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एक कविता लिख रहा हूँ मीडिया तेरे लिए

Posted On: 22 Apr, 2010 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

atharvavedamanoj

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एक कविता लिख रहा हूँ मीडिया तेरे लिए।
तू प्रबल है, तू प्रखर, उद्दाम है तेरी लहर।
जोड़ती है विश्व को तू गाँव से लेकर शहर।
एक अर्न्तजाल से तूने चराचर विश्व जोड़ा।
चल पड़ा युग उस तरफ रुख तूने उसका जिधर मोड़ा।
किँतु तूने भी सदा अन्याय के फेरे लिये।
एक कविता लिख रहा हूँ मीडिया तेरे लिये।

तूने प्रेरित कर हमेशा नव्य आंदोलन रचा है।
गेँद सा हाँथोँ मेँ तेरे विश्व यह सारा बसा है।
लेखनी से तू सदा इतिहास का निर्माण करती।
विश्व रुपी चित्रपट पर तूलिका से रंग भरती।
दीप सारे ही बुझा कर आज अंधेरे किये।
एक कविता लिख रहा हूँ मीडिया तेरे लिये।
एक जरा सी बात को तू तूल देती है हमेशा।
राष्ट्र मेँ तू रच रही है नित नया क्यूँ इक बखेड़ा।
जो असंगत हो उसे सेँसर करो छपने न पाये।
फिर बतंगड़ बात का कोई नया बनने न पाये
भारती के भाल पर तू बाल दे अगणित दिये।
एक कविता लिख रहा हूँ मीडिया तेरे लिये।
कला,संस्कृति,धर्म की,साहित्य की खबरेँ नहीँ हैँ।
लूट,हत्या,अपहरण या खेल,फिल्मोँ से भरी हैँ।
छिः घृणित यह पाप की प्रस्तुति बड़ी ही अटपटी है।
चटपटा है ढंग तेरा बात सारी चटपटी है।
तुझको आजादी मिली अभिव्यक्ति की किसके लिये?
एक कविता लिख रहा हूँ मीडिया तेरे लिए।

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