटी क जुगाड़ करै के होइ अउर अंतिम हमहुँ तोहरे संघे जहाँ चाहीँ जाइ सकीँ।नारद गुरु के सामने एवमस्तु कहने के अलावा और कोइ चारा भी नहीँ था।इस तरह से सर्वविद्या की राजधानी काशी मेँ नारद गुरु की कलियुगोपयोगी व्यावहारिक शिक्षा प्रारंभ हुई।

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