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आपकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा ले जाते हैं ये

Posted On: 28 Feb, 2015 Others में

अर्थ विमर्शव्यापार जगत की गुत्थियां शेयर बाजार की हलचल महंगायी और बजट की सरगर्मियां सब पर रखता राय

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कौन नहीं चाहता कि उसके पैसे बचें! महीने भर की कमाई जब हाथ में आती है तो लोगों की खुशी बढ़ जाती है. लेकिन कई चीज़ों पर जब अत्यधिक कर चुकानी पड़ती है तो कलेजा मुँह को आ जाता है. अगर ऐसा हो कि रोजमर्रा की कई चीज़ों पर से कर का बोझ हटा दिया जाय तो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा हम बचा पायेंगे. यहाँ हम कुछ ऐसी चीज़ों की सूची दे रहे हैं जिन पर से हर कोई कर का बोझ हटाना पसंद कर सकता है.


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सिनेमा


सिनेमा मनोरंजन का लोकप्रिय साधन है और भारत में सिनेमा देखने वाले दर्शकों की भी कमी नहीं है. लेकिन इस पर लादा गया कर इसे हर व्यक्ति की पहुँच से दूर कर देता है. ज्यादातर लोग महँगी टिकटों की वजह से सिनेमाघरों तक नहीं पहुँच पाते और इसे डाउनलोड करके या पाइरेटेड सीडी लाकर देखने पर मज़बूर होते हैं. सिनेमा पर कर न लगने की स्थिति में यह काफी सस्ती हो जायेगी और ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए मनोरंजन का यह साधन सस्ता हो जायेगा.


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रेस्त्रां में भोजन


अवकाश के दिनों में लोग बाहर किसी रेस्त्रां में भोजन करने जाते हैं. रेस्त्रां जाने का एक कारण यह भी है कि लोग रोज घर का खाना खाकर अपनी जीभ का स्वाद बदलने की चाह रखते हैं. लेकिन रेस्त्रां में भोजन करने का मजा तब फ़ीका पड़ जाता है जब हमारी नज़र भुगतान रसीद पर जाती है. इसमें भोजन की कीमत के साथ लोगों को कर भी चुकाना पड़ता है जो रेस्त्रां में बने भोजन को महँगी बना देती है.


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पेट्रोल


भारत युवाओं का देश है. अधिकांश युवक और युवतियाँ बाइक और स्कूटी की सवारियाँ करते हैं. ये दोपहिये वाहन पेट्रोल पर निर्भर हैं. लेकिन अपने देश में पेट्रोल की कीमतें सदैव आसमान की ओर ताकती रहती हैं. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमतों में कमी के बावजूद भारत में इसकी कीमतें केवल 1 रूपए या दो रूपए कम होती है. दरअसल पैट्रोलियम पदार्थों और विशेष रूप से पेट्रोल पर लोगों को भारी कर चुकाने पड़ते हैं. सोचिये अगर इन पर से नये साल में कर को हटा दिया गया तो इन वाहनों की पहुँच दूर-दराज के गाँवों में रहने वाले लोगों तक होगी. मोदी सरकार युवाओं की सरकार है और युवाओं को उनसे काफी उम्मीदें हैं.


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कपड़े


युवाओं के कारण हमारे देश के लोगों के पहनावे में बीते दशकों में काफी परिवर्तन आया है. फॉर्मल पतलून की जगह अब जींस और फॉर्मल बुशर्ट की जगह अब टी शर्ट्स ने ले ली है. युवा अंधाधुंध पश्चिम का अनुकरण करते जा रहे हैं जिससे पश्चिमी कपड़ों ने भारतीय बाज़ार में अपनी पकड़ बना ली है. लेकिन ऐसे कपड़े अब भी कई लोगों के बजट में नहीं हैं. ब्रांडेड चीज़ें न ख़रीद पाने वाले लोगों के उसी ब्रांड के नाम से कम पैसों में मिल जाने वाले कपड़ों का बाज़ार भी अस्तित्व में है. यहाँ भी लोगों जिनमें से ज्यादातर युवा होते हैं की काफी भीड़ होती है.


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