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हमारा लोकतंत्र - हमारा कश्मीर

Posted On: 22 Apr, 2015 Others में

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brijeshprasad

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हमारा लोकतंत्र, हमें अपने विचारों की और उनके अभिव्यक्ति की पूरी – पूरी स्वतंत्रता प्रदान करता है। अतः हम भारत में सार्वजनिक रूप से, विदेशी झंडे को लहरा सकते हैं, पाकिस्तान को मेरी जान कह सकते है, हिंदुस्तान मुर्दाबाद कह सकते है। कश्मीर सरकार, लोकतंत्र की मर्यादा का निर्वहन करते हुए “दु -अर्थी “व्यक्तब्य दे कर “कानून अपना काम करेगा ” इति श्री कर लेती है। मीडिया की सक्रियता वस, केंद्र सरकार को , मुफ्ती जी को दी गयी चेतावनी के द्वारा, उंन्हे राष्ट्रीय सम्मान से ज्यादा, सत्ता के चले जाने का आभास कराना पड़ता है। इस से मुफ्ती जी में, राष्ट्रीय सम्मान तो क्या जागा होगा, अपितु सत्ता चले जाने के भय ने चिंतित अवश्य कर दिया होगा। परिणामस्वरूप मुफ्ती जी को, मस्सरत आलम को गिरफ्तार करना पड़ा। भारत की जनभावना के आदर में नहीं, अपितु सत्ता के चले जाने के अंदेशे से।
जम्मू कश्मीर में मस्सरत आलम के द्वारा जेल से छूटते ही, पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी गतिविधियों ने कश्मीर के माहौल में फिर से जहर के बीज बोने का काम किया है। गिरफ्तारी के बाद भी मीडिआ से बात करते हुए मस्सरत ने अपनी गति विधि को मान्यता देते हुए, इस का समर्थन किया। अपनी गतिविधि की मान्यता के लिए उसने भारतीय लोकतंत्र को आधार माना। मस्सरत के पाकिस्तान समर्थक नारे और पाकिस्तानी झंडे को लहराना, तमाम अपने समर्थको के साथ पाकिस्तान समर्थक माहौल बनाने की गति विधि को, मीडिआ ने अपने सभी चैनलों से पूरे हिंदुस्तान को ही नहीं, अपितु पूरे विश्व को दिखाया। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मुफ्ती मोह्हमद साहब इस का विरोध स्पष्ट रूप से न करके, कानून अपना काम करेगा जैसा व्यक्तब्य देते है ।
मुफ्ती साहब की मंशा चुनाव परिणामों के तुरंत बाद ही, उनके व्यक्तब्यों से यूँ भी संदेह के घेरे में आ जाती है। क्या मस्सरत को इसी काम के लिए जेल से झोड़ा गया था ? वर्षो से शांति पूर्ण ढंग से चलती घाटी, जिसको ले कर पाकिस्तान की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी, को एक आधार मस्सरत ने दे दिया। कश्मीर में बाढ़ की स्थित में भारतीय फौज की सक्रियता से कश्मीरियों में, फौज के प्रति विश्वास पैदा हुआ था। पूरे कश्मीर में शांति का माहौल बन रहा था, जो लगातार आपसी विश्वास को मजबूत करता जा रहा था। ऐसे में मस्सरत को जेल से छोड़ कर,माहौल ख़राब करने का कोई न कोई तो दोषी होगा ही। और तब और भी यह विश्वास बल पायेगा, जब हम उसे तुरंत गिरफ्तार करने से भी हिचकते हैं, गिरफ्तार करने के बाद उस पर “देश द्रोह “की धारा का न लगाना, एक प्रश्न चिन्ह और खड़ा कर देता है। आखिर देश द्रोह का इससे बड़ा और क्या कारण हो सकता है?
भा ज प के गृह मंत्री जी के दबाव से मुफ्ती को इस घटना की तस्वीर साफ हुई, परिणामस्वरूप मुफ्ती जी ने मस्सरत को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया। इस गिरफ्तारी में भी नरमी साफ दिख रही है, ” देश द्रोह” की मुख्या धारा में ही उसे गिरफ्तार होना था, शेष धाराए बात की बात थी।
अब प्रश्न उठता है की, मुफ्ती साहब इस दोहरे दबाव में किस तरह और कितने दिन काम कर सकेंगे ? इस दबाव में मुफ्ती साहब भारत के हित में, कश्मीर के हित का कार्य कैसे कर सकेंगे ? ये सारे बड़े ही स्वाभाविक प्रश्न है, जो इन परिथितयो से उभर कर सभी के जेहन में उठंगे। इन सवालो के जवाब मुफ्ती साहब तो देने से रहे, तब भा ज प की जिम्मेदारी बन जाएगी, इन सवालों के जवाब देने की। इस लिए भा ज प को जल्द से जल्द इन सवालो के जवाब खोज लेने चाहिए। क्या हम निहित स्वार्थो को ले कर “राष्ट्र की प्रतिष्ठा ” से किसी भी प्रकार का समझोता कर सकते है? राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के मुद्दों पर लिए गए कठोर फैसले सम्भवता पथ भ्रस्ट होते कुछ लोगो को दो चार दिन भले ही आक्रोशित करें , पर जन सामान्य हमेशा ऐसे फैसलों का स्वागत करेगा, और राहत एवं सुरक्छा महसूस करेगा। राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा, कूटनीति का विषय नहीं बन सकती ।

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