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काँधे पे अपने रख के अपना मज़ार गुज़रे।।

Posted On: 31 Mar, 2013 Others में

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Naaz

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यूँ तेरी रहगुज़र से दीवानावार गुज़रे,
काँधे पे अपने रख के अपना मज़ार गुज़रे।।
यही एक तमन्ना लेकर मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने अपने महबूब की आग़ोश में दम तोड़ दिया और फिर कभी आँख नहीं खोली। गु़रबत ने बचपन छीन लिया, जवानी में प्यार नसीब नहीं हुआ और वक़्त से पहले जैसे जि़न्दगी ने भी दामन छुड़ा लिया। महज़ 39 साल की छोटी सी जि़न्दगी 31 मार्च 1972 को एक लम्बे दर्द के बाद ख़त्म हो गयी। रह गयीं तो बस यादें। फि़ल्मी परदे की ग़मग़ीन अदाकारी, फि़ज़ाओं में बिखरी एक भूली-बिसरी आवाज़ और काग़ज़ पर उतरा उनका दर्द भरा बयान जो ग़ज़ल बन कर कहीं ख़ामोशी से सिमटा रखा है।
कम लोग जानते हैं कि मीना कुमारी ने अपनी आवाज़ में एक एलबम भी निकाली थी। उसमें उनकी ख़ुद की ग़ज़लें थीं। वह ‘नाज़’ उपनाम से शायरी किया करती थीं। 18 साल की उम्र में अपने से दोगुनी उम्र के कमाल अमरोही के साथ शादी की। पहले से शादीशुदा कमाल अमरोही के साथ शादी मीना कुमारी के लिए एक दर्द भरा रिश्ता साबित हुई। प्यार, विश्वास से शुरू हुआ रिश्ता कब शक़शुबा की भेंट चढ़ कर खोखला होने लगा, पता ही नहीं लगा। एक तरफ़ दूरियाँ बढ़ती गयीं तो दूसरी तरफ़ उनकी जि़न्दगी शराब में ग़र्क होती रही। फि़ल्में छूटीं, रिश्ते-नाते अलग हो गए। रह गयी तो बस तन्हाई। यही तन्हाई जब दर्द का बाज़ार गर्म करती तो अदाकारा एक शायरा बनकर बरबस कलम उठा लेती। आखि़री दम तक मीना कुमारी के साथ अगर कोई साये की तरह साथ रहा तो वह थी शराब और उनकी ग़ज़ल। मरने से ठीक पहले उनकी एक तमन्ना ज़रूर पूरी हुई। पति की बाहों में दम तोड़ कर और अपना सारा कलाम अपने करीबी गुलज़ार को सौंप कर वह हमेशा के लिए इस दर्द भरी जि़न्दगी से छुटकारा पा गयीं।
बेशक आज मीना कुमारी नहीं हैं, मगर दर्द में डूबी उनकी अदाकारी के दीवाने आज भी बहुत हैं। अलग बात है कि उन्हें चाह सकने वाला एक भी दीवाना उन्हें तमाम उम्र मयस्सर न हो सका और प्यार माँगते-माँगते एक आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामोश हो गयी, लेकिन उनका लिखा कलाम आज भी जैसे उनके ग़म को ताज़ा कर रहा है।

मीना कुमारी की लिखी ग़ज़लें

ग़ज़ल-1

यूँ तेरी रहगुज़र से दीवानावार गुज़रे,
काँधे पे अपने रख के अपना मज़ार गुज़रे।।
बैठे रहे हैं रस्ते में दिल का खण्डहर सजा कर,
शायद इसी तरफ़ से इक दिन बहार गुज़रे।।
बहती हुईं ये नदियाँ, घुलते हुए किनारे,
कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे।।
तूने भी हमको देखा हमने भी तुझको देखा,
तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे।।

ग़ज़ल-2

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है,
रात ख़ैरात की सदक़े की सहर होती है।।
साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब,
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है।।
जैसे जागी हुई आँखों में चुभें काँच के ख़्वाब,
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है।।
ग़म ही दुश्मन है मेरा ग़म ही को दिल ढूँढ़ता है,
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है।।
एक मर्कज़ की तलाश एक भटकती ख़ुश्बू,
कभी मंजि़ल कभी तम्हीदे-सफ़र होती है।।

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