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क्या आधार से रुकेगा भ्रष्टाचार!

Posted On: 29 Oct, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले दिनों 21 करोड़वां आधार कार्ड उदयपुर जिले के दूदू कस्बे की कालीबाई को सौंप दिया। देश के नागरिकों के लिए अब विशेष और बहुउद्देशीय पहचान पत्र आधार बुनियादी जन सुविधाओं एवं उपभोक्ता को सब्सिडी का आधार भी बनता दिखाई दे रहा है। इसके जरिये राजस्थान में सरकारी अनुदान और योजनाओं का लाभ जनता को सीधे देने की सुखद शुरुआत कर दी गई। जाहिर है, यदि इस कार्ड से बिना किसी बाधा के नकद छूट सीधे उपभोक्ता के बैंक खाते में जमा होती है तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा और सार्वजानिक वितरण प्रणाली के दुरुस्त हो जाने की उम्मीद बढ़ेगी। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगी घटक दलों का खिसकता जमीनी आधार भी मजबूत होगा। बशर्ते कार्ड में उपभोक्ता के वास्तविक ब्यौरे दर्ज हों, क्योंकि सभी गरीब परिवारों के उचित दस्तावेजों के अभाव में बैंक खाते नहीं खुल पा रहे हैं।


ग्राम पंचायत के प्रमाणीकरण से उनके खाते खुल जाएं और आधार तकनीक से जुड़े जो सहायक उपकरण हैं, उनकी गुणवत्ता मानक हो। ये उपकरण मानक नहीं हुए तो आधार कर्नाटक की तरह परेशानी का सबब भी बन सकता है। आजादी के बाद से ही कई ऐसे कारगर उपाय होते चले आ रहे हैं, जिससे देश के प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रीय नागरिकता की पहचान दिलाई जा सके। मूल निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अब आधार योजना के अंतर्गत एक बहुउद्देशीय विशिष्ट पहचान पत्र हर नगरिक को देने की देशव्यापी कवायद चल रही है। सोनिया गांधी ने 21 करोड़वां आधार कार्ड भेंट करते हुए दावा किया है, आधार विश्व की सबसे बड़ी परियोजना है, जो आम आदमी को उसकी पहचान देगी। उसका जीवन बदल जाएगा। उपभोक्ता को सरकारी मदद शत-प्रतिशत मिलने की गारंटी मिल जाएगी। इसी परिप्रेक्ष्य में खाद्य सामग्री, केरोसिन और रसोई गैस में मिलने वाली नकद सब्सिडी हकदार के सीधे बैंक खाते में डाल दी जाएगी। दूरगामी परिणाम की उम्मीद तय है कि इससे भ्रष्टाचार, हेराफेरी और धोखाधड़ी कम होगी।


मनरेगा की मजदूरी, विद्यार्थियों के वजीफे, बुजुर्गो की पेंशन सीधे लाभार्थियों के खाते में जमा होगी। यदि यह संभव हो जाता है तो व्यक्ति अनिवार्य रूप से आधार कार्ड धारण करने को विवश होगा और इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। फिलहाल विपक्षी दल पिछले दो दशक से नकद सब्सिडी उपभोक्ता को देने की मांग करते चले आ रहे थे, उसकी शुरुआत संप्रग सरकार ने राजस्थान के दूदू कस्बे से कर दी है। कुछ दिनों में इसके दूरगामी परिणाम देखने में आएंगे। फिलहाल आधार को वजूद कायम करने में कई जटिलताएं पेश आ रही हैं। इन्हें दूर करने की जरूरत है। इसके अमल में आने के बाद मानवीय लालच के चलते जो गड़बडि़या सामने आई हैं, उनमें यदि सख्ती नहीं बरती गई तो महत्वाकांक्षी आधार योजना भी ढाक के तीन पात बनकर रह जाएगी। क्योंकि आधार कंप्यूटर आधारित ऐसी तकनीक है, जिसे संचालित करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञ, इंटरनेट तथा ऊर्जा की उपलब्धता जरूरी है। केवल व्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत करने की संख्या दे देने से काम चलने वाला नहीं है। महज आधार संख्या सुविधा और सशक्तीकरण का बड़ा उपाय या आधार नहीं बन सकता।


यदि ऐसा संभव हुआ होता तो मतदाता पहचान पत्र मतदाता के सशक्तिकरण और चुनाव सुधार की दिशा में बड़ा कारण बनकर पेश आ गया होता। आधार को पेश करते हुए दावा तो यह भी किया गया था कि इससे नागरिक को ऐसी पहचान मिलेगी, जो भेदरहित होने के साथ उसे विराट आबादी के बीच अपनी अस्मिता का आभास कराती रहेगी। लेकिन जातीय, शैक्षिक और आर्थिक असमानता के भेद बरकरार हैं। दरअसल, आधार योजना जटिल तकनीकी पहचान पर केंद्रित है। इसलिए इसके मैदानी अमल में दिक्कतें भी सामने आने लगी हैं। असल में राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र में पहचान का मुख्य आधार फोटो होता है, जिसे देखकर आखों में कम रोशनी वाला व्यक्ति भी कह सकता है कि यह फलां व्यक्ति का फोटो है। उसकी तस्दीक के लिए भी कई लोग आगे आ जाते हैं, जबकि आधार में फोटो के अलावा उंगलियों, अंगूठे के निशान और आंखों की पुतलियों के डिजिटल कैमरों से लिए गए महीन पहचान वाले चित्र हैं, जिनकी पहचान तकनीकी विशेषज्ञ भी बामुश्किल कर पाते हैं।


ऐसे में सरकारी व सहकारी उचित मूल्य की दुकानों पर राशन, गैस व केरोसिन बेचने वाला मामूली दुकानदार कैसे करेगा? आधार के जरिये केवल सब्सिडी की ही सुविधा दी जानी थी तो इसके लिए तो फिलहाल आधार की भी जरूरत नहीं है। यह काम उपभोक्ता का बैंक में खाता खुलवाकर ई-भुगतान के जरिये किया जाता तो और भी आसान होता। मनरेगा के मजदूरों की मजदूरी का शत-प्रतिशत भुगतान बैंक खाते के मार्फत होने लगा है। मनरेगा में काम करने वाले अधिकांश वही लोग हैं, जो गरीबी रेखा के नीचे जीपनयापन करने वाले हंै और जो सब्सिडी के पात्र हैं। ऐसे में आधार का औचित्य केवल सब्सिडी के लिए उचित सिद्ध नहीं होता। कुछ जटिलताएं भी कर्नाटक में ऐसे दो मामले सामने आ चुके है, जो आधार की जटिलता सामने लाते हैं। कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि मौसूर के अशोकपुरम् में राशन की एक दुकान को गुस्साए लोगों ने आग लगा दी और दुकानदार की पिटाई भी की। दरअसल, दुकानदार कोई तकनीकी विशेषज्ञ नहीं था, इसलिए उसे ग्राहक के उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के निशान मिलाने में समय लग रहा था। चार-पांच घंटे लंबी लाइन में लगे रहने के बाद लोगों के धैर्य ने जबाव दे दिया और भीड़, हुड़दंग, मारपीट व लूटपाट का हिस्सा बन गई। बाद में पुलिसिया कारवाई में लाचार व वंचितों के खिलाफ लूट व सरकारी काम में बाधा डालने के मामले पंजीकृत कर इस समस्या की इतिश्री कर दी गई। अब तो जानकारियां ये भी मिल रही हैं कि इस योजना के मैदानी अमल में जिन कंप्यूटराइज्ड सहायक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जरूरत पड़ती है, उनकी खरीद में अधिकारी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बरत रहे हैं।


बेंगलूर के एक अखबार के मुताबिक एक सरकारी अधिकारी ने उंगलियों के निशान लेने वाली 65 हजार घटिया मशीनें खरीद लीं। केंद्रीयकृत आधार योजना में खरीदी गई इन मशीनों की कीमत 450 करोड़ रुपये है। इस अधिकारी की शिकायत कर्नाटक के लोकायुक्त को की गई है। जाहिर है, योजना गरीब को इमदाद से कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार का सबब बनती दिखाई दे रही है। तय है आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं। इसलिए जो शिकायतें आ रहीं हैं, उन्हें दूर करने की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि जिस उपभोक्ता को राशन और ईधन की सुविधा दी जा रही है, उसकी पहचान केवल फोटो आधारित हो। आंखों की पुतलियों और अंगूठे से उसकी पहचान इस बाबत न हो। यदि पहचान के आधार जटिल होंगे और गरीब की पहचान मुश्किल होगी तो इससे जनता में संदेश जाएगा कि गरीबों के हक को नकारा जा रहा है। दरअसल, आधार के रूप में भारत में अमल में लाई गई इस योजना की शुरुआत अमेरिका में आतंकवादियों पर नकेल कसने के लिए हुई थी।


2001 में हुए आतंकी हमले के बाद खुफिया एजेंसियों को छूट दी गई थी कि वे इसके माध्यम से संदिग्ध लोगों की निगरानी करें। वह भी केवल ऐसी 20 फीसद आबादी पर, जो प्रवासी है और जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। लेकिन हमारे यहां इस योजना को संपूर्ण आबादी पर लागू किया जा रहा है। इससे यह संदेश भी जाता है कि देश का वह गरीब संदिग्ध है, जिसे रोटी के लाले पड़े हैं। खासतौर से इस योजना को कश्मीर और असम तथा पूर्वोत्तर के उन सीमांत जिलों की पूरी आबादी के लिए लागू करने की जरूरत थी, जहां घुसपैठिए आतंकी गतिविधियों को तो अंजाम दे ही रहे हैं, जनसांख्यकीय घनत्व भी बिगाड़ रहे हैं। इसलिए पी चिदंबरम जब देश के गृहमंत्री थे, तब इस आधार योजना के वे प्रबल विरोधी थे और उन्होंने इसे खतरनाक आतंकवादियों को भारतीय पहचान मिल जाने का आधार बताया था। लेकिन वित्तमंत्री बनते ही उनका सुर बदल गया है। राजस्थान में उन्होंने हिंदी में भाषण देते हुए आधार का गुणगान किया। जाहिर है, आधार की परिकल्पना निर्विवाद नहीं है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ तो हो सकता है कि इसे सिरे से खारिज कर दिया जाए।


लेखक प्रमोद भार्गव स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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