blogid : 24610 postid : 1250555

चमकती आँखें

Posted On: 12 Sep, 2016 Others में

Idhar udhar kiJust another Jagranjunction Blogs weblog

brajeshkumars003

5 Posts

4 Comments

तुम्हें शाम होते ही घर लौटना होगा,
हाँ, दिन ही हमारे लिए ठीक है,
तुम समझती क्यों नहीं, शाम के बाद शुरू होता है, स्याह अँधेरा,
रास्ते पर दौड़ती गाड़ियों में नहीं बैठा होता है कोई आदमजात,
निःशब्द गलियों में शिकारी भेड़ियों की घूरती आँखे,गंध पाते ही चमक उठती है, टूट पड़ते हैं समूह में और चीखें फंसकर रह जाती हैं उनके नुकीले दाँतों में, उस समय नहीं दिखाई देती इंसानी रूहें, प्रकट हो जाती हैं सैकड़ों शैतानों की आत्मायें, उत्पन्न हो उठता है, हिंसक पशुओं की लूट खसोट का वीभत्स दृश्य, चुनौती देता है मानव सभ्यता के खोखले विकास को ; सच जो अब तक छुपाया था जिसे मैंने अपने आँचल में, तुम्हें इसे ही लेकर आगे बढ़ना होगा, खोजना होंगीं वो इंसानी बस्तियां जहां पर शायद ही कभी शाम हो।
तुम सब समझने लगोगी बेटी, बस दूर रहना इन चमकती आँखों से।
(एक मां अपनी किशोरवय बेटी को समझाते हुए)

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...

  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग