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महिला आरक्षण बिल के पेंच

Posted On: 21 Mar, 2010 Others में

विचार भूमिपहले राष्ट्र..

अरुणेश मिश्रा सीतापुरिया

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केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास करवा कर अवश्य ही अपने इरादे जाता दिए है। सरकार की इस उपलब्धि के लिए सत्ता पक्ष के साथ साथ विपक्षी दल भी बराबर के हकदार है। केंद्र ने जिस तरह से इस प्रस्ताव को लोकसभा में पास करवाया है, कई लोग इस तरीके को अलोकतांत्रिक कह रहे हैं,  लेकिन जिस तरह का विरोध बागी सांसद जन कर रहे थे उसको भी कोई लोकतान्त्रिक नहीं कह सकता है।

भले ही सरकार ने यह बिल राज्यसभा में पास करवा लिया हो लेकिन लोकसभा में इसको पास करवाना अभी भी एक दूर की कौड़ी है। केंद्र निश्चय ही इस बिल के लिए अपने पुराने सहयोगियों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहती। इसलिए इस बिल को लोकसभा में पास करवाने से पहले आम सहमती बनवाना चाहती है.

भारत का आज का राजनीतिक परिद्रश्य पूरी तरह से वोट बैंक की विचारधारा पर निर्भर है। महिला अरक्षद बिल भी वोट बैंक की राजनीती से अछूता नहीं है। आर जे डी , सपा और जनता दल का एक खेमा पूरी ताकत से इस बिल के विरोध में खड़ा है। यहाँ पर विरोध सामाजिक नहीं बल्कि राजनैतिक अधिक है।

यह सभी क्षेत्रीय दल  इस बात से शशंकित है  की अगर यह बिल कानून के रूप में लोकसभा में पास हो जायेगा, तो  इस कानून की सबसे ज॒यादा मार इन राजनीतिक दलों पर पड़ेगी.     अगर हम किसी भी क्षेत्रिय दल में महिला नेताओ की गिनती करे तो यह दहाई तक भी नहीं पहुचती है। इन दलों यही डर सता रहा  है की अगर यह बिल लोकसभा में पास हो गया तो अगले लोकसभा में उनको जीत जीत दिलाने वाले उमीद्वारो का टोटका पड़ जायेगा।

सत्ता पक्ष और ताकतवर विपक्ष के गठजोड़ को तोड़ने के लिए, लालू प्रसद यादव जी,  मुलायम सिंह यादव जी ने एक नया फ़ॉर्मूला दिया है और वह है आरक्षण के अन्दर आरक्षण. इन राजनेताओ को यह पता है की भाजपा कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेगी, और भाजपा का विरोध इस बिल को ठन्डे बसते में डालने के लिए काफ़ी होगा.

 
केंद्र सरकार अगर सच्चे मन से इस बिल को पास करवाना चाहती है तो उसको पूरी इक्षाशक्ति के साथ में इस बिल को लोकसभा के पटल पर जल्दी से जल्दी लाना होगा। सरकार को जन भावना और राजनीतिक भावना के अंतर को समझाना चाहिए और यह बिल लोकसभ शीघ्रा-तिशीघ्र पास करवाना चाहिए।

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