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फेसबुकिया ‘जन्‍मदिन’ से मुन्‍नाभाई की लिखचीत (चैटिंग)

Posted On: 12 Dec, 2012 Others में

अविनाश वाचस्‍पतिविचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई

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‘जन्‍मदिन’ मेरा ऑनलाईन था जबकि मैं स्‍वयं सदा की तरह ‘ऑफलाईन’। लेकिन वो ‘जन्‍मदिन’ ही क्‍या जो ‘तलाश’ न सके। मैं ‘फेसबुक’ पर मौजूद था किंतु प्रत्यक्ष नहीं परोक्ष रूप में। एकाएक मेरे संदेश बॉक्‍स में किसी की उपस्थिति दर्ज हुई। जन्‍मदिन है,चाहे समय रात के बारह बजे का ही था। मेरे जन्‍मदिन ने मुझे शुभकामनाएं दी थी, मैंने तुरंत संदेश के प्रत्‍युत्‍तर में ‘धन्‍यवाद’ लिखकर भेजा। अब उधर से संदेश आया ‘हा हा हा lol’

मैं : इस हंसने का कारण ?
जन्‍मदिन : जिंदगी से प्‍यार करने वाले इंसान तेरी जिंदगी का प्रत्‍येक पल लगातार कम हो रहा है और तू शुभकामनाओं को शुभ की तरह ले रहा है। चल मरने के लिए तैयार हो जा।
मैं : मतलब, जन्‍मदिन है, आज शुभकामनाओं पर तो अधिकार है मेरा, 364 दिन की तपस्‍या के बाद शुभकामनाएं लिए यह दिन आता है इसलिए इसे खुशी की तरह ही लूंगा, सब लेते हैं। वैसे भी इसमें दुखी होने की कौन सी बात है, आज फेसबुक के कारण हजारों की संख्‍या में शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लाखों में न सही और तुम मेरे मरने की कामनाएं कर रहे हो।
जन्‍मदिन : क्‍या यह सच्‍ची शुभकामनाएं हैं, जिंदगी का साल रीत रहा है, सब कुछ पल पल बीत रहा है, तुझे लग रहा है तू जग को जीत रहा है।
मैं : सच्‍ची ही हैं और क्‍या, यही तो जीवन का गीत है, इन्‍हीं शुभकामनाओं से तो मानव करता प्रीत है।
जन्‍मदिन : सच्‍ची नहीं हैं, सच्‍चाई तो कड़वी है और वह यह कि आज तेरी जिंदगी से एक बरस और कम हो गया है। तू मौत के और पास पहुंच गया है। वैसे एक बात बतला कि तू जिंदा रहना चाहता है या मरना ?
मैं : मरना तो कोई नहीं चाहता है, एक चींटी या मच्‍छर को भी अपने प्राणों से मोह होता है, सो मुझे भी है।
जन्मदिन : फिर जन्‍मदिन से खुश क्‍यों हो रहा है, अधेड़ प्राणी ( मेरे 54 बरस का होने पर मुझ पर तंज कसा गया था)
मैं : (सोचने लगा, बात तो सोलह फीसदी सही है। सब जीना चाहते हैं फिर मौत के पास जाते हुए भी अनजाने में इतना खुश हो रहे हैं)
जन्‍मदिन : क्‍या हुआ, क्‍या सोचने लगा ?
मैं : (मरी हुई आवाज में, मेरे शब्‍द गले में अटक रहे थे, ऊंगलियां कीबोर्ड पर चलने में विद्रोह करने के मूड में आ गई थीं, यह भी कह सकते हैं कि वह भी डर गई थीं क्‍योंकि मेरा मरना मेरी देह के प्रत्‍येक अंग-प्रत्‍यंग का मरना यानी निष्‍प्राण होना था। मेरी ऊंगलियों के हाथ-पांव फूल गए थे। मेरी दशा ऐसी हो गई कि काटो तो खून न निकले, दिसम्‍बर की कड़ाके की सर्दी में भी मैं पसीना-पसीना हो गया था। मेरी ऊंगलियों के माथे पर भी पसीने की बूंदे उभर आई थीं। मैं कुछ नहीं लिख पाया)
जन्‍मदिन : खिलखिला रहा था क्‍यों डर गया ?
मैं : (सचमुच डर गया था, मुझे स्‍वीकारना ही पड़ा) यस।
जन्‍मदिन : जब यह सनातन सच्‍चाई है तो फिर इंसान क्‍यों नोटों के लालच में दीवाना हुआ जा रहा है। हर तरह से नोट जमा कर रहा है। अपनी मौत की ओर बढ़ती गति को खुश होकर जी रहा है।
मैं : लेकिन यह इंसान के हाथ में तो नहीं है ?
जन्‍मदिन : फिर जन्‍मदिन न मनाना तो इंसान के हाथ में ही है। इसे मनाना तो तू छोड़ दे।
मैं : लेकिन मेरे अकेले के छोड़ने से क्‍या होगा ?
जन्‍मदिन : समाज में जितनी भी क्रांतियां आई हैं या आती हैं, वे सिर्फ एक अकेले की सोच और संघर्ष का प्रतिफल होती हैं। तू शुरूआत तो कर।
मैं : मुझे कौन जानता है और कोई मेरी बातों को क्‍यों मानेगा, मैं कोई बहुत बड़ा नेता नहीं हूं, सत्‍ता में किसी शीर्ष पद पर विद्यमान नहीं हूं। मंत्री नहीं हूं, राष्‍ट्रपति नहीं हूं, सेलीब्रिटी नहीं हूं, कोई बहुत बड़ा साहित्‍यकार नहीं हूं, हां, एक छोटा सा कवि, अदना सा व्‍यंग्‍य लेखक और कमजोर  हिंदी का मजबूत ब्‍लॉगर  जरूर हूं और जितना लिख लेता हूं उसमें से 15 या 20 परसेंट छप जाता है। मैं बाल ठाकरे नहीं हूं, पोंटी चड्ढा नहीं हूं और तो और किसी मंत्री का निजी सचिव भी नहीं हूं। मैं असीम त्रिवेदी भी नहीं हूं और उन दो कन्‍याओं में से भी नहीं हूं जिन्‍हें फेसबुक पर टिप्‍पणी करने और लाइक करने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया था। आखिर मेरी हैसियत है क्‍या ?
जन्‍मदिन : इनमें से कोई न सही, किंतु एक आम आदमी तो है ही तू।
मैं : ‘आम आदमी’ पर भी अब केजरीवाल का पेटेंट हो चुका है। क्‍या बचा हूं मैं, सिर्फ एक वोटर, जिसके बैंक खाते में अब सरकार सीधे सब्सिडी का पैसा डालेगी और वोट हथिया लेगी। जबकि मैं यह सच भी जानता हूं कि मेरा कोई बैंक खाता नहीं है और अब तो आसानी से खुलने वाला भी नहीं है। (मेरी बातों के जाल में ‘जन्‍मदिन’ पूरी तरह उलझ गया था। मेरे संदेश बॉक्‍स में जन्‍मदिन की ओर से अब एक अंतिम संदेश आया कि ‘मुझे अभी 14 दिसम्‍बर के दिन पैदा हुए बहुत सारे प्राणवानों को शुभकामनाएं देनी हैं, मैं चलता हूं।)
तभी मेरी नींद खुल गई।  मेरी धर्मपत्‍नी मुझे जगाकर बहुत प्‍यार से जन्‍मदिन के लिए ‘विश’ कर रही थी क्‍योंकि मैं लैपटॉप को गोद में लिए लिए हुए झपकी ले रहा था। सामने घड़ी में समय देखा 12 बजकर 5 मिनिट हुए थे।  मैंने पत्‍नी को अपने आगोश में ले लिया और इस ‘फेसबुकिया’ दु:स्‍वप्‍न को भूलने की चेष्‍टा करने लगा। अब तक मेरी टाइमलाईन पर शुभकामनाओं की लाईन लग चुकी थी। एकाएक अहसास हुआ मात्र 5 मिनिट में इतनी बड़ी कहानी।

इस लिखचीत से यह सीख मिलती है कि सपने की गति काफी तीव्र होने का आधार सबसे पुख्‍ता है।

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