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कार्टून से संसद क्या, "इन्द्रासन डोलने लगता है"

Posted On: 21 May, 2012 Others में

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malik saima

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हम प्रत्येक भारतीय नागरिक,विशेषकर आज की युवा पीढ़ी के ह्रदय पर लौह-लेखनी ये ये अंकित कर देना चाहता हूँ,कि अव समय आ गया है,एक कालजयी दिशा परिवर्तन का,परिवर्तन सोच का,विचारों का,परंपरा का,समाज कि दिशा परिवर्तन का,आपसी सहयोग और समन्यवय का…………लोकतंत्र के वास्तविक मूल्यों,लोकतंत्र कि महिमा और गरिमा के अपना जीवन समर्पित करने का………….समर्पण और सत्याग्रह का.

देश को राजनीति और नेतागिरी ने “गतिहीन और पंगु” बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है,भारतीय राजनीति आम आदमी के लिए,आज “लज्जा और पतन ” का पर्याय बन चुकी है.

राजनीति के “नरमुंड” अर्थात नेतागढ़,देश क़ी जनता के लिए “रक्तपिपासु और नरपिशाच” के सामान हैं,ये नेता “अतीत के कफ़न-चोरों क़ी नयी फसल” है,और आमआदमी के कंकालों के कब्रस्तान पर,उसके ही कपाल अपने जूतों क़ी शय्या बनाकर,जनजागरण और समाज-कल्याण का थोथा आलाप कर रहे हैं.

इससे बड़ा दुर्भाग्य, उस राष्ट्र और नागरिकों का और क्या हो सकता है,जिसकी लगभग डेढ़ अरब आबादी के भाग्य का निर्धारण,संसद में बैठे आधे से अधिक अंगूठा-छाप और धोती-प्रसाद,मुन्ना भाई लोगों के हाथों में है.

ये वोही देश है,जहाँ क़ी युवा पीढ़ी अपने ज्ञान,शिक्षा,कौशल और तकनीक में सिरमौर है,और जिससे प्रतिस्पर्धा में सर्वशक्तिमान अन्य विकसित देशों के पसीने छुट्टे हैं,उस राष्ट्र के विकास और कल्याण के लिए,संसद में बैठे अंगूठा-छाप भाईलोग क्या ख़ाक करेंगे,क्या हमें देश क़ी डेढ़ अरब जनसँख्या में येही सबसे प्रतिभावान और योग्य प्रतिनिधि मिले……………..इन्हें प्रतिनिधि कहना भी,देश के पड़े-लिखे लोगों के मुंह पर तमाचा मारने के सामान है.

कुल के कलंक,कपटी कपाल के
काम के धाम के,दुश्मन अवाम के
कायर,कुपित,कर्कश कौए समान से



डाक्टर भीम राव अम्बेडकर का “कार्टून छापकर ” अगर वास्तव में किसी ने बाबा साहब और देश की अनुयायी जनता का मखौल उड़ाने की छिछोरी हरकत करते हुए,एन.सी.आर.टी. की पाठ्य-पुस्तक में प्रकाशित किया है……तो निश्चय ही इस हरकत कामना किसी “अखंड भारत के समर्पित नागरिक”से नहीं की जा सकती. डाक्टर अम्बेडकर की पहचान मात्र भारतीय संबिधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष और संबिधान निर्माता की ही नहीं,बल्कि एक युग पुरुष,महान नेता के साथ-साथ भारत की जनता की आस्था और आत्मा में रचे-वसे महान नायक,युग पुरुष की है.

विगत कुछ वर्षों से जब तब कोई न कोई कार्टून प्रकरण चर्चा में रहता है,और इसके आधार पर टुच्ची राजनीति की गोटियाँ भी सेंकी जाती हैं,चान्हें वो पैगम्बर मोहम्मद साहब का कार्टून हो,या एम्.ऍफ़. हुसैन द्वारा बनाए गए”हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न कार्टून “हों,या महात्मा गांधी का कार्टून के माध्यम से भद्दा मज़ाक बनाने का प्रयास रहा हो.

इधर आज-कल देश दुनिया में कार्टूनों ने माहौल गरमा रखा है,एक तो गर्मी से पारा वैसे ही आसमान छूने को उद्दत है,उधर संसद में “एक कार्टून” ने क़यामत वरपा कर रखी है……देश महान आत्माएं,जनता के प्रतिनिधि अर्थात भोले-भाले सांसदों का खून उबालें मार रहा है,जैसे किसी कारखाने में पिघला हुआ, लोहे का लावा.

आखिर उस कार्टून में जाने क्या “विशेषता या वुराई” है,के विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लौह-स्तम्भ अर्थात “विश्व की सबसे विशाल संसद” की अंतरात्मा को झंकृत कर दिया,एक पल में वर्षों से सोये कुम्भ-कर्णों नींद से जगा दिया,और वे जम्हाई लेकर अंगडाई लेते हुए,आग-बबूला होकर अग्नि-वाण से प्रहार कर रहे हैं,और कुछ प्योर आग के ज्वालामुखी बन पिघला लावा,राख और कालिख पोत रहे हैं.

चलो कार्टून के नाम पर ही सही,पर ये जागे तो,वारने कबसे सोये पड़े थे,और भारत की जनता की खून-पसीने की कमाई को ए.सी. में बैठकर बहा रहे थे.


संसद में बैठकर देश के जनप्रतिनिधि जब अनावश्यक हुल्लड़ वाजी करते हैं,तो उन्हें अस्मिता और मर्यादाओं का ध्यान नहीं रहता,संसद की एक घंटे की कार्यवाही लाखों रुपया खर्च होता है,पर इन्हें शर्म नहीं…….बेशरम और बेहया वेश्या से यदि ऐसे राजनेताओं की तुलना की जाए,तो ये वेश्या से भी गये-गुज़रे नज़र आयेंगे. यदि ये अपना बहुमूल्य योगदान संसद की सकारात्मक क्रिया-कलापों,और देश की समस्याओं के समाधान में खर्च करें तो शायद भारत की तस्वीर कुछ और ही होती.

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