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लिव इन रिलेशनशिप ... शारीरिक संबंधों की इस रिले को सुर्खियों में क्यों लाया जा रहा है ?

Posted On: 4 Apr, 2010 Others में

अविनाश वाचस्‍पतिविचारों की स्‍वतंत्र आग ही है ब्‍लॉग

अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई

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लिव इन रिलेशनशिप के मायने संबंधों के उन दायरों में रहना जहां पर सब लागू हो परंतु फिर भी बेकाबू हो। ऐसा दौर जोखिमभरा है या इसमें सिर्फ हरा-हरा है। सबके मन में इसे लेकर सब कुछ फहरा रहा है, जिसे जानबूझकर भी इंसान बहरा ही बना रहना चाहता है। इस बहरेपन के कई लाभ हैं। इससे सब ओर हरियाली दिखलाई देती है। इस हरियाली पर हर कोई सुकून का सुखद अहसास करने को तैयार बैठा है।

यानी पानी के जहाज पर टिकना पर टिके होकर भी डगमगाना और सदा डगमगाये रहना जैसे पी रखी हो और संबंधों के महासागर में नशेमन हो हिलोंरे आ जा रही हों। हवा में उड़ता नहीं है, धरती पर ही दिखलाई देता है जबकि पानी पर डोलायमान रहता है यह पानी का जहाज शिप है न। पानी के जहाज में साथ रहना सरल नहीं है। हर समय स्थिति डांवाडोल रहती है। पानी का डोलना तो सदा सुहाता है परन्तु रिश्तों का डोलना संबंधों के सभी बंध खोलकर रख देता है। जिन्हें खोलने की ख्वाहिश भी न हो, उन ख्वाहिशों का भी दम निकल जाता है।

संबंधों के बीच की ऐसी रिले जो कभी भी टूट सकती है, फ्यूज हो सकती है यूज होने के बाद। ऐसी कोई रिले आज तक नहीं बनी जिससे सदा तारतम्यता बनी रहे, समन्वयता तक। रिले वो जो साथ ले चले, डोलती तो रहे पर खौलने की नौबत न आए। खौलने की नोबत आते ही सब कुछ खुल जाता है और फिर रीत जाता है। रीतते हुए भी सब बीता हुआ याद आता है। बीता हुआ सुख कम दुख अधिक देता है। बीतने वाली यह रीत किसी भी भीत का आड़ लेकर सामने आने से, रीतने से, चुकने से रूक नहीं पाती है। चुकने के लिए चूक से बचने की कवायद जोर पकड़ रही है बल्कि जोर की डोर कस कर थामी जाती है। यह डोर अंग्रेजी के दरवाजे को पकड़ता नहीं है यह तो लिंक है उस डोर का जो रस्सी है – रस्सी जो अंधेरे में सांप बन जाती है और सांप जहर का पर्याय है, गरल ही स्मरण आते हैं विषाद बन जाते हैं।

सांप का जहर के साथ लिव इन रिलेशनशिप है जो सिर्फ किसी को काटे जाने पर ही भंग होता है और काटने पर रीतते हुए भी रीतता नहीं है। रीतने के बाद भी जहर का भय इंसान के मन से नहीं निकल पाता है। जिन्होंने सांप के काटने को देखा है, वे यह भी जानते हैं कि जब सांप दांत गड़ाता है जो जहर को इंजेक्ट करता है और सब खाली कर देता है पर भय खाली होने के बजाय और भर जाता है। यह भरना भय की संबंधों की न टूटने वाली रिले या लय है। यदि यही लय साथ रहने के संबंधों में बनी रहे तो फिर काहे की शिकायत – कोई शिकायत करेगा भी नहीं। डर नहीं लगेगा तो सांप को मारने का प्रयास न तो किया जाएगा और न ही सांप कभी मारा ही जाएगा। सांप जब काट रहा होता है, तो देखने वाले को सांप द्वारा खुद को भी काटने के अहसास की आ रही फुरफुरी शरीर का रोम-रोम हिला देती है। यही संबंधों का लिव इन रिलेशन है जो पानी में शिप की तरह तैरता रहता है।

हवा में आक्सीजन और कार्बन डॉइऑक्साइड की रिलेशनशिप जानते ही हैं आप। शरीर में जाने पर शरीर में तैयार बैठे फेफड़े तो ऑक्सीजन को दबोच लेते हैं पर कार्बन डॉइऑक्साइड को फड़फड़ाने के लिए छोड़ देते हैं। पेड़ की नीति इस मामले में अद्भुत है, पीपल सदा ऑक्सीजन छोड़ता रहता है इसलिए उसकी पूजा की जाती है। अन्य वृक्षों में रात का सीजन ऑक्सीजन छोड़ने का होता है। कार्बन डॉइऑक्साइड को लेना और ऑक्सीजन को छोड़ना या ऑक्सी़जन को लेना कार्बन डॉइऑक्साइड को छोड़ना – यह लिव इन रिलेशनशिप में आती दरार को व्यक्त करते हैं। फिर भी जो कार्बन डॉइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं, ऐसे पेड़ सदा फल देते हैं। तने और पत्ते़ हरियाली देते हैं और बतौर बोनस छाया भी देते हैं।
इंसान सदा ऑक्सीजन ग्रहण करता है पर छोड़ता सिर्फ कार्बन डॉइऑक्साइड को ही है। लिव इन रिलेशनशिप में क्या कभी इंसान पेड़त्व को प्राप्त कर सकेगा। इंसान को मरना तो मंजूर होगा परंतु इस गुण की प्राप्ति के लिए लालायित नहीं होगा, विरले ही होते हैं जिनमें यह गुण स्वाभाविक रूप से विद्यमान होता है। यह गुण पैदा नहीं किया जा सकता है जबकि पेड़त्व को प्राप्त होना ही इंसानत्व की असल प्राप्ति है।

लिव इन रिलेशनशिप इस्तेमाल करने में ही क्यों पहचानी जाती है – देने में क्यों नहीं सिर्फ भोगने और पाने के लिए ही है यह रिलेशनशिप। इंसान में शारीरिक तौर पर इसी के लिए ऐसे पानीय संबंध का इजाद किया गया है जिसके बाद छिपा जा सकता है और छिपाया जा सकता है। जिस दिन देने के लिए संबंधों का निर्वाह होना शुरू हो जाएगा उस दिन किसी सुप्रीम कोर्ट की जरूरत नहीं रह जाएगी, पर क्या कभी ऐसी सुखद स्थिति आएगी ?

नेता की नोटों के साथ जो लिव इन रिलेशनशिप है उसकी चाहत सभी को होती है पर सब ऐसे परमत्व को प्राप्त नहीं हो पाते हैं जिनके मूल में वोटों के साथ लिव इन रिलेशनशिप का सही तारतम्य नहीं बनना है और इसी के कारण कुर्सी के साथ वाली लिव इन रिलेशनशिप नहीं बन पाती है और जैसे जिप को खोला जाता है वैसे ही दूध में से मक्खन को अलग कर लिया जाता है और उसका दूध नाम कायम नहीं रहता, यम बनकर उसे जुदा कर देता है यानी सेपरेट करता है और खालिस दूध को अपने कारनामे से सपरेटा नाम देता है। विचारणीय है कि जब यम अपने संबंधों में से यमत्व को नहीं निकाल सकता है तो लिव इन रिलेशनशिप में दैहिक संबंधों को कैसे अलग रखा जा सकता है, वैसे इन्हें अलग रखने की कोई जरूरत भी नहीं होनी चाहिए, मेरा यही मानना है यदि लिव इन रिलेशनशिप पर अमल करने वालों को इन्हें मानने में कोई हर्ज नहीं है तो इन्हें इतना सुर्खियों में लाने की जरूरत भी नहीं है।

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