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मोदी सरकार की टच एंड रन की नीति

Posted On: 12 Feb, 2018 Others में

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braj kishore singh

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मित्रों, हमारे बिहार में एक कहावत है कि मंत्र तो बिच्छू का भी नहीं पता और चले हैं सांप के बिल में हाथ डालने. पता नहीं आपके यहाँ इसके बदले कौन-सी कहावत प्रचलन में है. इसी तरह एक और कहावत भी बिहार में चलती है कि झोली में दाम नहीं और सराय में डेरा अर्थात अपने बारे में ओवरस्टीमेट होना.

मित्रों, दुर्भाग्यवश ये दोनों कहावतें इन दिनों केंद्र में सत्ता संभाल रही मोदी सरकार पर लागू हो रही है. चाहे वो नोटबंदी हो या जीएसटी, गंगा-सफाई हो या मेक इन इंडिया, हरित क्रांति हो या स्वास्थ्य क्रांति हो या पुलिस और न्यायपालिका में सुधार हो या सबके लिए आवास उपलब्ध करवाना या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हो या कालाधन या रोजगार-सृजन या कश्मीर हर मामले में मोदी सरकार पूरी तरह से असफल है या फिर आंशिक रूप से सफल है. उसने हर मामले को छेड़ जरूर दिया है लेकिन सच्चाई यह भी है कि किसी भी मामले को अंत तक नहीं ले जा पाई है और अधूरा छोड़ दिया है या छोड़ना पड़ा है.

मित्रों, पता नहीं सरकार के दिमाग में कैसा केमिकल लोचा चल रहा है? बेवजह सुरेश प्रभु का मंत्रालय बदल दिया, स्मृति ईरानी को लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जा रहा है, राफेल पर पर्दादारी की जा रही है, रोजगार की नई परिभाषा ही गढ़ दी गई है. कदाचित मोदी जी अपने बारे में ओवरस्टीमेटेड थे और हैं या फिर देश की जनता ने ही उनकी क्षमताओं के बारे में जरुरत से ज्यादा अनुमान लगा लिया. आज भी मोदी जी के पास सिवाय जन-धन खातों और उज्ज्वला के कुछ भी नहीं है और अगर कुछ है भी तो अभी परिणति से कोसों दूर है. सबसे हद तो कश्मीर में की जा रही है. भाजपा और महबूबा दोनों निहायत विपरीत ध्रुवों की राजनीति करते हैं और और अभी भी कर रहे हैं जिससे वहां विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है.

मित्रों, गांवों में एक और कहावत है कि नीम हकीम खतरे जान. अब अपने देश की अर्थव्यवस्था को ही लीजिए जो आगे जाने के बदले पीछे जा रही है. जैसे कोई झोला छाप डॉक्टर किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीज का ईलाज करता है और बार-बार दवा बदलकर प्रयोग करता है वैसे ही जेटली जी भी अंदाजन दवा-पर-दवा बदलते जा रहे हैं. मरीज ठीक हो गया तो श्रेय लूट लेंगे और ठीक नहीं हुआ तो वैश्विक स्थिति पर सारा ठीकरा फोड़ देंगे.

मित्रों, जो गलती बिहार में नीतीश ने नौकरशाही के बल पर शासन सुधारने की कोशिश करके की वही गलती इन दिनों मोदी सरकार कर रही है. सरकार तो वाजपेयी जी ने भी चलाई थी और हर मंत्रालय में उसके विशेषज्ञों को बैठाया था तो क्या वाजपेयी पागल थे? बल्कि मेरा तो यहाँ तक मानना है कि अगर जरूरी हो तो विपक्षी खेमे में शामिल योग्य लोगों से भी सलाह लेनी चाहिए. मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है. १८६१ में लिंकन जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने दास प्रथा को समाप्त कर दिया. दक्षिणी राज्यों ने विद्रोह कर दिया और भयंकर युद्ध छिड़ गया. उस समय पूरे अमेरिका में सबसे बड़े सैन्य जनरल थे ग्रांट लेकिन समस्या यह थी कि वे लिंकन के विरोधी थे. इसके बावजूद लिंकन ने उनको ही सेनाध्यक्ष बनाया. जब लिंकन के दोस्तों ने इस पर आपत्ति की तो उनका जवाब था कि भले ही वो मेरा विरोधी है लेकिन पूरे अमेरिका में उससे ज्यादा योग्य सेनानायक नहीं है इसलिए मैंने अहम पर देशहित को अहमियत दी. चूंकि लिंकन यह मानते थे कि वे सर्वज्ञ नहीं थे इसलिए उनका नाम विश्व इतिहास में गर्व से लिया जाता है.

मित्रों, आज भारत को भी लिंकन सरीखे व्यक्तित्व की आवश्यकता है लेकिन क्या मोदी जी उनके समकक्ष भी हैं? यह अद्बभुत संयोग है कि लिंकन 16वें राष्ट्रपति थे तो मोदी 16वें प्रधानमंत्री हैं। तो मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी ने मार्गदर्शक मंडल की स्थापना करके ठीक नहीं किया. बल्कि देशहित में यही ठीक रहता कि आडवाणी जी और जोशी जी को भी मंत्रिमंडल में लिया जाता. वे कम-से-कम गिरिराज और स्मृति ईरानी से तो बेहतर ही सिद्ध होते. क्योंकि मुझे लगता है कि मोदी जी के इर्द-गिर्द जो लोग हैं और जिनकी सलाह पर वे चलते हैं वे सही नहीं हैं और मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी को पता नहीं है कि टीम वर्क करते समय खुद १६-१८ घंटे काम करने से ज्यादा जरूरी होता है दूसरों से काम करवाना.

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