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साम्प्रदायिकता की टोपी...

Posted On: 15 Apr, 2013 Others में

विचार भूमिपहले राष्ट्र..

अरुणेश मिश्रा सीतापुरिया

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इसे हिंदुस्तान का दुर्भाग्य ही कहेगे, कि जब-जब देश में चुनाव का समय नजदीक आता है, सारे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और आगे रह जाता है तो सिर्फ धर्म और जाति का गुणा-भाग. अब तक विकास की राजनीत करने वाले नितीश कुमार भी वोट बैंक का मोह नहीं त्याग पाए. ऐसे समय जब सारे देश को एक साथ मिलकर देश में व्याप्त आकंठ भ्रष्टाचार और कमर तोड़ महगाई पर मिल कर चोट करनी चाहिए थी, NDA का एक सबसे पुराना और प्रमुख दल, आस्तीने तान रहा है. सारे टीवी चैनलों की बहस विकास, महगाई और भ्रष्टाचार से हट कर मोदी की साम्प्रदायिकता हो गई. ये बड़ा ही हास्यापद है, की हम भारतीय जनता पार्टी के साथ मुख्यमंत्री की रबड़ी तो खाएगे लेकिन भारतीय जनता पार्टी का नेता स्वीकार्य नहीं है. हमें ये भी याद रखना चाहिए, कि गोधरा और गुजरात के दंगो के समय तत्कालीन रेल मंत्री नितीश कुमार जी को आखिर तब क्यों नहीं परहेज रहा, पार्टी विशेष या नेता विशेष से. और उस समय इन्होने क्या कठोर कदम उठाये. ये तो बिलकुल वैसा ही है कि “गुड खाए लेकिन गुलगुले से परहेज”.


पिछले कई महीनो के बाद कांग्रेस के नेताओं के मन को तस्सली मिली होगी. पांच सालों के शासन की कालिख किसी से नहीं धुल सकती थी, सिवाय किसी ऐसे नेता के जो विकास के रथ पर सवार हो, और उसके लिए भी मोदी की साम्प्रदायिकता, सुशासन से अधिक महत्वपूर्ण है. कल वह काम नितीश जी ने कर दिया. जब देश का युवा रोजगार, गरीब रोटी, महिलाएं सुरक्षा और सेनाएं स्वाभिमान की प्रतीक्षा कर रही थी, नीतीश जी ने १८% वोटबैंक के लिए सारे देश को पीठ दिखा दी.


आज राजनीत का स्तर, इस कदर गिर चुका है कि इबादत कि चीजे भी अभी सत्ता कि सीढियां बन चुकी है. नितीश कुमार जी से इस कथन पर हमें घोर आपति है कि “देश चलने के लिए कभी टोपी और कभी तिलक लगाना पड़ता है”. ये उनकी समझ हो सकती है, उनकी पार्टी की समझ हो सकती है लेकिन हमें तो यही पता था कि मुसलमानों की टोपी और हिन्दुओं का तिलक इबादत की चीज है, ये कोई नुमाइश करने की वस्तु नहीं है और न ही वोट बटोरने का साधन. ये खुला मजाक है देश के सभी हिन्दुओं और मुसलमाओं के साथ, कि एक प्रदेश का मुख्यमंत्री खुलेआम कहता है की हिन्दुओं के वोट के लिए हम तिलक और मुसलमानों के वोट के लिए हम टोपी पहनेगे. लेकिन न तो तिलक से और न टोपी से किसी घर का चूल्हा जला और न किसी के बच्चे पढ़े हैं. शायद इनका आशय यही था कि, “टोपी पहन के समुदाय विशेष को टोपी पहनाओ और और तिलक लगा के तालियाँ बजवाओ”.


देश में पचास साल से भी जयादा समय ऐसे लोगो ने राज किया जो अपने आप को टोपी का कदरदान कहतें हैं, कोई पूछेगा उनसे अगर वो ही सच्चे और इकलौते रहनुमा है मुसलमान भाइयों के, तो फिर मुसलमानों कि ये हालत आखिर बनाई किसने है. क्या कारण है, शहर का वो आखिरी किनारा, जहाँ न ढंग से लाइट होती है, न पानी होता, सिर्फ कचरा और तंग गलियां मिलती हैं, वहां ही क्यों अधिसंख्य मुसलमान बसते हैं. क्यों नहीं जमीनी स्तर पर इनकी दशा और तकदीर बदली जाति, क्यों हर बार मुसलमाओं को अपने हक के लिए वोट करने के बजाय कभी किसी पार्टी, कभी किसी व्यक्ति का डर दिखा कर, साल दर साल पीछे धकेल दिया जाता है.


अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि, भारतीय जनता पार्टी का रुख क्या रहता है, अभी तो प्रतिक्रिया काफी सधी हुई आयी है, लेकिन मेरे विचार से भाजपा को मुखर होना चाहिए और विकास और सुशासन को फिर से चुनाव का केंद्र बिंदु बनना चाहिए. वैसे भी भाजपा, नरेन्द्र मोदी जी को लेकर इतना आगे बढ़ चुकी है कि, वापसी की गुंजाईश काफी कम बची है. तो बजाये, गाड़ी थोड़ी आगे और थोड़ी पीछे खीचने से अच्छा रहेगा, कि पार्टी अपने अन्दर सर्व-सम्मति से एक नेता चुने और फिर पूरी क्षमता और निष्ठां से, उसके साथ खड़ी रहे.

जय हिन्द…

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