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लोकपाल के इस हश्र का जिम्मेदार कौन

Posted On: 4 Jan, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Awdhesh Kumarराज्यसभा में लोकपाल विधेयक पर जो कुछ हुआ, उसे लेकर सरकार और विपक्ष के बीच भी मोर्चाबंदी हो चुकी है। राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा बैठक की कार्यवाही स्थगित करने के बाद भाजपा इसे लोकतंत्र की हत्या कह रही है, उसके नेता इसे 1975 में रात्रि में लगाए गए आपातकाल से तुलना कर रहे हैं। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की और इसके विरुद्ध जनांदोलन आरंभ हो गया है। जाहिर है, भाजपा के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। वैसे वामदलों की राय इतनी क्रांतिकारी नहीं है, लेकिन वे भी सरकार के रवैये की आलोचना कर रहे हैं। इसके विपरीत सरकार के मंत्री एवं कांग्रेस पार्टी के नेता अन्य दलों को छोड़कर केवल भाजपा को निशाना बना रहे हैं। उनके अनुसार केवल भाजपा के कारण लोकपाल विधेयक अटका। उनकी नजर में कांग्रेस व पूरी सरकार लोकपाल को कानूनी रूप देने को तैयार थी, पर भाजपा ने ऐसा नहीं होने दिया। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर आक्रामक दृढ़ता से कायम हैं। इससे यह तो साफ हो रहा है कि लोकपाल दोनों के बीच राजनीतिक टकराव का कारण बन गया है, पर प्रश्न है कि वाकई दोषी कौन है?


भाजपा के तेवर से ऐसा लग रहा है कि पार्टी इस पूरे प्रकरण को अपने राजनीतिक अभियान का अंग बना चुकी है। स्वाभाविक है कि वह इसे पांच राज्यों के चुनावों में मुद्दा बनाएगी। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने तो उत्तर प्रदेश की चुनावी रैलियों में लोकसभा में लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के विधेयक को विफल करने को लेकर विपक्षी दलों पर हमला आरंभ कर दिया है। इस प्रकार लोकपाल विधेयक की वर्तमान संसदीय परिणति चुनावी मुद्दा बन चुका है, लेकिन देशहित की दृष्टि से विचार करें तो इसका राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा, किसे नहीं, किसी को मिलेगा भी या नहीं.. जैसे प्रश्न यहां गौण हैं। वर्तमान संसदीय ढांचे में हमारा मूल सरोकार इस बात से होना चाहिए कि किसी तरह करीब साढ़े चार दशकों से लटका लोकपाल गठन का मामला फिर यथास्थान अवस्थित हो जाने की स्थिति में न जाए। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का कहना है कि कोई पार्टी लोकपाल नहीं चाहती। महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते समय लालू यादव और दूसरे लोग ऐसा ही कहते थे।


टीवी पर पूरे देश ने देखा कि राज्यसभा में किस तरह नारायण स्वामी के हाथों से विधेयक की प्रति लेकर राजद के सांसद राजनीति प्रसाद ने फाड़ा। यह नजारा वैसा ही था, जैसा हम महिला आरक्षण विधेयक के संदर्भ में कई बार देख चुके थे। इसके पूर्व राजद के सांसद लगातार विधेयक के विरोध में नारे लगा रहे थे। राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव खुद भी गैलरी में मौजूद थे। जाहिर है, राजनीति प्रसाद जो भी कहें, यह मानने का कोई कारण नहीं है कि बगैर लालू यादव के निर्देश के उन्होंने ऐसा किया होगा। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि कांगे्रस या संप्रग का कोई सदस्य राजद या राजनीति प्रसाद की आलोचना नहीं कर रहा है। भाजपा इसे कांग्रेस और सरकार के षड्यंत्र के रूप में चित्रित कर रही है। लोकसभा में विधेयक आने के बाद लालू यादव और मुलायम सिंह यादव द्वारा अल्पसंख्यक आरक्षण का मामला उठाने के संदर्भ में भी भाजपा ने इसे सरकार की रणनीति का अंग साबित करने की कोशिश की। पार्टी नेताओं और सांसदों से निजी बातचीत में कई बार यह सच उभर जाता है कि कोई भी ऐसा लोकपाल नहीं चाहता, जिससे उनके विशेषाधिकारों या वर्चस्व में कमी आने की आशंका हो। नाम संसद की सर्वोच्चता का लिया जाता है।


भाजपा नेतृत्व ने हालांकि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने से लेकर इसके हाथों सीबीआइ जैसी जांच एजेंसी को सौंपने की वकालत की है, लेकिन पार्टी के सांसदों से इस पर राय नहीं ली गई। अनेक सांसद इससे असहमत हैं। कांग्रेस के अंदर भी यही स्थिति है। सपा, राजद जैसी पार्टियां तो खुलकर इसके खिलाफ हैं। कहने का अर्थ यह कि आज की स्थिति में पार्टियों का आंतरिक मनोविज्ञान संपूर्ण रूप से मजबूत, स्वतंत्र और जांच सहित कानूनी कार्रवाई आदि सभी मामलों में स्वायत्त लोकपाल के पक्ष में नहीं है। अगर ये पक्ष में होते तो एक-दूसरे के खिलाफ संसद में आक्रामक मोर्चाबंदी एवं भाषण कला में अपनी वरीयता साबित करने की जगह सभी मिल-जुलकर इसे पारित करने की कोशिश करते। लोकपाल केवल सरकार का मामला नहीं है। संसदीय गणतंत्र में शीर्ष भ्रष्टाचार की जांच एवं कानूनी कार्रवाई के लिए ओम्बड्समैन की व्यवस्था से पक्ष-विपक्ष दोनों का सरोकार होना चाहिए। आज जो सरकार में हैं, वे कल विपक्ष में होंगे। लेकिन संसद में विपक्षी नेताओं के भाषणों और बाहर के वक्तव्यों से ऐसा लगता है, जैसे सरकार स्थायी रूप से सरकार ही रहेगी और ये स्थायी विपक्ष। सारे तर्क और रणनीति इसी मानसिकता से निकलते नजर आ रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि सरकार की रणनीति राज्यसभा में किसी तरह मतदान से बचने की थी। कारण साफ था। जब लोकसभा में बहुमत रहते वैसी दुर्दशा हुई तो राज्यसभा में तो वे हैं ही अल्पमत में और जब विपक्ष खिलाफ मतदान करने को डटा हुआ है तो फिर मतदान कराने का परिणाम भी स्पष्ट था। इसमें अरुण जेटली फ्रीडम ऐट मिडनाइट की जगह फ्लीडम ऐट मिडनाइट कह रहे हैं तो यह गलत नहीं है। पर सवाल है कि भाजपा ने लोकपाल को कानून का रूप दिलाने के लिए क्या किया? लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और राज्यसभा में अरुण जेटली ने अपने शब्दों और तर्को से बेशक सरकार को कठघरे में खड़ा किया, लेकिन राज्यसभा की बहस न्यायालयी बहस में परिणत हो गई थी।


जेटली और कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी के भाषण में कानूनी पहलू मुख्य थे, आम जनता को समझने और उसे आश्वासन देने का एक भी शब्द उसमें नहीं था। वकालती शैली में अगर संसद में बहस होगी तो उसमें एक-दूसरे को परास्त करने का कानूनी दांवपेच का वर्चस्व बना रहेगा। यही हुआ। जिस तरह से कांग्रेस ने कई वक्ताओं को उतारा और वे लंबा-लंबा भाषण देते रहे, वह केवल समय निकालने की रणनीति थी ताकि रात्रि के 12 बज जाएं और फिर विषय अगले सत्र के लिए टल जाए। आखिर में उसके लिए राजनीति प्रसाद ने बहाना दे दिया। भाजपा संयमित शब्दों में राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने की भी आलोचना कर रही है। यह भी बहस का विषय है, पर शायद भाजपा की खीझ केवल इस कारण है कि उसे सदन में सरकार को पराजित होते देखने का मौका नहीं मिल सका। लोकसभा में सरकार के हश्र का सामान्य विश्लेषण यह था कि कांग्रेस फ्लोर प्रबंधन में विफल रही। मतदान के समय 420 सांसद थे और दो तिहाई बहुमत के लिए केवल 280 का समर्थन चाहिए था। इतना बहुमत सरकार आसानी से हासिल कर सकती थी। दूसरे, अगर सरकार दस संशोधन मानने के लिए तैयार थी तो फिर विपक्ष को मनाने में समस्या नहीं आनी चाहिए थी। हालांकि यह निष्कर्ष भी हमारे नजरिए का है। लोकायुक्त के विधान को संघीय ढांचे पर प्रहार मानने वाली भाजपा इसके पक्ष में कैसे मतदान कर सकती थी। यह विषय राज्यसभा में भी था।


तृणमूल कांग्रेस तक इसके खिलाफ है। इसलिए पूरी स्थिति को सरकार के प्रबंधन की विफलता एकपक्षीय विश्लेषण माना जाएगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ने इसे फिर से संसदीय समिति को भेजने की मांग की थी। वस्तुत: राज्यसभा में लोकपाल की यही नियति निश्चित हो चुकी थी। अब सरकार फिर से इसे बजट सत्र में लाने की बात कह रही है, लेकिन एक बार इस मसौदे में परिवर्तन की मांग करने वाले इसे यों ही समर्थन नहीं दे सकते। तो क्या लोकपाल फिर से एक सपना ही रह जाएगा? उसका वही हश्र होगा, जो आज तक महिला आरक्षण का है?


लेखक अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं


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