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शिक्षक हौं सिगरे जग को

Posted On: 14 Jan, 2012 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

atharvavedamanoj

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संसार के समस्त धर्मों ने, सभी प्रकार की राजनैतिक,आर्थिक,सामाजिक ,मनोवैज्ञानिक  और दार्शनिक विचारधाराओं ने शिक्षा को व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक अपरिहार्य अंग माना है|ओरियंटलिज्म के समर्थकों के अनुसार भूतकाल में भारत विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित रहा है|शिक्षा के स्वरूप और उसके उद्देश्यों को लेकर भले ही विवाद रहा हो इतना तो निर्विवाद रूप से सत्य है की शिक्षा परिवर्तन की सबसे बड़ी संवाहिका है और इस मुद्दे पर सभी एकमत है|इसके बावजूद वर्तमान में भारत में शिक्षा की स्थिति उत्साहजनक नहीं है|२०११ की नवीनतम जनगणना के अनुसार पूरे भारत में मात्र 74.4 प्रतिशत लोग ही साक्षर है और उत्तर प्रदेश में तो यह राष्ट्रीय औसत से भी काफी नीचे मात्र ६९.७२ प्रतिशत है|हमें यह नहीं भूलना चाहिए की एक समय इसकी गणना प्रसिद्ध बीमारू राज्यों के अंतर्गत की जाती थी और स्थितियां आज भी कमोवेश वैसी ही हैं जैसी आज से दश साल पहले थी|

प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में लगभग १ लाख ९० हजार प्राथमिक शिक्षकों के पद रिक्त है, जून २०१२ में लगभग ८० हजार नए शिक्षकों की आवश्यकता होगी, कुल मिलाकर यह संख्या २ लाख ७० हजार के आस पास बैठती है|सर्व शिक्षा अभियान के और निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के अन्तर्गत ६ से १४ साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा एक मूल अधिकार है|उन्नीकृष्णन बनाम संघ के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने संविधान के अनुच्छेद २१ और अनुच्छेद ४५ को जोड़कर यह निर्णय दिया की जीवन रक्षा का अधिकार शिक्षा के अधिकार के बिना अधूरा है|शिक्षा एक मौलिक अधिकार भी है और राज्य के निति निर्देशक तत्वों में वर्णित एक अनुल्लंघनीय उपबंध भी|

इसके बावजूद लगभग सभी सरकारों ने न सिर्फ इस मूल अधिकार को लटकाए रखा वरन शिक्षा के संदर्भ में घालमेल की निति अपनाते हुए पूरे प्रदेश में शिक्षा विशेषकर प्राथमिक शिक्षा को रसातल में चले जाने को विवश कर दिया|पूरे देश में शिक्षा विशेषकर प्राथमिक शिक्षा में योग्य अध्यापको की भारी कमी को देखते हुए और अध्यापन का कार्य कर रहे अध्यापको में न्यूनतम शैक्षिक अभिरुचि उत्पन्न करने तथा न्यूनतम शैक्षिक अभिरुचि वाले अध्यापकों को सरकारी शिक्षण संस्थानों में नियुक्त करने हेतु राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने राष्ट्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा का प्रावधान किया और राज्यों को यह निर्देश दिया की वे यदि चाहे तो अपने अपने राज्यों में पृथक पृथक शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करवा सकते हैं अथवा राष्ट्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को सीधे अपने अपने राज्यों में नियुक्त कर सकते है|NCTE के प्रावधान में यह भी कहा गया की मात्र दिसम्बर २०११ तक शिक्षा स्नातक भी प्राथमिक विद्यालयों के लिए CTET अथवा PTET(Provincial Teacher Eligibility Test) में बैठने हेतु अर्ह हैं और उक्त अंतिम तिथि के बाद शिक्षा स्नातक प्राथमिक विद्यालयों के लिए न्यूनतम अर्हता न रखने के कारण अनर्ह हैं|ध्यान देने योग्य बात तो यह है की न तो केन्द्र सरकार और न ही राज्य सरकार NCTE के उक्त प्रावधानों के अंतर्गत कोई नियुक्ति करवा सकी है|हमें यह भी ध्यान में रखना होगा की  NCTE शिक्षक चयन के सन्दर्भ में मात्र न्यूनतम योग्यता निर्धारित करती है और राज्य सरकार चाहे तो अपने विवेक से उच्चतम योग्यता निर्धारित कर सकती है|इसके अलावा शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है जिस राज्य सरकार को भी केन्द्र के सापेक्ष कानून बनाने का अधिकार है|

इन्ही सब प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने लगातार २०१० से हीला हवाली करते हुए अंततः दिनांक १३ नवम्बर २०११ को दो चरणों में उत्तर प्रदेश अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित करवाई और दिनांक  २५ नवम्बर २०११ को देर रात परिणामों की घोषणा भी कर दी|माध्यमिक शिक्षा परिषद ने पारदर्शिता बरतते हुए  CTET के विपरीत प्रत्येक अभ्यर्थी को उनके उत्तर पत्रक की कार्बन कॉपी भी उपलब्ध करवाई थी, जिससे अभ्यर्थी अपने उत्तर पत्रक का मिलान कर सके|उत्तर पत्रक का मूल्यांकन करने में अनियमितता हुई और साथ ही याचिकाओं का अंतहीन दौर भी प्रारंभ हुआ|माध्यमिक शिक्षा परिषद ने अपनी गलती को स्वीकार करते हुए माननीय उच्च न्यायालय के सम्मान में सम्पूर्ण उत्तर माला का पुनर्मूल्यांकन किया और न्यायालय के आदेश के क्रम में १०० रूपये शुल्क के साथ मूल्यांकन से असहमत अभ्यर्थियों से प्रत्यावेदन मगवाये|परिषद को २६००० प्रत्यावेदन प्राप्त हुए|जिन पर विचार करने के उपरान्त दिनांक ११ जनवरी २०१२ को संशोधित परीक्षाफल प्रकाशित कर दिया गया|

इस संदर्भ में बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा आनन फानन में नियुक्ति के लिए २९ नवम्बर २०११ को प्रथम विज्ञप्ति जारी की गयी|विज्ञप्ति में यह प्रावधान किया गया की प्रत्येक अभ्यर्थी अपनी पसंद के अधिकतम ५ जनपदों में आवेदन करेगा और प्रत्येक जनपद में ५०० रूपये का ड्राफ्ट संलग्न करेगा साथ ही विभिन्न  DIET’s पर प्राप्त आवेदनों को अभ्यर्थियों के पात्रता परीक्षा में प्राप्त अंकों को आधार मानते हुए अवरोही क्रम में रखा जाएगा और एक समान अंक अर्जित होने पर आयू को आधार मानते हुए नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी की जायेगी|इस विज्ञप्ति से असंतुष्ट कम अंक प्राप्त अभ्यर्थियों ने उच्च न्यायालय में याचिकाओं पर याचिकाएं दायर की और सम्पूर्ण प्रक्रिया को मजाक की एक वस्तु बना कर रख दिया|सरिता शुक्ला एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में विद्वान न्यायाधीश ने उक्त विज्ञप्ति को संविधान के अनुच्छेद १४ तथा अनुच्छेद १९ के विरुद्ध मानते हुए पूर्व विज्ञप्ति को ख़ारिज कर दिया|माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में परिषद ने संशोधित विज्ञप्ति जारी की जिसमे प्रत्येक अभ्यर्थी को उत्तर प्रदेश के समस्त जनपदों में अभ्यर्थन करने की स्वतंत्रता प्रदान की|इधर NCTE द्वारा प्राथमिक शिक्षक नियुक्ति हेतु राज्य को दी गयी समय सीमा बीती जा रही थी उधर विधानसभा चुनाव कोढ़ में खाज बनकर आ गया|जबकि यदि पहली विज्ञप्ति को आधार माना जाय और इससे भी पहले राज्य में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए घोषित शासनादेश को आधार माना जाय तो यह समग्र नियुक्ति प्रक्रिया आदर्श चुनाव संहिता के दायरे के बाहर है और इस आधार पर ऐन मतदान के दिन हुई नियुक्ति को भी संवैधानिक आधार पर कोई बाधा नहीं है|

अभी UPTET प्राप्तांकों को मेरिट बनाये जाने सम्बन्धी याचिका न्यायालय में लंबित है जिसे लेकर परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त अभ्यर्थी निराशा में है कितु मैं नहीं समझता की इस याचिका के पीछे संविधान की शक्ति भी है|आज पूरे विश्व में शिक्षा में नवाचार और शिक्षा के मानकीकरण के लिए द्रुत गति से प्रयास हो रहे हैं|मानव संसाधन विकास मंत्री ने भी मूल्यांकन और पाठ्यक्रम में एकरूपता लाये जाने पर बल दिया है ऐसी स्थिति में अकादमिक को अधिक महत्व प्रदान करना स्वयं में हास्यास्पद है और यह बात तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब देश के विभिन्न राज्यों के अलग अलग बोर्ड,केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद और ICSE अलग अलग तरीके से मूल्यांकन करते है और एक ही बोर्ड अलग अलग सत्रों में अलग अलग मूल्यांकन करती है यहाँ तक की पृथक पृथक विश्वविद्यालयों द्वारा अपने विद्यार्थियों को पृथक पृथक अंक प्रदान किये जाते हैं|यह सर्वविदित है की मूल्यांकन में प्रायोगिक विषयों के सापेक्ष सैद्धांतिक विषयों में कम उदारता बरती जाती है|ऐसे में प्रतियोगी परीक्षा ही चयन का सर्वाधिक वैज्ञानिक विकल्प है|

UPTET की मार्ग में आने वाली लगभग सभी बाधाओं का निवारण हो चुका है और यह आशा की जानी चाहिए की राज्य सरकार इसे संज्ञान में लेते हुए ७३,८२५ अभ्यर्थियों के हित में इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरी करवाएगी और संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों की अक्षुण्णता सुनिश्चित करेगी|

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