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तेरा वोट -मेरा वोट नया चुनावी फार्मूला

Posted On: 9 Nov, 2015 Others में

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avanindra singh jadaun

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बिहार चुनाव के परिणामो ने मोदी सहित पूरी भारतीय जनता पार्टी को हिला दिया अप्रत्याशित रूप से पार्टी केवल ५६ सासीट पर सिमट गयी और जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रिय जनता दल को भाजपा से अधिक सीट मिल गयीं।लोग इस के लिए मोदी जी की नीतियो ,बयानों और कार्यों की आलोचना कर रहे हैं और साथ कई अन्य मुद्दों को भी इसी जीत हार के सन्दर्भ में देखा जा रहा है। पर ये सभी चर्चा केवल भ्रम मात्र है।अगर चुनाव के आंकड़ो पर नजर डालें तो ५६ सीट लाने बाली भाजपा को २४.४ प्रतिशत वोट मिले हैं और ८० सीट लाने बाली राष्ट्रीय जनता दल को मात्र १८.४ प्रतिशत वोट मिले जबकि १६.८ प्रतिशत वोट पाने बाली जदयू को ७१ सीट मिल गयी।ऐसा क्यों और कैसे हो गया इससे जनता को कोई मतलब नहीं है।पर यह गणित राजनीति का नया फार्मूला बन रहा है अगर ऊपर जदयू और राष्ट्रीय जनता दल के वोट प्रतिशत को जोड़ें तो यह २५.२ हो जाता है और अगर इसमें कांग्रेस के लगभग १० प्रतिशत वोट जोड़ दें तो यह ३५ प्रतिशत से ज्यादा होता है और यही महागठबंधन की बम्पर जीत का कारण है।
सोशल इंजीनियरिंग की जन्मदाता बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बहन मायावती जी हैं उन्होंने विधानसभा जीतने का जो फार्मूला ईजाद किया था उससे उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस और भाजपा को पसीने छुड़ा दिए थे। पैसे लेकर टिकट बाँटने जैसे आरोपों से घिरे रहने के वाबजूद उनका फार्मूला प्रदेश में एक लंबे समय तक हिट रहा और अगड़े के साथ दलित वोट का योग हमेशा सीट जीतने का नायाब फार्मूला रहा पर पिछले चुनाव में लैपटॉप और मुफ़्त के भत्ते का फार्मूला उनके फॉर्मूले पर भारी पड़ गया और बसपा राजनीति से बाहर हो गयी।इसके बाद लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने सभी फॉर्मूले फेल करते हुए प्रचंड बहुमत से देश को नयी सरकार देते हुए कॉग्रेस के 60 साल के बजूद को संकट में डाल दिया ।मोदी के आने के बाद से ही कांग्रेस और उसके सहयोगी दल परेशान थे और देश में एक भाजपा के अभियान को प्रदेशों में रोकने के लिए नए फॉर्मूले की खोज की जानी आवश्यक हो गयी थी और इसी के तहत मेरा वोट प्लस तुम्हारा वोट के नये गणित का जन्म हो गया ।
   इस फार्मूला का आंशिक असर उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में नजर आया जहाँ बसपा के चुनाव में अधिक सक्रीय ना होने से उनका कुछ प्रतिशत वोट भाजपा में सरक गया और भाजपा ने 73 सीट के साथ सपा का सफाया करके इतिहास बना दिया। पर इस नए फॉर्मूले का पूर्ण पहला प्रयोग दिल्ली में किया गया जिसमे सभी दलों ने अपना वोट भाजपा को रोकने के लिए केजरीवाल जी ट्रान्सफर कर दिया जिससे भाजपा पहले से ज्यादा वोट प्रतिशत हांसिल करने के बाद भी सीट के लिए तरस गयी।
      हालाँकि यह प्रयोग कोई नया नहीं है स्थानीय पंचायत चुनाव में यह प्रयोग आजादी के समय से ही होता आ रहा।पंचायत चुनाव हमेशा विरादरी पर आधारित होते हैं और उसी आधार पर प्रत्याशी तय होते हैं कभी कभी जातीय समीकरण इतने क्लिष्ट होते हैं जहाँ  दो जातियों के वोट एक साथ आने जरुरी होते है इसलिए दो लोग मेरा वोट तुम्हारा वोट जोड़कर साथ हो जाते हैं और अपनी जीत पक्की कर लेते हैं पंचायत स्तर पर केवल दस प्रतिशत प्रत्याशी ही विकास के नाम पर जीतते है बाकीं जगह जाति समीकरण ही हावी रहते हैं।
       मोदी जी के शपथ लेते ही पूरे देश में सभी पार्टियां अपने भविष्य को लेकर चिंतित थी और अकेले कोई भी पार्टी भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में नहीं थी इसलिए सभी ने अपने वोट प्रतिशत को जोड़ा होगा जो भाजपा के वोट प्रतिशत से बहुत अधिक था और यह आंकड़ा सत्ता पाने का जादुई आंकड़ा भी था इसलिए सभी गैर भाजपाई और क्षेत्रीय दल पंचायत चुनाव की तर्ज़ पर आपसी मतभेद भुलाकर एक हो गए। देश में राजनीति का यह नया प्रयोग भरपूर सफल रहा हमारा वोट और तुम्हारा वोट मिलकर दिल्ली और बिहार में  सत्ता सुख का वोट बना। और इसमें सबसे शसक्त भूमिका रही कॉग्रेस के गैर जिताऊ वोट की रही जो इनके साथ मिलकर जिताऊ हो गए।
   देश का मतदाता आज भी इतना गरीब और अशिक्षित है कि पंचायत चुनाव में धोती साड़ी और नकदी आदि पर अपना वोट बेच देता है तो विधानसभा में उससे ज्यादा व्यापक दृष्टिकोण की अपेक्षा करना व्यर्थ है। पडोसी राज्य की राजधानी और अपने राज्य के मंत्रियों  तक के नाम ना जानने बाले गरीब वोटर से देश की अर्थव्यवस्था , अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों और विकास के नाम पर वोट की अपेक्षा करना व्यर्थ ही है। भारत का मतदाता तो अभी भी अगड़े पिछड़े और जाति विरादरी से ऊपर सोच ही नहीं सकता है और सोचे भी क्यों ? पहला फ़र्ज़ तो अपनी विरादरी के बन्दे को चुनना ही है इसलिए भारत में विकास के नाम किसी पार्टी को वोट मिलेगे ये अभी ख्वाब ही है। इसीलिये अभी भी चुनाव जातीय चेहरों पर ही लड़े जा रहे हैं और जीते भी जा रहे हैं
      हालाँकि इस चुनाव में विश्लेषक अपने अपने विश्लेषण करेंगे पर सच यही है कि बिहार चुनाव के नतीजों ने सोशल इंजीनियरिंग का नया फार्मूला ईजाद कर दिया है और वह है -मेरा वोट प्लस तुम्हारा वोट और सत्ता हांसिल।और यह समीकरण अब हर राज्य में अपनाया जायेगा ।उत्तर प्रदेश में भी भविष्य में दो दलों के एक होने की संभावनाएं मजबूत हो गयी है।

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