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योग व प्राणायाम का वैज्ञानिक आधार

Posted On: 24 Jul, 2016 Others में

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योग व प्राणायाम का वैज्ञानिक आधार

डा. अवनीश कुमार उपाध्याय

प्रभारी चिकित्साधिकारी

राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय, पीपली,

पिथौरागढ़ -262501 (उत्तराखंड)

Avnish photoडा. अवनीश उपाध्याय आयुर्वेद स्नातक होने के साथ इंस्टीट्युट आफ क्लीनिकल रिसर्च, नई दिल्ली से क्लीनिकल रिसर्च में पोस्ट ग्रेजुएट है साथ ही देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार से एथ्नो-मेडिसिन (आयुर्वेद) विषय में पी एच डी शोधरत है योग व आयुर्वेद में 15 वर्षों से भी अधिक अनुसंधान का अनुभव है इन्होने स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृण्ण के सानिध्य में योग और आयुर्वेद के विभिन्न विषयों पर शोध कार्य किया है | डा. उपाध्याय के शोध कार्य विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं | वर्तमान में वह राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय, पीपली, पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) में प्रभारी चिकित्साधिकारी के रूप में कार्यरत हैं साथ ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य शिक्षा एवं अनुसंधान, हरिद्वार, पतंजलि रिसर्च फाउन्डेशन, जीनिएस फूड्स एवं इंटरनेशनल हर्बल कारपोरेशन आदि को वरिष्ट गुणवत्ता नियंत्रण एवं अनुसंधान परामर्शदाता के रूप में अपनी सेवायें प्रदान कर रहे हैं | डा. उपाध्याय स्थानीय जनता के निवेदन पर विज्ञान विषयों के अध्यापक न होने के कारण राजकीय इंटर कालेज, पीपली में जीव विज्ञान एवं रसायन विज्ञान विषयों के अध्यापन का कार्य भी कर रहे हैं |

योग एवं प्राणायाम

यद्यपि योग एवं प्राणायाम सहित तमाम चिकित्सा विधायें किसी प्रमाण की मोहताज नहीं है। परंतु आज विज्ञान का  युग है और आधुनिक विज्ञान ने पिछले दिनों काफी प्रगति की है। अतः आज की आवश्यकता है कि हम अपनी पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक पैरामीटर्स को अपनाकर उन्हें व्यापक एवं विश्व स्तर पर कैसे स्थापित कर सकते हैं। योग एवं प्राणायाम सहित प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को विज्ञान सम्मत रूप से स्थापित करने के लिए चिकित्सीय परीक्षण (क्लीनिकल ट्रायल) की परिपाटी प्रारंभ की गई है। इन अध्ययनों को उद्देश्य योग की प्रामाणिकता को मूर्त रूप देना है, विभिन्न चिकित्सीय परीक्षणों के आंकलन से स्पष्ट हुआ है कि योग प्राणायाम सामान्य बीमारियों के साथ-साथ जीर्ण, घातक एवं प्राणलेवा बीमारियों को समूल नष्ट करने में भी सक्षम है। आवश्यकता है योग एवं प्राणायाम की सही विधियों का नियमित रूप से अभ्यास करने की।

सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि योग का नियमित रूप से अभ्यास करने मोटापा, उच्च रक्त चाप, संधिवात, मधुमेह, यकृत विकार, हृदय रोग, अस्थमा आदि रोगों में उत्साहवर्धक लाभ प्राप्त होता है। योग एवं प्राणायाम किसी औषधि की तरह उन रिसेप्टर्स पर काम करता है जिन पर वह औषधि करती है। योग एवं प्राणायाम से रोगियों के शारीरिक भार, उच्च रक्तचाप, पल्मोनरी क्रियाशीलता, इलेक्टोकार्डियोग्राम अध्ययन, रक्तशर्करा स्तर, लिपिड प्रोफाईल, लीवर प्रोफाईल, रीनल प्रोफाईल, आर्थराईटिस प्रोफाईल आदि में व्यापक सकरात्मक सुधार दृष्टिगत हुआ है। अब योग एवं प्राणायाम  के प्रभावों की दीर्धकालिक अध्ययन की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक अवधारणा

प्राण का आयाम (नियन्त्रण) ही योग व प्राणायाम है। हमारे शरीर में जितनी भी चेष्टाएँ होती हैं, सभी का प्राण से प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध है। प्रतिक्षण जीवन और मृत्यु का जो अटूट सम्बन्ध मनुष्य के साथ है, वह भी प्राण के संयोग से ही है। संस्कृत भाषा में जीवन शब्द ‘जीव-प्राणधारणे’ धातु से बना है और मृत्यु शब्द ‘मृङ् प्राणत्यागे’ से। जीवन का अर्थ है- प्राणों को धारण करना और प्राणों का त्याग ही मृत्यु है। सभ्य समाज में मनुष्य की उन उचित संवेदनाओं को भी रोक लेता है जो प्रदर्शित हो जानी चाहिए। ऐसी स्थिति में मानसिक तनाव उत्पन्न होता है। विचार से उत्पन्न भावनाओं को कार्य करने के लिये शरीर से हारमोन्स का स्राव होता है जो ‘पिट्यूटरी ग्लैन्ड’ करता है। मस्तिष्क में संदेश वाहक के दो सिस्टम होते हैं

  • आटोनामिक नर्वस सिस्टम
  • मोटर एवं सेन्सरी सिस्टम

आटोनामिक नर्वस सिस्टम हमारे वश में नहीं हेाता है। यह शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है और इसके दो भाग होते हैं-

  • सिम्पैथैटिक सिस्टम (सूर्य नाड़ी)
  • पैरासिम्पैथैटिक सिस्टम (चन्द्र नाड़ी)

आधुनिक वैज्ञानिक मत: तनाव मानसिक दबाव ही बीमारियों का कारण एवं कारक है, विपरीत तनाव की प्रतिक्रिया सेरेब्रल कार्टेक्स एवं भावनात्मक कार्टेक्स में असंतुलन होने के कारण उत्पन्न होती है परन्तु तनाव की यह परिस्थितियां निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती हैं:

बाह्य कारण – यह मनुष्य की दिनचर्या, कार्य-पद्धति एवं आस-पास के वातावरण पर निर्भर करती है

आन्तरिक कारण – मनुष्य अनुवांशिकीय एवं वातावरण के विभिन्न घटकों से मिलकर बना है। अनुवांशकीय कारणों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। परन्तु यह हमारे मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य हेतु अत्यंत आवश्यक है। यह हमारे विश्वास, आशाओं, व्यवहार, अपेक्षाओं आदि को मूर्तरूप प्रदान करता है।

समाज एवं परिवार – परिवार के सदस्यों से अपेक्षित व्यवहार का न मिलना, संवाद ष्बातचीतष् में कमी होना, मूल-मान्यताओं में भिन्नता होना आदि के कारण तनाव होता है।

कार्य-व्यवसाय – जहां हम कार्य करते हैं वहां तनाव के विभिन्न कारण हो सकते हैं। जैसे स्पष्ट कार्य का निर्धारण न होना, प्रशंसा न मिलना, नियमों से संतुष्ट न होना, अपनी रुचि के अनुसार कार्य न मिलना आदि।

भौतिक-मनोवैज्ञानिक – साफ सफाई की उचित व्यवस्था न होना, अत्यधिक तापमान होना, उपयुक्त संसाधनों का न होना आदि। आफिस की राजनीति, सुरक्षा का अभाव, शत्रुतापूर्ण वातावरण, मनोवैज्ञानिक तनाव उत्पन्न करते हैं।

मूल मान्यताएं एवं सामाजिक परिवर्तन – आज नई एवं पुरानी पीढ़ी की मूल मान्यताओं में काफी भिन्नता है जो तनाव का एक प्रमुख कारण है। साथ ही नए सामाजिक ढांचे में तकनीकी क्षेत्र में हुई प्रगति एवं आर्थिक क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण भी आधुनिक जीवन शैली में पहले की अपेक्षा तनाव आया है। भीड़भाड़ वाले शहर, व्यवसाय की तेज रफ्तार आदि के कारण मनुष्य का शोषण भी हुआ है एवं जुर्म में भी  वृद्धि हुई है।

आर्थिक – वित्तीय समस्या एवं आर्थिक परिवर्तन के कारण जैसे धन का अभाव, धन की बचत का सही जगह पर न होना

मानसिक दबाव पर हमने विभिन्न प्रकार के रिसर्च देखे हैं। आपके शरीर  एवं मस्तिष्क में क्या चल रहा है, इसका ज्ञान आपको मानसिक दबाव की रोकथाम को समझने के लिये सहायता करेगा। इस विज्ञान एवं मानसिक दबाव की थ्योरी का ज्ञान हमको मानसिक दबाव प्रबन्धन के तरीकों को पूरी तरह समझने में सहायक होता है। इस ज्ञान के आधार पर आप यह समझ सकते हैं कि अच्छी मानसिक दबाव प्रबन्धन योग्यता आपको अच्छा महसूस करने के लिये ही नहीं है बल्कि यह अच्छा विज्ञान है और अच्छी दवाई भी है। सबसे पहले आप मानसिक दबाव कब महसूस करते हैं? नसों का जटिल मेल-जोल, मांसपेशी, हारमोन्स, आरगन्स एवं प्रणाली का क्या तात्पर्य है? जिसके द्वारा न अच्छे लगने वाले लक्षण उत्पन्न होते हैं जैसे – कमजोर मांसपेशियां, सरदर्द, भावनात्मक क्षति को महसूस करना और दूसरे लक्षण ? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने के लिये हमें हजारों साल पीछे का जीवन देखना पड़ेगा। यह हमको हमारे शरीर के प्रोग्राम जो डर और खतरे में प्रतिक्रिया करता है, के विषय को समझने में पूरी मदद करेगा है। वायु के निष्कासन की अनिवार्य प्रक्रिया इसी की सक्रियता के साहाय्य से संपन्न होती है। हृदय से ले कर नाभि तक के क्षेत्र में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं के सुचारू-संचालन को समान नामक प्राण सुनिश्चित करता है। इसका निवास भी नाभि के आसपास का क्षेत्र है। यकृत, आंत्र, प्लीहा व अग्न्याशय सहित संपूर्ण पाचन तंत्र की आंतरिक प्रक्रियाओं को यह नियंत्रित करता है। यही भोजन से बने रसों की शरीर के विभिन्न अंगों में आपूर्ति करता है। व्यान नामक प्राण त्वक् आदि इंद्रियों के साथ समस्त शरीर में परिव्याप्त रहता है।

योग व प्राणायाम में हम सिम्पैथैटिक सिस्टम (सूर्य नाड़ी) व पैरासिम्पैथैटिक सिस्टम (चन्द्र नाड़ी) को बैलेन्स करते हैं जिससे शरीर पर इसका उचित एवं अच्छा असर रहे। क्योंकि तनाव में सिम्पैथैटिक सिस्टम उत्तेजित हो जाता है और शरीर में तनाव का कारण एवं तनाव संबंधी हारमोन ष्एड्रीनालीन, नाटएड्रानालीन एवं कार्टीसोलष् का स्राव बढ़ा देते हैं। प्राणायाम, नाड़ी शोधन का कार्य कर इसको बैलेन्स कर देता है। कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से संदेश मस्तिष्क को जाते हैं संदेशों का विश्लेषण, संश्लेषण और इंटीग्रेशन मस्तिष्क के कार्टेक्स में होता है। सत्संग एवं अच्छे विचारों से हमारा कार्टेक्स उन संदेश को जो अनुचित अथवा शरीर, स्वास्थ्य, समाज के लिये उचित नहीं हैं उनको अलग कर  मानव को उच्च एवं आनन्दमय जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान करता है।

प्राणायाम और योग से एन्डारफीन एवं एनसिपिफैलिन आदि हारमोन्स का स्राव होता है। चिकित्सा क्षेत्र में शोध का विषय भी आजकल यही है कि अवसाद और दुःख जिसे सिरोटोनिन डोपामीन एवं नारएड्रनालीन हारमोन्स की मात्रायें अनियमित हो जाती हैं उनको प्राणायाम, योग, ध्यान एवं सतसंग के माध्यम से उचित मात्रा में लाकर मनुष्य आनन्द का अनुभव करता है। परिवार, समाज एवं देश के लिये सृजनात्मक इकाई के रूप में अपना योगदान करता है।

ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम का एक और भाग होता है जिसकी हम ज्यादातर बात नहीं करते वो हैं ऐन्टिरिक नर्वस सिस्टम। यह नसों में सबसे जटिल है हमारे पेट की क्रिया को नियमित करता है, जब आप का पेट खराब हो जाता है तो आप ऐन्टिरिक नर्वस सिस्टम को दोष दे सकते हैं। प्राणायाम, योग के प्रयोग से यह प्रायः देखा गया है कि मनुष्य की श्वास नाड़ियों में भी बेहतरी होती है। जो लोग योग एवं प्राणायाम करते हैं तो उनके पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट में निश्चित् सुधार हुआ। यह प्रमाणित करता है कि योग से हम लोग श्वास की कई बीमारियों से मुक्ति पा सकते हैं और सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण से आजादी मिल सकती है।

योग एवं प्राणायाम के अभ्यास को करने से मुख्य लाभ: मनोशरीरवृत्तिक (साइको सोकोटिक) सर्वेक्षणPadmasan copy

  • पाचन तंत्र पूर्ण स्वस्थ हो जाता है तथा समस्त उदर रोग दूर होते हैं।
  • हृदय, फेफडे़ व मस्तिष्क सम्बन्धी समस्त रोग दूर होते हैं।
  • मोटापा, मधुमेह, कोलेस्ट्रोल, कब्ज, गैस, अम्लपित्त, श्वास रोग, एलर्जी, माइग्रेन, रक्तचाप, किडनी के रोग, पुरूष व स्त्रियों के समस्त यौन रोग आदि सामान्य रोगों से लेकर कैन्सर तक सभी साध्य-असाध्य रोग दूर होते हैं।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक विकसित हो जाती है।
  • डायबिटीज व हृदय रोग आदि से बचा जा सकता है।
  • बालों का झड़ना व सफेद होना, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ना, नेत्र ज्योति के विकार, स्मृति दौर्बल्य आदि से बचा जा सकता है। अर्थात् बुढ़ापा देर से आयेगा तथा आयु बढ़ेगी।
  • मुख पर आभा, ओज, तेज व शान्ति आयेगी।
  • मन अत्यन्त स्थिर, शान्त व प्रसन्न तथा उत्साहित होगा तथा डिप्रेशन आदि रोगों से बचा जा सकेगा
  • ध्यान स्वतः लगने लगेगा तथा घण्टों तक ध्यान का अभ्यास करने की सामथ्र्य प्राप्त होगी।
  • स्थूल व सूक्ष्म देह के समस्त रोग व काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार आदि दोष नष्ट होते हैं।
  • शरीरगत समस्त विकार, विजातीय तत्त्व, टाक्सिंस नष्ट हो जाते हैं।
  • नकारात्मक विचार समाप्त होते हैं तथा प्राणायाम का अभ्यास करने वाला व्यक्ति सदा सकारात्मक विचार, चिन्तन व उत्साह से भरा हुआ होता है।

भारतीय जूनियर फुटबाल टीम पर योग एवं प्राणायाम के प्रभाव का अध्ययन

भारतीय जूनियर फुटबाल टीम के 15 साल से कम उम्र के बच्चों को एक सप्ताह का संक्षिप्त योग-प्राणायाम कोर्स कराया गया ताकि इन्हें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से तैयार किया जा सके। अभ्यास के साथ-साथ सभी खिलाड़ियों को पूर्णरूप से संतुलित एवं सात्विक भोजन दिया गया। कुशल योग प्रशिक्षकों, चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों के निर्देशन एवं देख-रेख में उनके सुबह से रात्रिपर्यन्त क्रियाशीलता की समय-सारिणी तैयार की गयी। खिलाड़ियों का योग अभ्यास से पूर्व अर्थात प्रारंभ में एवं योग अभ्यास के पश्चात पूर्ण शारीरिक एवं पैथालाजिकल परीक्षण किया गया जिसके परिणाम सकारात्मक ही नहीं उत्साहवर्धक रहे। अन्य विश्वस्तरीय टीमों जिनकों तनाव आदि को दूर करने के लिए तनाव दूर करने वाली औषधियों स्ट्रेस किलर्स का सहारा लेना पड़ता है। (उपाध्याय ए के, इंटरनेशनल जर्नल आफ योगा रिसर्च – 2010)

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