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American Economy: अमेरिका की असलियत

Posted On: 18 Oct, 2013 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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आखिरकार अमेरिका में शटडाउन यानी कामबंदी समाप्त हो गई। उधारी सीमा बढ़ाने के लिए लाया गया विधेयक अमेरिकी संसद ने पारित कर दिया है और इसके साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश दिवालिया होने से बच गया। इस प्रकरण ने अमेरिका की एक ऐसी तस्वीर सामने ला दी है जो विश्व के लिए अचरज भरी है। शटडाउन के इस मामले ने यह साबित कर दिया कि प्रत्येक चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। पूरा विश्व मानता है कि अमेरिका दुनिया का सर्वाधिक धनाढ्य और शक्तिशाली देश है। नि:संदेह शक्ति के मामले में उसने सभी शक्तियों को पीछे छोड़ रखा है, किंतु यह देश सर्वाधिक संपन्न है, यहां सभी खुशहाल हैं, सभी के पास रोजी-रोटी का साधन है, रहने के लिए मकान हैं, स्वास्थ्य की सुविधाएं हैं तथा उच्च शिक्षा के साधन हैं, ऐसा समझना नितांत भ्रामक है। इसके विपरीत असलियत यह है कि अमेरिका कर्ज में डूबा हुआ देश है, यहां भारी बेरोजगारी देखी जा सकती है। यहां भुखमरी, कुपोषण और गरीबी के शिकार लोग बड़ी संख्या में हैं। कारावास कैदियों से पटे पड़े हैं। विश्वास करने योग्य नहीं लगता कि हजारों अपराधियों को सजा पूरी होने से पहले ही इसलिए रिहा कर दिया जाता है, क्योंकि जेलों में उन्हें रखने के लिए जगह नहीं है।


अमेरिका पर 16,700 अरब डॉलर का कर्ज चढ़ा हुआ है। यह कर्ज प्रतिदिन 1.83 करोड़ डॉलर बढ़ रहा है। इस प्रकार प्रत्येक अमेरिकी नागरिक 52,000 डॉलर से अधिक का कर्जदार है। यह है इस धनकुबेर राष्ट्र की वास्तविक स्थिति। इस बंदी के कारण लगभग 8 लाख सरकारी कर्मचारी सीधे प्रभावित हुए हैं। लगभग 2.5 लाख लोग केवल कैलिफोर्निया राज्य में प्रभावित हुए हैं। बंदी के दौरान ये अपने काम एवं वेतन से वंचित हो गए, जबकि रोजमर्रा के खर्च यथावत बने हैं। ऐसे में उनकी देनदारियां बढ़ती जा रही हैं। उन पर मकान का किराया, मकानों और कारों की किस्तें तथा क्रेडिट कार्ड अदायगी का भार ब्याज सहित बढ़ रहा है। बच्चों के खर्च रुक रहे हैं। अमेरिका में लगभग 63 लाख लोग बेघर बताए जाते हैं। इसमें 35 लाख ऐसे लोग भी हैं जो पार्को में, पुलों के नीचे रात गुजारते हैं। बड़े नगरों में बेघर लोग फटेहाल घूमते देखे जा सकते हैं। इसके अनेक कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं-अति महंगा जीवन, बेहद कम प्रति घंटा दिहाड़ी, मानसिक तनाव, घरेलू हिंसा, रोजगार की कमी एवं नशाखोरी की लत। आजकल अमेरिका में भिखारी भी देखे जा रहे हैं। भिक्षावृत्ति रोकने के उपाय ढूंढे जा रहे हैं, लेकिन यह रुक नहीं रही है। जब इतना बड़ा देश भी अरब देशों और चीन से कर्ज मांगने को मजबूर है तब व्यक्ति का मांगना तो नगण्य जान पड़ता है। फिर भी, 2011 में नेशनल लॉ सेंटर ऑन होम लोन एंड पॉवर्टी के अनुसार देश के सौ नगरों में भीख मांगने पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिसमें 16 नगर तो केवल कैलिफोर्निया के हैं। भिखारियों को बाजारों में देखा जा सकता है। काम न मिलने के कारण कुछ लोगों के लिए भीख मांगना मजबूरी बन गई है।


अमेरिका में गरीबी भी है और भूख भी। चौंकाने वाली बात यह है कि 14.5 प्रतिशत घरों में 4.9 करोड़ लोग, जिसमें 1.59 करोड़ बच्चे भी शामिल हैं, खाना पाने को संघर्षरत हैं। इसका कारण अन्न की कमी कदापि नहीं है। कारण है गरीबी, पुष्टाहार कार्यक्रमों का अभाव, महंगी शिक्षा, अति महंगी स्वास्थ्य सेवाएं और शहरों तथा ग्रामों में कम होते काम के अवसर। देश की कुल जनसंख्या की 16 प्रतिशत आबादी गरीब है। कैलिफोर्निया में गरीबी का प्रतिशत 23 है। अमेरिका में बेरोजगारी 14.3 प्रतिशत है। भोजन पर खर्च यहां रहने वालों की प्राथमिकता में अन्य देनदारियों के बाद आता है।


इस देश की 4.5 करोड़ आबादी के पास स्वास्थ्य सुविधाओं का नितांत अभाव है। छोटी-मोटी बीमारी में डॉक्टर से विमर्श एवं दवा खरीदने पर 400 डॉलर का खर्च साधारण सी बात है। इस 4.5 करोड़ आबादी के लिए ही ओबामा ने 2010 में कानून भी बनाया था, किंतु इसे लागू करने में कांग्रेस भारी रुकावट डाल रही है। राष्ट्रपति बीमा सुविधा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जबकि रिपब्लिकन इसे अनावश्यक मानते हैं। रिपब्लिकन धनपतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां भी गलत नीतियों के कारण धनी और अधिक धनी तथा गरीब अधिक गरीब होते जा रहे हैं। रिपब्लिकन इस योजना को ओबामाकेयर, न कि मेडीकेयर मानते हैं। इसीलिए वे प्रारंभ में ओबामा प्रशासन को कोई रियायत देने के लिए तैयार नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि अमेरिका गंभीर कर्ज संकट में फंस गया।


ओबामा का मानना है कि अमेरिका में अभी भी रंगभेद तथा नस्लवाद की जड़ें जमी हुई हैं। मार्टिन लूथर किंग के संबोधन के 50 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रपति ओबामा ने स्वीकारा कि आज भी श्वेत और अश्वेतों के मध्य भारी आर्थिक विषमताएं हैं तथा श्वेतों की अपेक्षा अश्वेतों को नौकरियां कम मिलती हैं। उन्होंने यह भी स्वीकारा कि न्याय के क्षेत्र में भी उनके साथ भेदभाव बरता जाता है। 2009 से आज तक 40 लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। हैरत की बात है कि लगभग 1.5 करोड़ अमेरिकियों के पास पूरे समय के काम का अभाव है तथा चार करोड़ 94 लाख अमेरिकी बेरोजगार हैं। है न अमेरिका की यह अनजानी तस्वीर।

इस आलेख के लेखक डां. देवर्षि शर्मा हैं


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