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हिंदी अपनाने में लज्जा क्यूँ?

Posted On: 15 Sep, 2014 Others में

अपनेराम की डायरीरोज़मर्रा की आपधापी से निकल सुकून की दो सांसे ले लो मेरे यार|

अवी

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हिंदी दिवस का जिक्र आते ही मुझे अपने बड़े भाई साहब श्री रविन्द्र घाणेकर का बरसों पहले लिखा लेख याद आ गया| उनकी आज्ञा से मैं उसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूँ| आनंद लें…………..

हिंदी अपनाने में लज्जा क्यों ? हिंदी पखवाडा चालू होते ही मैंने इस प्रश्न पर विचार करना चालू कर दिया|अब इसमें मेरा भी दोष नहीं है| मुझे मालूम ही नहीं था कि “हिंदी अपनाने में हमें “लज्जा” आती है|” मुझे लगता है की यदि देश में बुद्धिजीवी न होते और हमारे लिए नित नए प्रश्न खड़े न करते तो हमें पता ही न चलता की हमारी समस्याएं हैं क्या ?
जो भी हो मैंने प्रस्तुत प्रश्न पर बड़ी गंभीरता से विचार किया| हर दृष्टिकोण से,हर पहलू पर विचार किया| कई दिन, बार-बार विचार किया| फलस्वरूप,” करत करत अभ्यास ते, जड़ मति होत सुजान”- इस कहावत पर से मेरा विश्वास उठ गया| प्रश्न का उत्तर न मिला| जाहिर है प्रश्न बहुत कठिन था| आजकल ऐसे प्रश्नों के समाधान के लिए एक प्रचलित और बड़ा ही लोकप्रिय उपाय है – “सर्वेक्षण!” सर्वेक्षण कीजिये, उत्तरों को सांख्यिकी, अर्थात statistics के हथोड़े से ठोकिये जो बन जाये वही समाधान है| यहाँ यह कह दूँ की सांख्यिकी के जो भी गुण-दोष हों, वह हमें अपनी औकात बता देती है कि हम दस में एक हैं या लाखों में एक ! खैर मैंने भी सर्वेक्षण का रास्ता अपनाया|
मेरे कुछ परिचित, जिनकी इस प्रश्न में दिलचस्पी हो सकती थी, मैंने चुने और सर्वेक्षण पर निकल पड़ा| प्रस्तुत हैं उसी सर्वेक्षण का ब्यौरा(सर्वेक्षित लोगों के हित में मैंने उनके नाम गुप्त रखें हैं) –
सर्वेक्षण का श्री गणेश मैंने अपने मित्र “क” जी से किया| “क” जी हिंदी भाषी हैं, समाजशास्त्री हैं और इतिहास में रूचि रखते हैं| “क’ जी हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी, जहाँ हिंदी, लोगों की मातृभाषा है, हिंदी के व्यव्हार में लोगों को लज्जा या हिचक क्यों है? मैंने पूछा| “ इसके पीछे, पौराणिक कारण हैं|” उन्होंने गंभीरता से कहा – “ प्राचीन कल से ही हमारे यहाँ मातृकुल की “केस हिस्ट्री” कुछ अच्छी नहीं रही| उदाहरणार्थ कंस या शकुनी को ही ले लीजिये| शायद इन्ही पीढीगत, सामुहिक कटु स्मृतियों के कारण मातृकुल से सम्बंधित हर चीज़ के प्रति जनमानस में मनोवैज्ञानिक लज्जाबोध है, चाहे वह मातृभाषा ही क्यों न हो|”
उनकी बात न समझ पाने की वजह से मैं उनसे असहमत हो गया|” मुझे लगता है, विशेषकर प्रशासनिक या तकनिकी क्षेत्रों में, हिंदी का क्रमिक विकास नहीं हो पाया, क्योंकि प्रचलित प्रशासनिक व्यवस्था और तकनीक हमारे यहाँ विकसित नहीं हुई है| इन क्षेत्रों से सम्बद्ध हिंदी शब्दावली कृत्रिम लगती है और कृत्रिमता को अपनाने में लज्जाबोध स्वाभाविक है|” मैंने बहस की|
कौन कहता है की तकनीक हमारे यहाँ विकसित नहीं हुई? “क” जी गरज पड़े|”पौराणिक काल में भी हम तकनीक की चरमोन्नती पर थे| और कुछ नहीं तो आपने’पुष्पक’ नाम तो सुना ही होगा|”
“लेकिन वह तो नई पिक्चर है|” मैंने तुरंत विरोध किया| इस अक्षम्य अपराध के बाद मेरे हिंदी शब्दज्ञान में अचानक असाधारण वृद्धि हुई| यह अलग बात है की उन शब्दों को किसी भी सभ्य समाज में कहना या लिखना संभव नहीं है|
मेरा अगला पड़ाव मेरे बाल मित्र और अंग्रेजी के परम भक्त “ ख” साहब के यहाँ था| बचपन से ही “ख” साहब की पढाई का ध्येय ‘किसी तरह ‘ अंग्रेजी में पास होना रहता था| अन्य सारे विषयों में फेल हो कर भी ये साहब कक्षा में सर्व प्रथम आये छात्र से भी बड़ा सीना फुलाए घूमते थे|
“ हिंदी अपनाने में लज्जा क्यों?” मैं तुरंत मुद्दे पर आ गया|
“हिंदी किसे कहते हैं?” उन्होंने प्रतिप्रश्न किया|
मैंने उनके भोलेपन पर मुग्ध हो कर उन्हें सरल रूप से समझाया कि हिंदी वही भाषा है जो हम हिन्दीभाषी बोलते हैं या जिसे आप दूरदर्शन इत्यादि पर सुनते हैं| हिंदी पुस्तकों या समाचार पत्रों का जिक्र उनके सामने व्यर्थ था|
‘उसे आप हिंदी कहते हैं?’ वे आहत हो कर बोले|
“मैं मानता हूँ की हिंदी बोलते समय बहुत से अंग्रेजी शब्दों का अनायास प्रयोग हो जाता है पर है तो वह आखिर हिंदी ही|” मैंने रक्षात्मक लहजे में कहा|
“आप चाहें तो उसे हिंदी कहें मैं तो उसे टूटी फूटी अंग्रेजी ही समझता हूँ| और ऐसी टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने में सबको शर्म आनी चाहिए|” उन्होंने अपना फैसला सुना दिया|
यह दृष्टिकोण मेरे लिए एकदम नया था| इसी पर विचार करता हुआ मैं अपने एक अहिन्दीभाषी मित्र के घर पहुंचा और उवसे पूछा – हिंदी अपनाने में लज्जा क्यों ?
“हिंदी थोपी जा रही है |”उन्होंने शिकायती सुर में कहा|
“आप ऐसा क्यों सोचते हैं?” मैंने उन्हें समझाया| “कहते हैं, भारत की लगभग सभी भाषाओँ की माता संस्कृत है| हिंदी संस्कृत के अति निकट है और बहुसंख्यकों की भाषा है|इसी लिहाज से वह अन्य भारतीय भाषाओँ की दीदी हुई | उसे अपनाने में लज्जा क्यों ?”
“ आप हीन शब्द का अर्थ समझते हैं ?” उन्होंने तुरंत पूछा|
“हाँ, हीन माने तुच्छ |” मैं उनके प्रश्न का आशय न समझ पाया|
“ हिंदी अन्य भारतीय भाषाओँ की दीदी तो है पर हीन है, इसीलिए उसे हीन+दी अर्थात हिंदी कहते हैं|”अपने तर्क से मुझे अवाक् करते हुए उन्होंने कहा| लगा “क” से सीखे सारे नए शब्दों का, वाक्यों में प्रयोग कर डालूं पर स्वरक्षा बोध ने मुझे रोक लिया| वैसे भी ये उनकी व्यक्तिगत राय थी, सारे अहिन्दीभाषी समाज की नहीं|
समस्या के व्यावहारिक पहलू पर राय जानने के उद्देश्य से मैं, अपने एक व्यवहारिक दृष्टि से चतुर माने जाने वाले, मित्र के घर गया और प्रश्न किया –
“आज एक पराई भाषा अंग्रेजी को हमने सर चढ़ा रखा है और अपनी ही हिंदी भाषा की हम उपेक्षा करते हैं, उसके व्यवहार में लज्जा का अनुभव करते हैं| ऐसा क्यों? “
“ यह तो स्वाभाविक है|” उन्होंने मेरी मूढ़ता पर हंस कर कहा| “ हम सभी तो एक पराई को अपनी पत्नी बना कर, सर चढ़ाये रखते हैं| इससे अपनो की थोड़ी बहुत उपेक्षा हो गई तो आश्चर्य कैसा? यह तो जग की रीत है भैय्या||
हिंदी पखवाडा या इसी तरह के अन्य पखवाड़ों से सम्बंधित हम जैसे लोगों के सौभाग्य से पखवाडा सिर्फ पंद्रह और अक्सर उससे भी कम दिनों का ही होता है | अतः मेरा सर्वेक्षण भी यहीं ख़त्म हो गया| इसी सीमित सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्रस्तुत हैं :-
१. “ हिंदी अपनाने में लज्जा क्यों ? यह प्रश्न बहुत कठिन है|
२. इस प्रश्न के कई- पौराणिक, क्षेत्रीय और व्यावहारिक उत्तर हो सकते हैं, गिलास आधा खाली या आधा भरा, इस न्याय से|
३. जिसे जन सामान्य हिंदी समझता है वह “टूटी फूटी हिंदी” है या “टूटी फूटी अंग्रेजी” यह प्रस्तुत प्रश्न से सम्बंधित एक अन्य प्रश्न है जिसके लिए एक अलग सर्वेक्षण की आवश्यकता है|
अंत में मेरा व्यक्तिगत सुझाव- ( अंग्रेजी की एक अत्यंत लोकप्रिय कहावत की तर्ज पर) –
भाषायी गुलामी के खिलाफ संघर्षरत सच्चे सैनिक की भांति हमारा काम यह पूछना नहीं की लज्जा क्यों? हमारा काम तो है हिंदी को अपनाना, लज्जा आती है तो आये, नहीं आती तो न सही !

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