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लोकपाल : अन्ना का सम्मान

Posted On: 19 Dec, 2013 Others में

BHAGWAN BABU 'SHAJAR'HAQIQAT

Bhagwan Babu

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साढ़े चार दशकों से चल रहा प्रयास, हो रहा इंतजार अब समाप्त हो चुका है। कई रैलियाँ हुई, अनशन हुए, हंगामे हुए लेकिन सरकार के कान पर जूँ तक न रेंगी। लेकिन कमाल की बात है कि दिल्ली चुनाव के परिणाम से भले ही दिल्ली की सत्ता जद्दोजहद में है लेकिन इस परिणाम ने दिल्ली ही नही पूरी राजनीति का रूख जरूर बदलकर रख दिया है। इस परिणाम में किसी राजनेता या अफसर का हाथ नही बल्कि एक आम आदमी की ताकत का नतीजा है कि राजनीति को भ्रष्टता की तरफ तेजी से जा रहे कदम को थमने का सन्देश दिया। इतना होने के बावजूद भी संसद के दोनो सदनों में हंगामे हुए, अंततः लोकपाल बिल पारित हो गया। ये तो सिर्फ इस देश के एक आम आदमी के कोशिशों का फल था। अगर सभी अपनी-अपनी कमान ईमानदारी से सम्भाल लें तो भ्रष्टाचारियों का क्या होगा, हम सब समझ सकते है, इससे इतना तो स्पष्ट है कि चुप बैठकर हम भी कहीं-न-कहीं भ्रष्टाचारियों का साथ ही देते रहते है।
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ऐसा नहीं है कि लोकपाल से पहले संविधान के किसी कानून में भ्रष्टाचारियों के लिए कोई सजा का प्रावधान नही था। तब भी लोग गलत कार्य करते थे और बच भी जाते थे। ऐसा भी नहीं है कि लोकपाल के आते ही सभी भ्रष्ट और गलत कार्य होने बन्द हो जायेंगे। क्योंकि यहाँ नेता व अफसर बीच का रास्ता निकालने में माहिर है जिसका परिणाम गलत कार्यों को अंजाम देकर लोग बच जाते है। अब लोकपाल के आते ही लोग इसमें भी बीच का रास्ता निकालने की जुगत में होंगे। क्योंकि अफसर या राजनेता सब वही है जो पहले थे, चोर चोरी नही छोड़ सकता, चोरी करने का कोई-न-कोई तरीका जरूर ढ़ूँढ़ेंगे। फिर हम उस आम आदमी (अन्ना हजारे) के तमाम कोशिशो के बाद जो लोकपाल पारित हुआ है उससे हम उम्मीद करते है कि यह देश जो भ्रष्ट देश की सूची में आगे है उसमे कुछ कमी आयेगी।
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जरूरत ईमानदारी की है, कानून और लोकपाल बिल के नियमों को पालन करने की है, लेकिन हमारे नेताओ में इसकी कमी अधिकता में है। सभी की सोच अपनी रोटी, अपने कपड़े, अपने मकान और अपनी जरूरतों को पूरा करने में रहती है, नतीजतन लूट-खसोट की राजनीति व रिश्वतखोरी के नियम अलग से बनाकर आम आदमी को चूसा जाता है। और ये तो लोकपाल के बाद भी चलता रहेगा। जब तक आम आदमी जागता नहीं है तब तक आम आदमी को लूटा ही जायेगा। अहमियत आम आदमी के जागने की है, अहमियत मंत्रियों और अफसरों में ईमानदारी की है, अगर ऐसा हो सका तो बाकी कायदे नियम-कानून की आवश्यकता ही न पड़ेगी। फिर भी आज एक आम आदमी जो निःस्वार्थ भाव से समाज की गन्दगियों को दूर करने के लिए कोशिश पर कोशिश किए जा रहे है उनकी इस कोशिश को सलाम किया जाना चाहिए, उनकी हिम्मत बढ़ानी चाहिए। आज के दौर में ऐसे लोग कम मिलते है।

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