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लोकतंत्र व्यवस्था का संक्रमित होता स्वरुप

Posted On: 11 Sep, 2015 Others में

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brijeshprasad

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कल के दैनिक जागरण में श्री प्रदीप सिंह जी का लेख “राहुल की राजनीति” पढ़ा। लेखक ने देश के समक्छ एक अत्यंत गम्भीर प्रश्न खडा कर दिया है। देश को पूरी गंभीरता पूर्वक सोचना ही पड़ेगा की देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी, जिसने देश पर लगभग 60 वर्षो से भी अधिक समय तक राज्य किया। इसे देश में विकास की तमाम उपलब्धियां का भी श्रेय मिलता है,जिसने देश को तमाम आदर्श नेताओ की श्रृंखला भी दी जिन का आदर्श जीवन आज भी उदाहरण है, देश के लिए ही, नहीं अपितु विश्व के लिए भी। वही पार्टी आज “साम्राज्यवादी लोकतंत्र ” का स्वरुप लेती चली जा रही है।
गांधी परिवार ने आज पारिवारिक विरासत के लिए देश को प्रशिछण स्थल का रूप दे दिया है। पार्टी की राजनीति आज देश के कल्याण से विमुख हो व्यक्तिगत अहंकार की तुस्टीकरण का माध्यम मात्र हो चली है। लोकसभा स्पीकर का कहना – की 40 सांसदों ने 400 सांसदों को बंधक बना लिया है – का किया अर्थ निकला जाय ? लोकसभा में पोस्टर ले कर आना, स्पीकर पर कागज के टुकड़े फेकना , तमाम सदन की कार्यवाही को नारो के माधयम से बाधित करना। यह विरोध की कैसी लोकतान्त्रिक संवैधानिक पद्धति है ? सदन तो चर्चा का सर्वोच्च स्थान है। यहाँ पर हम देश के जनकल्याण हित पर गम्भीर चर्चा करते है, देश के हित एवं अहित का निर्णय, बहुमत के आधार पर लेते है। फिर सदन में इस प्रकार के अराजक माहौल का क्या औचित्य है ? क्या हमारे संविधान में इस प्रकार के अराजक माहौल पर नियंत्रण के लिय कोई भी धारा नहीं है ? और यदि है, तो इस माहोल पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा सका ? सदन का ये माहौल दूरदर्शन के माध्यम से देश दुनिया ने देखा, उससे दुनिया में हमारे लोकतंत्र की क्या प्रतिष्ठा रह गयी? इस घटना के परिणाम आने वाले समय में देश के लिए कितने अहितकर हो सकते है, हमारे माननीय एवं आदरणीय सांसदों को इस का भरपूर ज्ञान होना चाहिए और अपने अहम से उप्पर देश हित को तरजीह देनी चाहिए।
यह घटना हमें विचार करने पर विवश कर रही है की क्या हम सदन के वैधानिक विषयों पर गंभीरता पूर्वक चर्चा करने में अब समर्थ नहीं रहे ? क्या हममें सामर्थ नही की हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर देश के सर्वोच्च सदन की मर्यादा अनुरूप संवैधानिक व्योहार की मर्यादा का पालन कर सकें। क्या हम निश्हाय हो चले है?
श्री प्रदीप सिंह जी द्वारा लेख में कांग्रेस पार्टी की जो तस्वीर पेश की गयी है, इससे स्पस्ट होता है की जो हल 40 लोगों ने मिल कर सदन का किया, वही हाल इस समय कांग्रेस पार्टी के अंदर भी चल रहा है। कुछ लोग कुछ भी सुनने और समझने की स्थित में ही नहीं है। तमाम वरिष्ठ एवं अनुभवी सदस्यों की स्थिति कांग्रेस में आज “न तो घर के, न घाट के ” जैसी हो रही है। गांधी परिवार अपनी विरासत के लिए शायद पार्टी हित व देश हित से ऊपर उठ चूकी है।
शायद यह लोकतंत्र व्यवस्था का संक्रमित होता स्वरुप ही है।

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