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तेरी धोती मेरी टोपी से सफेद कैसे?

Posted On: 5 Sep, 2012 Others में

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malik saima

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अपनी बात यहाँ आपके समक्ष रखने से पहले,हम एक बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं,कि “धार्मिक कट्टरवाद,धार्मिक अतिवादिता,धर्म का अन्धानुकरण,धर्म के हिंसा,उत्पात,आतंकवाद,धर्म के नाम पर समाज में विषवमन,वितृष्णा,गुटवाजी,अलगावबाद फैलाना ,परिधर्म निंदा,धर्म के नाम पर हत्याएं,अपहरण,लूट करना किसी भी देश और समाज के लिए सबसे बड़ी समस्या,और विकास में सबसे बड़ा अवरोध है,बल्कि ये कहना भी अतिश्योक्ति पूर्ण नहीं है,कि धार्मिक उन्माद और अतिवादिता किसी राष्ट्र के एक “राष्ट्रीय विपदा” की स्थिति है, जिससे जूझना उस राष्ट्र के शासन और प्रशासन के किसी बड़े दुर्भाग्य से कम नहीं है.” दूसरी महत्वपूर्ण बात ये भी कहना चाहता हूँ,विश्व का कोई भी धर्म किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति अथवा पुश्तैनी बपौती नहीं है,धर्म निजी नहीं बल्कि सार्वजनिक विचारधारा और संस्कार/संस्था है,चांहे वो इस्लाम हो,हिन्दू हो,ईसाई अथवा सिख्ख धर्म हो,और चान्हें इनके इतर बौध,जैन,जर्स्तुर्थ अथवा अन्य कोई धर्म हो……………….प्रत्येक धर्म पर विश्व के प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है…….न कि इस्लाम धर्म पर केवल मुसलमान का,हिन्दू धर्म पर केवल हिन्दू केवल हिन्दू के कापीराईट अथवा पेटेंट अधिकारक्षेत्र की बात नहीं है……………धर्म पर किसी की ठेकेदारी नहीं है. ============================================================ किसकी धोती किसके कुरते से ज्यादा सफेद ? ये कथन खुद में ही एक विरोधाभास,एक संशय,और विघटनकारी भावना को समाहित किये हुए है,और ऐसी ही भावना विश्व का प्रत्येक धर्म का अनुयायी की सोच और विचार व् व्यवहार का आधार बनी हुई है,हर कोई अपने धर्म,अपने भगवान् और अवतार को सर्वश्रेष्ठ बताने में लगा हुआ है………………………………..किसी के भी भगवान् या ईश्वर ने लेश-मात्र भी कल्पना न की होगी,कि उसको पूजने वाले लोग ही,उसे शहर के आम चौराहे पर एक प्रतियोगिता का प्रतियोगी बना देंगे……………पर हमें क्या……………हमारी तो आदत ही हर चीज़ में मुकाबला या होड़ लगाने………………..हम अपना मुर्गा सदैव जिताना चाहते हैं,मनुष्य का विकास ही आपसी प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की उत्तर्जीवता के नियम की दें है,हम जानते हैं कि जो सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिमान है,भविष्य सुरक्षित उसी का है,कल तक टिकने और जीवित रहने की प्रत्याशा भी उसी की सर्वाधिक है……………………..सो हम अपने आपको और अपने भगवान् को सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित करने में लगे रहते हैं. कितना बड़ा दुर्भाग्य हैउस भगवान् का,जिसके अनुयायी उसे बाजारू और घटिया प्रतिस्पर्धा की वस्तु समझ बैठे हैं……………………………….विश्व के प्रत्येक धर्म में लगभग आधी बातें एक-दुसरे के समान सिद्धांतों पर आधारित हैं,सभी धर्म-ग्रंथों में कुछ मूलभूत विचार समान हैं,जैसे- १- प्रत्येक धर्म और धर्म ग्रन्थ कहता है,कि सृष्टि के कण-कण में भगवान् विराजमान हैं.२-सृष्टि कि रचना भगवान् ने कि है.पाप-पुन्य का निर्धारण भगवान् करेगा,३-उसी के आधार पर वो दंड और पुरूस्कार देगा.४- भगवान् की इच्छा के विरुद्ध एक पत्ता भी नहीं हिलता.आदि अब मैं पूछना चाहता हूँ,समस्त धर्मों के अनुयायियों,मौलवी और मुल्लाओं से,पंडों और पंडितों से,धर्म के ठेकेदारों से,कि जब कण-कण में भगवान् विराजमान है,तो फिर ये वितृष्णा,ये नफरत कैसी…….ये हिन्दू है,ये मुसलमान है,ये काफिर है,ये विधर्मी है…………………….जब कण-कण में भगवान् विराजमान है,तो क्या हिन्दू का शरीर या मुसलमान का शरीर कणों से नहीं बना,क्या मंदिर या मस्जिद के निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों के कण किसी और सृष्टि से आये हैं,या उनका सृष्टा कोई अन्य भगवान् है,आपका भगवान् नहीं. सिद्धान्त्ता जब कण-कण में भगवान् हैं,तो भगवान् हिन्दू के शरीर में भी विराजमान है,और मुसलमान कि काया में भी …………….जो भगवान् मस्जिद के प्रत्येक कण में है,वो भगवान् मंदिर के कण-कण में भी है……………तो फिर ये मेरा….ये तेरा……ये अधर्मी ये विधर्मी ……ये काफिर…..ये मुनाफिक…….ये नफरत कैसी. यदि धर्मों के प्रति आपमें कोई विरोधाभास है,या आप मानते हैं कि आपका धर्म सर्वश्रेष्ठ है,तो सबसे पहले आप अपने ही धर्मग्रन्थ की बात को,अपने धर्म की विचारधारा को पूर्णतय: खंडित कर रहे है………………आप दुसरे धर्म के प्रति नफरत या वैमनस्य प्रदर्शित कर रहे है…..तो इसका सीधा सा एक ही अर्थ है,कि आप चीख-चीख कर घोषणा कर रहे हैं,कि ” मेरा धर्म झूठा है,मई अपने धर्म ग्रथ की बातों को नहीं मानता,वो असत्य हैं और भावहीन हैं……मै अपने धर्मग्रन्थ में ,धर्म में आस्था नहीं रखता….और उनकी बातों को खंडित करता हूँ. या तो आप ये माने कि सभी कणों में भगवान् विराजमान नहीं है,जैसा आपके धर्म ग्रन्थ में लिखा गया है,तब ही आप किसी अन्य धर्म के प्रति घृणा-भाव रख सकते है,और आप कह सकते हैं,कि हमारा भगवान् सर्वश्रेष्ठ है……………..और विधर्मी,विधर्मी का भगवान् ,विधर्मी का पूजा स्थल,उसका धर्म ग्रन्थ घृणित है और तुच्छ है………………….पहले आपको अपने धर्म के सिद्धांतों को खंडित करना ही पड़ेगा. और दूसरी बात ये कि जब आपके भगवान् ने ही सृष्टि कि रचना की है,तो निश्चित ही मुसलमान को जिसने बनाया,उसी ने हिन्दू को भी बनाया………..सब उसी की रचना है……………..जब मंदिर उस भगवान् की इच्छा से बना तो इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं कि मस्जिद भी उसी भगवान् कि सहमति से बनी है,येही आपका धर्म ग्रन्थ आपकी धार्मिक पुस्तक अर्थात आपका भगवान् आपसे कहना चाहता है,तो फिर एक दुसरे के प्रति नफरत कैसी………………..यदि नफरत है,आपके विचारों में,आपकी सोच में…….तनिक भी ……ज़रा सी भी…..तो आप अपने ही धर्म-ग्रन्थ पर लात मार रहे हैं.



आप अपनी हिंसा के आंकड़े देखिये

महाभारत युद्ध की विभीषिका

युद्ध के मैदान मैदान में धृष्टराज ने युधिष्ठिर से कहा कि उनकी सेना में ९४ करोण (९४० मिलियन से अधिक )से अधिक सैनिक हैं. इतिहासकार अल्वरुनी के अनुसार ८ ,२६७ ,०९४ लोग युद्ध में सम्मिलित हुए.इनमें से नाम मात्र के लोग ही युद्ध के उपरान्त जीवित वचे. [ al-B.i.408 ]. महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में ८.३ मिलियन (लगभग एक करोण लोग) हताहत हुए. शूद्र वनाम ब्राह्मण वर्ण एक बिल्ली और एक शूद्र की ब्राह्मण द्वारा हत्या समान है.

” एक ब्राह्मण द्वारा शूद्र की हत्या,एक बिल्ली,या एक मेंढक अथवा एक गाय की हत्या के समान है. “– [ Manu i.43 ] [ Muir I.41 ] “हाथीघोड़े,शूद्र और म्लेच्छास(मुसलमान) शेर,चीता और भालू सब अन्धकार के मध्य का रूप हैं. महान इतिहासकार अल्वरुनी जिसने भारत की यात्रा १० वीं शताव्दी में की,उसके संस्मरण भी मनुस्मृति के कथनों की पुष्टि करते है,अल्वरुनी के अनुसार- “वैश्य और शूद्रों को,इसे सुनने की अनुमति नहीं हैं(वेदों को) और इसके अतिरिक्त इसके उच्चारण और पढने की भी नहीं,यदि ऐसा कोई प्रकरण, उनमें से किसी के विरुद्ध सिद्ध होता,तो ब्राह्मण उसे घसीट कर न्यायधीश के समक्ष ले जाते,और उसकी जीभ काट लिए जाने का दण्ड दिया जाता. अल्वरुनी संस्मरणों से साभार संदर्भित — [ al-B.i.125 Ch.XII ] “यदि वे आर्यन लोगो के नाम अथवा जाति का अभद्र्तापुर्वक उच्चारण करें,तो लोहे की १० अंगुली बराबर लम्बी छड रक्त तप्त लाल करके उनके मुंह में घुसेड दी जाए. — [ Manu VIII.271 ] यदि वे हेकड़ी करें,तो ब्राह्मण उन्हें सबक सिखाएं,और राजा को चाहिए इस आरोप में उनकें मुंह और कानों गर्म खौलता तेल डलवा दें. — [ Manu VIII.272 ] यदि उनमें से कोई हाथ या डंडा उठाये,उसके हाथ काट दिए जाएँ. यदि गुस्से से लात की ठोकर मारें,तो उसकी टांग काट ली जाए. — [ Manu VIII.279-280 ” यदि वे अपने बालों को कंघा करें/सजाएं और संवारें(खुद को श्रेष्ठ दिखाने के लिए) तो राजा को बिना झिचक उसके हाथ कटवा लेने चाहिए,………………….और उनकी गर्दन या अंडकोष ” — [ Manu VIII.282 ] ब्राह्मण जाति भगवान् के वंश से,और शूद्र असुरों से जन्में — [ Tait.Brah.I.2.6.7 ][ Muir.I.21 ] “ब्राह्मण का वर्ण श्वेत,क्षत्रियों का लाल,वैश्यों का पीला और शूद्र काले वर्ण वाले. — [ MBh.Santi.6930 ff ][ Muir.I.140 ] “…. ब्राह्मण उसके मुख में,क्षत्रिय उसकी भुजाएं,उस एक महान की जांघें विश और काली जातियां उसके पैर …. .” Brahmananam kshattra-bhujo mahatma vid-urur anghrisrita-krishna-varnah” — [ Muir.I.156 ] [ Bhg.Pur.II.1.37 ] एक चंडाल अपने १००० जन्म में शूद्र हो सकता है. एक शूद्र उसके तीस गुना (१०००*३० जन्म में) वैश्य हो सकता है. एक वैश्य उसके ६० गुना (१०००*३०*६० जन्मों बाद) राजन हो सकता है. और एक राजन्य उसके भी ६० गुना जन्मों में (१०००*३०*६०*६० जन्मों में) ब्राह्मण के रूप में जन्म ले सकता है. — [ MBh.Anu.1901 ff ][ Muir.I.441 ]

पैगम्बर की तलवार ही क्यों खटकती है ?

पैगम्बर मोहम्मद के हाथ में तलवार “तथाकथित मनुवादियों” को खटकती है,और इस्लाम को हिंसावादी धर्म घोषित करने में उन्हें किंचित संकोच नहीं होता,इससे भी आगे जाते हुए ये ” तथाकथित शांतिप्रिय धर्म के अनुयायी” आरोपण करते हैं,कि इस्लाम तलवार की नोक के माध्यम से समस्त विश्व में फैला.

इन्हें पैगम्बर की तलवार तो दिखाई देती है,पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम के हाथ में “धनुष-वाण” दिखाई नहीं देता,माँ काली के हाथ “धारदार हथियार और गले में पड़ी मानव कपाल माला” दिखाई नहीं देती,न इन्हें भगवान् शिव के हाथ में त्रिशूल,और त्रिशूल धारी माँ दुर्गा,और श्री कृष्ण के हाथ में “चक्र”,युद्ध मैदान में युद्धरत “श्री अर्जुन” दिखाई नहीं देते,न इन्हें परशुराम का फरसा और नटराज का तांडव दृष्टिगोचर होता है.


हम पूछना चाहते हैं,कि भगवानों/देवताओं/अवतारों और देवियों के हाथों में धारित किये गए ये हथियार क्या “हिंसा” को प्रतिबिंबित नहीं करते,ये शास्त्र क्या मक्खियाँ मारने के लिए धारण किये गए हैं?…….निश्चय ही ये हथियार राक्षसों/असुरों/विधर्मियों/नास्तिकों/पिशाचों और पापियों की हत्या के उद्देश्य से धारित किये गए हैं.

जब श्रीराम संसार से राक्षसों और नास्तिकों के नाश के लिए धनुष-वाण प्रयोग करते हुए,शांतिप्रिय हिन्दू धर्म की रक्षा कर सकते हैं,तो पैगम्बर मोहम्मद विधर्मियों/नास्तिकों और पापियों को मारने के तलवार का प्रयोग करते हुए,इस्लाम की स्थापना करने में क्या आपत्ति है…….कहीं “इन मनुवादियों की निजी परिभाषानुसार” तलवार से की गयी हत्या “हिंसा” है,और त्रिशूल,धनुष-वाण से की गयी हत्या “अहिंसा” है?

पैगम्बर मोहम्मद ने तलवार(या अन्य शास्त्र से ) से किसी व्यक्ति की हत्या नहीं की

ये एक आश्चर्यजनक परन्तु प्रमाणिक सत्य है,कि पैगम्बर मोहम्मद के नेतृत्व में कई भीषण युद्ध/जंगें लड़ी गयी,जिसमें खुद पैगम्बर ने तलवार धारण कर युद्ध के मैदान में मोर्चा संभाला.पर पैगम्बर ने अपनी तलवार (अथवा अन्य शास्त्र से)से कभी किसी व्यक्ति की हत्या नहीं की,केवल एक अपवाद को छोड़कर,जिसमें आपकी तलवार से दुश्मन फ़ौज का एक व्यक्ति मामूली रूप से घायल हो गया (केवल उसकी त्वचा पर एक छोटा सा घाव हो गया) और कुछ दिनों के बाद (संभवतया घाव में संक्रमण के कारण) उसकी मृत्यु हो गयी….पर पैगम्बर के प्रत्यक्ष वार से युद्ध मैदान अथवा अन्य किसी स्थान पर किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई.

हिन्दू धर्म जीवों के प्रति करुना भाव नहीं रखता

“अहिंसा पर्मों धर्मं:” का पालन करने वाला “अहिंसा वादी और शांतिप्रिय हिन्दू धर्म” के प्रत्येक देवी-देवता और अवतार/भगबान का अधिकृत वाहन के रूप में ,सामान्तय: “निरीह जीव ” ही प्रयोग किये गए हैं,चान्हें भगवान् श्री गणेश के वाहन “मूषक” हों,या देवी दुर्गा के भार-वाहक शेर,भगवान् शिव के शरीर पर धारित “सांप” और देवी सरस्वती के हंस वाहन की बात की जाए…….क्या इन छोटे-छोटे निरीह जीवों पर एक मनुष्य सामान्य काया का भार “जीवों के प्रति हिंसा और उत्पीणन” का प्रत्यक्ष उदाहरण नहीं है.

कई देवी/देवता “जीवों की खाल” वस्त्र और शय्या के रूप में प्रयोग किये जाने का विवरण ग्रंथों में उपलव्ध है,सभी जानते हैं,कि भगवान् शिव अपने अंग-वस्त्र के रूप में “सिंह की खाल” का प्रयोग करते थे,और इसी का प्रयोग अपनी आसन्न-शय्या पर बिछाने में किया जाता था.तो क्या एक “अहिंसावादी विचारों का व्यक्ति” पशु देह से उतारा चर्म अपने वस्त्रों और बिस्तर के रूप में प्रयोग करने को स्वीकार कर सकेगा.

शान्ति और अहिंसा की बातें जैन और बौध धर्म के लोग करें,ये तो प्रासंगिक है…………………….पर हिन्दू धर्म,एक शांतिप्रिय धर्म है,कहना अतिशयोक्तिपूर्ण,और उपहास पूर्ण है……………क्योंकि सनातन हिन्दू धर्म से जुड़ा लगभग प्रत्येक देवी-देवता,अवतार,मनीषी,और सिद्ध पुरुषों आदि सभीनें हाथों में कोई-न-कोई अस्त्र-शस्त्र अवश्य धारित किया……………..और अस्त्र-शस्त्र धारण करना,हिंसा को प्रदर्शित करता है.


मुस्लिम धर्म में सात शादियाँ स्वीकार्य हैं

ये बात सही है,कि एक से अधिक पत्नी रखने मुस्लिम धर्म में अनुमति है,पर ऐसा केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में एवं औपबंधिक शर्तों के अधीन किया जा सकता है……………….विशेषकर जैसे युद्ध के समय ऐसा किये जाने की अनुमति है,वो भी युद्ध में शहीद हुए,सैनिकों की विदभा पत्नियों,और बेसहारा औरतों के साथ विवाह किया जाना धर्म सम्मत है. भारत में एक से अधिक पत्नियां रखने वाली जनसँख्या मुस्लिमों की अपेक्षा हिन्दुओं में अधिक है. मुस्लिम धर्म में कुछ विशेष परिस्थितियों में सात विवाह करने /सात पत्नियां रखने की अनुमति तो है,परन्तु भारत की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार,हमारे देश में बहुपत्नी/एक से अधिक पत्नी रखने मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू लोगों की संख्या अधिक है………………………….आप खुद भी इसका अनुमान सहज रूप से लगा सकते है,अपने आस-पास की मुस्लिम बाहुल्य जनसँख्या और कुछ परिचित मुस्लिमों के विषय में जानकारी लें,कि उनमें से कितने मुस्लिम लोगों की एक से अधिक पत्नियां हैं…………….तब आप खुद विस्मय में पड़ जायेंगे.दक्षिण भारत के राज्यों और पश्चिमी बंगाल व् बिहार में हिन्दू लोगों में बहुपत्नी विवाह बहुत अधिक प्रचलन में है.


औरंगजेब नें हिन्दुओं पर अत्याचार किये/हत्याएं करायीं /बलात धर्मपरिवर्तन कराया.

ये सत्य है कि औरंगजेब एक कट्टर मुस्लिम शासक था,उसने सैकड़ों हिन्दू मंदिर तोड़ने का आदेश दिया,हिन्दुओं पर तीर्थकर और जजिया कर लगाया,उसने हिन्दुओं पर अत्याचार किये,पर ये बिलकुल गलत और निराधार है,कि उसनें ज़बरदस्ती हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में परिवर्तन कराया,और ऐसा न करने वाले हिन्दुओं को मौत के घात उतार दिया.

औरंगजेब के सम्बन्ध में एक मिथक ये भी प्रचलित है,कि प्रतिदिन हिन्दुओं की हत्या उपरान्त सवा मन जनेऊ इकठ्ठा नहीं हो जाते थे,औरंगजेब भोजन नहीं करता था,जोकि एक अप्रासंगिक और असंभव बात है,आइये इसकी विवेचना करते हैं-

सवा मन जनेऊ का अर्थ होता है,२५ किलो ग्राम भार
एक जनेऊ का भार लगभग ०५ -१० ग्राम (एक या दो तोला भार)
इसलिए २५ किलो भार का अर्थ हुआ २५ किलोग्राम = २५*१००० ग्राम = २५००० ग्राम
२५००० ग्राम /०८ ग्राम = ३१२५ जनेऊ अर्थात एक वक्त के भोजन के लिए ३१२५ लोगों की हत्या
तीन वक्त भोजन के लिए ३१२५*३= ९३७५ लोगों की हत्या (एक दिन की अवधि में)
औरंगजेब ने शासन किया,सन १६५८ ई० से १७०७ ई० तक,अर्थात कुल ४९ वर्ष,जिसमें से एक वर्ष कम का आकलन करेंगे
कुल ४८ वर्ष* ३६५ दिन(एक वर्ष के दिन) = १७५२० दिन कुल शासनकाल

इस हिसाब से औरंगजेब द्वारा की गयी कुल हत्याएं= १७५२०( कुल शासनकाल दिनों में )*३१२५ (एक दिन में की गयीं हत्याएं) =५४७५०००० हत्याएं
मिथक के अनुसार परिकलन से विदित होता है,कि मात्र धर्मपरिवर्तन कराने के अभियान के अंतर्गत औरंगजेब नें कुल पांच करोड़ सैंतालीस लाख पचास हज़ार हिन्दू जनसख्या की हत्याएं औरंगजेब नें करायीं
.

औरंगजेब के शासनकाल के दौरान भारत की जनसँख्या लगभग एक करोड़ दस से एक करोड़ पचास लाख के मध्य थी,तो फिर औरंगजेब ने १.५ करोड़ जनसख्या वाले देश में पांच करोड़ से अधिक हिन्दू जनसँख्या की हत्या किस प्रकार कर दी………….कहाँ से वो अतिरिक्त जनसँख्या जिसकी हत्या औरंगजेब ने करायी………………………और जब पांच करोड़ से अधिक की हत्या कर दी गयी,तो निश्चित ही पांच करोड़ से अधिक लोगों नें धर्मांतरण कर मुस्लिम धर्म भी अपनाया होगा………………….और कुछ हिन्दू जनसँख्या अवशेष भी रही होगी,जिनके वंशज आज भारत में हिन्दू जनसँख्या के रूप में मौजूद हैं.

और इस परिकलन में स्वाभाविक मृत्यु,युद्ध में मृत्यु,आपसी रंजिशन हत्याएं आदि के आंकड़ें नहीं जोड़े गए हैं,इन सब का यदि योग किया जाए,तो तात्कालिक रूप से औरंगजेब के शासन के समय लगभग बीस करोड़ से अधिक भारत की जनसँख्या होनी चाहिए थी,जबकि थी मात्र १.५ करोड़.

सवा






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