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ढोंगी सब संसार में?

Posted On: 17 Apr, 2012 Others में

Mere BolTol mol ke bol- Par sach to bol

Bhupesh Kumar Rai

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आजकल हर जगह ढोंगी बाबाओं के चर्चे छाए हैं. टीवी,अख़बार,पत्रिकाएँ और ब्लॉगों में भी ये खूब आये हैं.इन ढोंगियों ने कैसा माया जाल रचा है कि इसमें छोटा-मोटा ही नहीं बड़ा-बड़ा फंसा है.जब इस देश के प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े लोग भी इनसे नहीं बचे हैं, तो आमजन को क्यों गिनते हैं? ये कहना तो बहुत गलत होगा की सारे प्रवचन बाबा गलत ही हैं पर अधिकतर ढोंगी बाबा ऐसे हैं कि जिनकी करतूतों से लोगों का शोषण होता है और लोगों की आस्था को ठेस पहुँचती है. जब हर कोई इनके चक्कर में लगा हुआ है तो मैंने सोचा लगे हाथ मैं भी अपने मन की भड़ास निकाल बाहर करूँ. इससे मुझे तो शांति मिलेगी ही, आपको भी कुछ ढोंगियों के प्रवचन के असली फंडे का ज्ञान और आनंद मिलेगा.
ढोंगी प्रवचन बाबा बनने के लिए कड़े अभ्यास ,प्रपंची मन और शहद से भी मीठे वचन की जरूरत होती होगी .खुद मोह-माया के ढेर में बैठकर दूसरों को मोह-माया त्यागने को तैयार करना कोई सहज कार्य नहीं है. अपने समस्त दुर्गुणों को क्रियान्वित करते और छिपाते हुए दूसरों को सदगुणों के मार्ग पर ले चलना हर किसी के बस की बात नहीं है.इसलिए प्रवचन बाबा बनना आसान है या बच्चों का खेल है, ये मानना एक भयंकर भूल होगी. इस संसार में दुखियों की भरमार है, इसलिए अपने दुखों से पार पाने के लिए दुखियारे सीधे इनके जाल में उलझ जाते हैं. कुछ सवाल बड़े काम के होते हैं और प्रायः सभी प्रवचन बाबाओं और उनके भक्तों की भी पसंद के होते हैं.
१. बच्चा! तुझे कष्ट है.
अरे! कष्ट नहीं होता तो अपना काम करता,अपने घर परिवार को देखता आपके चक्कर में क्यों पड़ता?
२. तुम दूसरों की भलाई करते हो पर तुम्हें इसका श्रेय नहीं मिलता.
बिलकुल सही निशाना. कौन कह सकता है कि वह दूसरों की भलाई नहीं करता.बड़े से बड़ा पापी भी यही मानता है कि वह लोगों की भलाई कर रहा है.दूसरी बात, ये कौन मानता है कि उसने जो भी काम किए उसका श्रेय उसे मिल ही गया, कुछ कसर तो हर किसी के मन में रह जाती है.(ये बात और है कि उसने श्रेय पाने योग्य कोई काम कभी किया हो या नहीं ये कौन सोचता है?)
३. लक्ष्मी तुम्हारे पास आती तो है पर टिकती नहीं है.
एकदम ठीक! लक्ष्मी तो है ही चंचला. लक्ष्मी तो आती-जाती रहती ही है.गरीब और मजदूर के लिए लक्ष्मी काम मिलने पर आती है और थोड़ी देर में चली जाती है.किसान की लक्ष्मी फसल कटने पर आती है और अगली फसल आने तक जाती ही रहती है.नौकरी वाले की लक्ष्मी महीने में एक बार आती है और पूरे महीने जाती रहती है.व्यापारी की लक्ष्मी रोज आती है और रोज जाती है.खजाने के ढेर में बैठा हुआ आदमी भी और लक्ष्मी की ही प्रतीक्षा में रहता है. ये सवाल भी हर समय हर किसी के लिए सटीक ही बैठता है.
ये ढोंगी बाबा लोगों पर अपना प्रभाव किस तरह से डालते हैं (या यों कहिए कि ब्रेनवास करते हैं) कि उनके चेले उनके विरुद्ध कोई बात नहीं सुनना चाहते.एक बार एक बाबा का प्रवचन था. मेरे किसी परिचित ने पूछा, चलोगे प्रवचन में? मैंने पूछा प्रवचन करने वाले बाबा जी वातानुकूलित कक्ष में और इतनी सुरक्षा में क्यों हैं? उन्होंने बताया कि बाबा के अनेक विरोधी उनकी जान के पीछे पड़े हैं. मैंने पूछा जब बाबा ज्ञान का सन्देश दे रहे हैं तो कोई उनकी जान का दुश्मन क्यों है और जब बाबा सांसारिक मोह-माया त्याग चुके तो उन्हें अपने प्राणों की इतनी चिंता क्यों है? उन्होंने बताया कि बाबा का जीवन अमूल्य है, भक्तजनों पर उनकी कृपा बनी रहनी चाहिए. मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया कि भक्तजनों की सुरक्षा की क्या व्यवस्था है. उनका जबाव सुनकर मैं धन्य हो गया कि भक्तजनों पर तो गुरूजी की कृपा है,उन्हें सुरक्षा की क्या जरुरत? बाबा तो बुलेट प्रूफ में सुरक्षित और बाबा के भक्तजन उनकी कृपा से ही सुरक्षित, क्या ये कोई चमत्कार से कम है?
मेरे एक मित्र ने एक बात बताई थी कि वे एक बार एक प्रवचन बाबा के आश्रम में बाबा से मुलाकात करने गए थे.आश्रम के जिस कमरे में प्रवचन बाबा रहते थे, उसमें से जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने की आवाज आ रही थी. कुछ देर में माजरा उनकी समझ में आया. प्रवचन बाबा अपने किसी चेले पर बुरी तरह से भड़क गए थे, शायद पैसे के हिसाब-किताब का कोई मामला था. दूसरों को शांति,धैर्य और निर्मोही रहने की शिक्षा देने वाले प्रवचन बाबा खुद ही पैसों के चक्कर में अपना धैर्य खोकर आश्रम की शांति भंग कर रहे थे.
आज दुनियाभर के पाखंडी कैसे धर्म,आस्था और प्रवचन का सहारा लेकर हमें बेवकूफ बना लेते हैं.अच्छा-भला पढ़ा लिखा आदमी इनके चंगुल में फंस जाता है.ये इन ढोंगी प्रवचन बाबाओं की चतुराई नहीं, हमारी बेवकूफी है. जब ढोंगी बाबा किसी न किसी रूप में पैसा मांग रहा हो तो क्या बात समझ में नहीं आती? जब वो अपने बड़े-बड़े आश्रमों में शानों-शौकत से रहते हुए सभी सांसारिक सुखों को प्राप्त कर रहे होते हैं, तब हमें दिखाई नहीं देता? उन्हें सुन्दर चमकीले वस्त्र पहनकर ,सुन्दर वातानुकूलित सिंहासनों में बैठा देखकर हम यह नहीं सोचते हैं कि ये त्याग का कौन सा रूप है? रोज-रोज इनकी ठगी के इतने मामले सामने आ रहे हैं फिर भी आस्था के इन ठेकेदारों के पास लुटने हम स्वयं जाते हैं. इनके कहने पर हम हजारों लुटा देते हैं पर एक भूखे,लाचार को कुछ भी देने से बचते हैं.इस वैज्ञानिक युग में हम इन ढोंगियों के फैलाए भ्रम और अन्धविश्वास के आसानी से शिकार हो रहे हैं.सोचिए जरा! क्या हम भी ढोंगी नहीं होने का ढोंग नहीं कर रहे है?

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