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Asaram Bapu: आसाराम ने आस्था का गला घोंटा

Posted On: 6 Sep, 2013 Others में

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आखिरकार आसाराम पुलिस की गिरफ्त में आ ही गए। दुष्कर्म का आरोप लगने के बाद 11 दिन तक देश की कानून व्यवस्था को धता बताने वाले आसाराम को इंदौर स्थित उनके आश्रम से जिस बेदर्दी से जोधपुर पुलिस की टीम ने रातोंरात उठाया, उससे देर-सवेर ही सही, मगर यह तथ्य तो पुख्ता हुआ ही है कि कानून की नजर में आम और खास में कोई अंतर नहीं है। तमाम सियासी चालों तथा सामाजिक वर्जनाओं की कसौटी को धूर्ततापूर्वक स्वयं के पक्ष में भुनाने वाले आसाराम की पोल अब खुल गई है। वैसे अब सवाल तो आसाराम के वे अनुयायी भी बन गए हैं, जो आसाराम को ईश्वर मान बैठे हैं। बहरहाल, आसाराम पर आरोप है कि उन्होंने मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा आश्रम की एक नाबालिग लड़की के साथ राजस्थान के जोधपुर स्थित अपने आश्रम में दुराचार किया। इस घटना ने एक झटके में आसाराम की छवि को तार-तार कर दिया। थोड़ी बहुत कसर उनकी बेजा हरकतों ने पूरी कर दी। जो आसाराम कभी अपने अनुयायियों को जीवन का मर्म समझाते थे, जिनके प्रवचन सुनने वालों की आंखें नम कर जाते थे और फिर जिनके लतीफों पर नम आंखें भी चमक उठती थीं, आज वही लाचार और बेबस नजर आ रहे हैं। कहीं हद तक इसके लिए उनका अभिमान भी जिम्मेदार है। ऐसा नहीं है कि आसाराम पर इससे पहले कोई आरोप न लगा हो। उनका इतिहास उठाकर देख लें, आरोपों के बोझ तले दबे नजर आते हैं। पर इससे पहले कभी इनके खिलाफ किसी ने भी खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं दिखाई। दरअसल, इस मामले में हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था और आम आदमी के भीतर पैठ जमा चुका अंधविश्वास ही है, जिसने आसाराम को घमंडी बना दिया।


अपने प्रभाव और समर्थकों की फौज के सहारे किसी ने आसाराम पर शिकंजा नहीं कसा। धर्मभीरू जनता ने भी विवादों के बादशाह को सिर-आंखों पर बिठाए रखा, जिसने उनके अभिमान में बढ़ोतरी ही की। पर शायद आसाराम यह भूल बैठे थे कि जहां अभिमान और घमंड आता है, बर्बादी भी उसके पीछे-पीछे आती है। फिर भले ही उसका रूप कैसा भी हो? आसाराम के समर्थक लाख दुहाई दें कि उनका ‘भगवान’ निदरेष है, वह ऐसा पतित कर्म कर ही नहीं सकता। किंतु संत पर दुष्कर्म का आरोप लगना ही उसके लिए मृत्यु समान है। आसाराम के विरुद्ध तो हवा भी ऐसी चल रही है कि अब उनकी सफाई भी उड़ती हुई दिखाई दे रही है। हालांकि यह भी सच है कि जब तक कानून किसी पर लगे आरोपों की साक्ष्यों द्वारा पुष्टि न कर दे, उसकी लानत-मलानत को उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह नैतिकता आम आदमी के लिए ही ठीक है, एक कथित संत के लिए नहीं। फिर कई बार आरोप की गंभीरता इतनी बड़ी होती है कि फिर उसके साबित होने या न होने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। याद कीजिए,बोफोर्स कांड। कानून कभी इससे जुड़े घोटाले को साबित नहीं कर पाया, किंतु इसके दंश के भारत के एक ऐसे प्रधानमंत्री को इतिहास में दफन कर दिया, जिसके वंश ने देश की नियति और राजनीति दोनों को बदलकर रख दिया था। वैसे भी सार्वजनिक जीवन में जिस नैतिकता और आचरण की उम्मीद की जाती है, आसाराम ने उसकी मर्यादा को लांघा है और इस तरह आसाराम काफी के तो कतई काबिल नहीं हैं। वहीं आसाराम प्रकरण में मीडिया की भूमिका को वृहद नजरिये से देखा जा सकता है। आसाराम के अनुयायियों से लेकर कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि आसाराम को बिना न्यायालय के फैसले के मीडिया ने गुनहगार साबित कर दिया है।


ऐसा मानने वालों का तर्क है कि मीडिया ने टीआरपी और रीडरशिप बढाने के चक्कर में यह सब किया है। आसाराम के समर्थकों का यह भी मानना है कि आसाराम पर तमाम आरोप पहले भी लगते रहे हैं, लेकिन मीडिया ने जो हायतौबा इस बार मचाई है, वह आसाराम के विरोध में चली गई। जबकि देखा जाए तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। आसाराम के मामले में मीडिया ने वही दिखाया, जो पत्रकारिता के मापडंडों पर खरा उतरता है।दरअसल, आसाराम को भगवान की तरह पूजने वाले यह चाहते थे कि मीडिया भी कथित तौर पर उनके भगवान का प्रवक्ता बन जाए। अगर ऐसा होता तो आसाराम के करोड़ों अनुयायी येन केन प्रकरेण पुलिस से लेकर राजनीतिक व्यवस्था पर आसाराम को गिरफ्तार न करने का दवाब बना देते। यह संभव भी था, क्योंकि यदि कानून व्यवस्था को मीडिया का सकारात्मक साथ नहीं मिला होता तो आसाराम को गिरफ्त में ले पाना टेढ़ी खीर ही था। पूरा देश इंदौर स्थित आसाराम के आश्रम में चल रहे घटनाक्रम को लाइव देख रहा था और यहीं से आसाराम के विरोध में स्वर पुख्ता हुए। बची-खुची कसर संसद में नेताओं ने पूरी कर दी। वर्ष 1994 में आसाराम की प्रसिद्धि से लेकर अब तक न जाने कितने ही नेता आसाराम और उनके अनुयायियों द्वारा सताए हुए थे और इस बार नेताओं को भी उनके खिलाफ भड़ास निकालने का मौका मिल गया। हालांकि ऐसा करना नैतिकता के तकाजे के विरुद्ध है, लेकिन बहते पानी में यदि नेताओं ने भी हाथ धो लिया तो क्या बुरा किया? क्या आसाराम ने कभी छल-प्रपंच की राजनीति नहीं की? क्या देश भर में फैले अपने छह सौ से अधिक आश्रमों और 12 हजार करोड़ की संपत्ति को उन्होंने नैतिकता से कमाया है? कदापि नहीं। यह सब आसाराम की धूर्तता की कमाई है और इतिहास गवाह है कि धूर्त के साथ व्यवहार भी वैसा ही होना चाहिए। फिर आसाराम तो इस बार ऐसे आरोप में घिरे हैं कि मीडिया हो या नेता; कोई भी उनका साथ देना नहीं चाहेगा।


आखिर देश की जनता सब देख रही है। माना कि आसाराम के करोड़ों समर्थक हैं, किंतु 125 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाला हमारा देश क्या आसाराम के समर्थकों से ही पटा है? उनके समर्थकों के इतर जो हैं, क्या उनके प्रति मीडिया, नेता और कानून जवाबदेह नहीं है? क्या मात्र आसाराम जैसा कथावाचक जो खुद को बापू और संत की पदवी से नवाजता है, मीडिया, नेता और कानून सभी अपनी नैतिकता को ताक पर रख देते? अत: जिन लोगों का भी यह मानना है कि मीडिया या नेताओं के दवाब में उनके कथित भगवान को शिकंजे में कसा गया है, सरासर अपनी कुंठा प्रदर्शित कर रहे हैं। दरअसल, वे आसाराम की गिरफ्तारी में खुद की हार को पचा नहीं पा रहे। एक सवाल यह भी है कि आसाराम जैसे कलयुगी संतों के पीछे देश का जनमानस जिस तरह भाग रहा है, क्या ताजा घटनाक्रम उस पर रोक लगा पाएगा? पूरे देश ने देखा कि किस तरह आसाराम के बेकाबू समर्थकों ने मीडियाकर्मियों को सरेआम पीटा, पुलिस पर उन्हें गिरफ्तार न करने का दवाब बनाया, क्या एक संत के अनुयायी इस हद तक जा सकते हैं? जिस संत के प्रवचन उन्हें जीवन में संयम का मार्ग दिखलाते थे, उसी के शिष्य इतने असंयमित? आसाराम का विवादित इतिहास जानते हुए भी यदि सैकड़ों-करोड़ों लोग उनके पीछे हो जाते हैं तो यकीन मानिए, हमें धर्म को पुन: परिभाषित करने की आवश्यकता है।


आसाराम यदि वाकई संत थे तो उन्हें झांसाराम बनने की क्या जरूरत थी? उन्होंने जेल को बैकुंठ कहा और जब जेल जाने की नौबत आई तो पुलिस के सामने गिड़गिड़ाने लगे। समर्थकों की मौजूदगी में दावा किया कि यदि जेल भेज गया तो अन्न-जल का त्याग कर देंगे, वहीं जेल और पुलिस अभिरक्षा में उन्हें दूध पीते पूरा देश देख रहा है। अपने बेटे नारायण साईं द्वारा खुद को मानसिक रूप से बीमार बताया। यहां तक कि खुद को नपुंसक तक साबित करने की कोशिश की, लेकिन डॉक्टरी परीक्षण में सब साफ हो गया। यहां गौर करने वाली बात तो यह है कि बकौल साईं यदि आसाराम मानसिक रोगी हैं तो वे किस आधार पर संसार को बैकुंठ की राह दिखाते हैं? क्या एक मानसिक रोगी गीता ान या पुराणों की गूढ़ता को समझ सकता है? सारा प्रपंच पुलिस की गिरफ्त से दूर रखने को रचा गया था, लेकिन स्वांग तो स्वांग ही होता है। अब जबकि आसाराम जेल की काल कोठरी में हैं और उनके समर्थकों की संख्या भी घटती जा रही है, जनता को ऐसे कथित संतों से दूरी बना लेनी चाहिए।


इस आलेख के लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम हैं


Web Title: asaram bapu arrest

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