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मिलिये मुलायम सिंह गुप्ता और अखिलेश सिंह बिष्ट से

Posted On: 13 Nov, 2012 Others में

बेबाक विचार, KP Singh (Bhind)Just another weblog

bebakvichar, KP Singh (Bhind)

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मुलायम सिंह गुप्ता और अखिलेश सिंह बिष्टउत्तर प्रदेश के यादवों में आजकल इस तरह के जुमलों से सपा के मुखिया की चुटकी ली जा रही है। मुलायम सिंह ने अपने हर सत्ता कार्यकाल में यादवों के स्याह सफेद सभी कामों को सीनाजोरी के साथ संरक्षण दिया जिससे यादवों ने अपनी सरकार आने का दूसरा भाव ग्रहण करने की मानसिकता बना ली लेकिन मुसलमानों के मामले में सरकार इतनी छुईमुई बन चुकी है कि यादव गलती पर हों या न हों इस सरकार में उन्हें नाप दिया जा रहा है। इससे अपनी बिरादरी के पोप कहे जाने वाले मुलायम सिंह से उनका मोहभंग होने लगा है।

जहां तक यादवों का प्रश्न है यह कौम बेहद मेहनती, उद्यमी और संस्कारवान रही है। पुलिस भर्ती में यादवों को अतिरिक्त प्रोत्साहन का काम 1977 की रामनरेश यादव के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार ने सबसे पहली बार किया था लेकिन यह बात भी अपनी जगह सही है कि उनके समय के निकले दरोगाओं ने पेशेवर ईमानदारी और कार्यकुशलता का शानदार प्रदर्शन किया। पुलिस के मामले में यादवों में कुछ ऐसे गुण हैं कि विभाग में इस बिरादरी के लोगों से ज्यादा दूसरे बेहतर लोग कम ही मिलते हैं। पुलिस में जाने का यादवों को शौक भी बहुत है। पिछली बार मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे तब मुझसे बहुत लोगों ने कहा कि हजारों पुलिस वालों की जो भर्ती हो रही है उसमें 75 प्रतिशत खाकी के यादवीकरण की मुलायम सिंह की योजना है। मैंने तत्कालीन अपर पुलिस महानिदेशक कार्मिक बीएल यादव से इन जनचर्चाओं का जिक्र किया। उन्होंने कंप्यूटर से निकलवाकर मुझे पुलिस भर्ती के आवेदकों का जातिवार ब्रेकअप दिखाया। यादव आवेदक किसी भी कौम से कई गुना ज्यादा थे तो जाहिर है कि यादवों की भर्ती भी ज्यादा होगी। मायावती की सरकार में भर्तियां हुईं उनमें भी तो यादव सबसे आगे रहे। कारगिल की लड़ाई के शहीदों की सूची मैंने पढ़ी है। इन भारतीय सैन्य अधिकारियों और जवानों में यादवों की अच्छी खासी संख्या थी। यादवों में ऐसे ही गुण के कारण दूसरी सरकार में भी खास तौर से कोई मसला फंसने पर लोगों की ओर से यादव दरोगा या अधिकारी पर ही भरोसा जताया जाता रहा है।

अफसोस यह है कि अब ऐसा माहौल बना दिया गया है कि जैसे मुलायम सिंह जब सत्ता में नहीं आये थे तो सारे यादव घास चरते थे। ढाबा और ट्रांसपोर्ट की बिजनेस पर यादवों का पहले से ही कब्जा था। यादव की एक उत्थानशील कौम के रूप में पहचान को मुलायम सिंह को आगे रखकर अब झुठलाने की कोशिश होती है तो बहुत कोफ्त होती है लेकिन यह जरूर है कि मुलायम सिंह ने विवादित कामों की ओर यादवों का रुझान मोड़ा। इससे यादवों की छवि को कुछ बट्टा लगा। अभी भी यादव बहुतायत में भले हैं लेकिन मुलायम सिंह ने दबंग यादवों की पहचान को इतना भारी कर दिया है कि उनकी अच्छाइयां अन्य लोगों को दिखायी ही नहीं पड़तीं। जाहिर है कि इस माहौल में मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश के सत्ता में रहते हुये यादवों को दंड झेलना पड़े यह उन्हें बर्दाश्त नहीं हो सकता।

यादव को लग रहा है कि जब बात मुसलमानों की आती है तो उन्हें नीचा दिखाया जाता है। मुलायम सिंह अपनी ही कौम के प्रति बेगाने क्यों हो रहे हैं यह बताने के लिये वे उन्हें गुप्ता और उनके पुत्र अखिलेश को उनके वैवाहिक संबंध के कारण बिष्ट ठाकुर कहने लगे हैं। हर कौम और इंसान की तरह मुसलमानों के अंदर भी अच्छाई और बुराई दोनों तरह के गुण हैं। मुसलमान भी तालीम चाहते हैं, विकास चाहते हैं। इंसाफ पसदंगी से भी उन्हें परहेज नहीं है। कांग्रेस ने मुसलमानों में शरीफ लोगों को नेतृत्व की पंक्ति में आगे किया तो मुसलमानों ने उसे दिल खोलकर समर्थन दिया पर जहां कांग्रेस ने मौलाना अब्दुल कलाम आजाद व रफी अहमद किदवई जैसे सितारे नेता मुसलमानों के बीच से निकाले वहीं मुलायम सिंह का टेस्ट रहे अतीक अहमद जैसे लोग। अपने हित के लिये मुस्लिम कौम को उद्दंड और अराजक रास्ते की ओर डाइवर्ट करने को वे बदनाम लोगों की पीठ पर हाथ रखते हैं और इस प्रक्रिया में मौजूदा समय में ब्लैकमेलरों में अपनी गर्दन फंसा बैठे हैं। प्रदेश में इसी कारण दंगों की घटनायें फिर शुरू हो गयीं।

मुलायम सिंह संतुलन बनाकर दंगों की आग पर पानी डालने की बजाय अखिलेश की पुलिस और प्रशासन से इकतरफा काम कराना चाह रहे हैं जिससे शहजोरों का मनोबल बढ़ा है। मुलायम सिंह के इस रवैये से सबसे ज्यादा खुश भाजपा है। आखिर भाजपा को जब भी ताकत मिली है तो मुलायम सिंह से ही। वीपी सिंह डिप्लोमेसी से काम लेकर अयोध्या विवाद के समाधान की कोशिशों में अच्छी खासी कामयाबी हासिल करने वाले थे लेकिन मुलायम सिंह ने सद्भावना रैलियां जिलोंजिलों में आयोजित कर अपने उत्तेजनात्मक भाषणों से वह काम किया कि क्रिया की विपरीत क्रिया में हिंदू भाजपा में गोलबंद हो गये। उत्तर प्रदेश में पहली बार सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में पहुंचाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। इसके बाद उन्होंने मलियाना कांड से लेकर अयोध्या में विवादित ढांचे के ध्वस्त होने तक जिन अफसरों पर सांप्रदायिक दृष्टिकोण अपनाने को लेकर उंगलियां उठी थीं उन सबको पोसा। आज भी उन्होंने जिन एसी शर्मा को डीजीपी के रूप में सुशोभित किया है उन पर कानपुर में रहते हुये भाजपाई दंगाइयों को बचाने का आरोप एक न्यायिक आयोग द्वारा लगाया जा चुका है।

अब फिर हालत यह हो रही है कि जब यादव तक उत्तर प्रदेश में भाजपा की ओर अवचेतन तौर पर मुखातिब होने लगे हैं तो आसार इस बात के हैं कि कहीं चुनाव में प्रदेश के अंदर दफन यह पार्टी कब्र से निकलकर फिर खड़ी न हो जाये। दूसरी ओर उनकी नीतियों से मुसलमानों का कोई ठोस भला हो नहीं पा रहा बल्कि पहले तमाम क्षेत्रों में बढ़त की उनकी जो गति बनी थी उसमें भी ब्रेक सा लग गया है।

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