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अइसन भी पवित्र होत हैं !

Posted On: 9 Jan, 2012 Others में

संतोष त्रिवेदीबैसवारे की धरती से...!

संतोष त्रिवेदी

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कुहरा और बरसात के मारे हम आज चौपाल मा तनिक देर से पहुँचे। जाते ही बदलू काका ने हमें घेर लिया और लगा दी झड़ी सवालों की। “सुने हो मास्टर जी ! ई भाजपा को का होइ गवा है ? अभी कुछ रोज पहिले तक यहिके नेता लोग अन्ना बाबा के गुन गावत फिरत रहे। अब सब भूलि गए का ?” मैंने लगभग अनजान बनते हुए पूछ ही लिया , “काका ! काहे इत्ता परेशान हौ ? का बात है ?” काका फुल जोश में बोले जा रहे थे, “ई बसपा के नेता हाल-फ़िलहाल तक बहिनजी के साथ मलाई पर हाथ साफ कर रहे थे, खूब लूट-लाट मचाई और इहाँ तक कि कुछ लोगन का टपकाय भी दिहेन पर अब भाजपा में शामिल होइ के अगड़ा-पिछड़ा और अन्याव का रोना रो रहे हैं। सबसे मजेदार बात तौ यह है कि भाजपा वाले कहि रहे हैं कि ऊ कुच्छौ गलत नाहीं किये हैं।”

मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करते हुए समझाया ,”काका ! अब जमाना काफ़ी बदल चुका है और राजनीति भी। जब डाकू रत्नाकर अपना मन बदल कर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं, हिन्दुओं का बड़ा ग्रन्थ लिख सकते हैं तो ये छोटे-मोटे धंधे करके अपने परिवार का पेट पालने वाले नेता क्यों नहीं बदल सकते ? इनके बदलने से अगर कोई पार्टी शुद्ध हो रही हो , सत्ता के नजदीक आकर लोगों की सेवा के लिए बेताब हो तो इसमें हर्ज़ ही क्या है ?”
काका मेरी बात से मुतमईन न लगे। मैंने उन्हें और पौराणिक उदाहरण दिए। काका सुनो, “जब भगवान राम को लंका में बुराई पर अच्छाई की जीत चाहिए थी तो उन्होंने विभीषण को अपनी ओर मिलाया ताकि बुराई को ख़त्म करने में मदद मिल सके। अब वही काम राम के भक्तों वाली पार्टी कर रही है तो यह एक आदर्श स्थापित हो रहा है। आप नाहक परेशान हैं। इस पार्टी के लोगों ने यह भी कहा है कि उनके यहाँ जो भी आता है,पवित्र हो जाता है,बिलकुल पतितपावनी गंगा की तरह !”

काका ने फिर प्रतिवाद किया, “अभी दो दिन पहले ये सब संसद में हंगामा मचाय रहे कि मज़बूत लोकपाल लाना बहुतै ज़रूरी है और अन्ना बाबा का हमरा फुल सपोट है,तो उसका क्या ?” हमने कहा, “काका ! ई लोकपाल तो तभी जाँच करेगा न , जब कोई घपला-घोटाला होगा। सो, उसकी उपयोगिता को प्रमाणित करने के लिए पहले कुशल भ्रष्टाचारियों की भर्ती भी तो ज़रूरी है। बाद में जाँच शुरू होते ही वे उन्हें हटाकर डंके की चोट पर पाक-साफ भी बन जायेंगे। आखिर पार्टी विद डिफरेंट भी तो दिखना ज़रूरी है। जो भी सेवा कार्य या देश हित करना है, वह सत्ता में आये बिना कैसे हो सकता है ? सो, कुर्सी के लिए थोड़ा एडजस्टमेंट करने मा का बुराई है ?”

अब तक बदलू काका हमारी बातों से सहमत हो गए लग रहे थे, हम फिर से मिलने का वादा करके घर चले आए क्योंकि शाम के समाचारों में क्या पता …… कोई फिर पवित्र हो गया हो ?

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