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उद्देश्य से भटकी रथयात्रा

Posted On: 11 Nov, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Awdhesh Kumarइस समय भाजपा नेताओं में एक अलग तरह का आत्मविश्वास है। उनकी कोशिश देश के समक्ष खुद को कांग्रेस से बेहतर और एकमात्र सक्षम विकल्प साबित करने की है। सत्ता की राजनीति में यह अस्वाभाविक नहीं है। भ्रष्टाचार, महंगाई, के मोर्चे पर कठघरे में खड़ी इस सरकार के बाद भाजपा के अलावा और दूसरा है भी नहीं, लेकिन क्या भाजपा लोगों की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है? भाजपा को केवल वर्तमान चुनौतियों से निपटने योग्य ही नहीं, बल्कि कांग्रेस से अलग, सक्षम और एकजुट नेतृत्व वाली पार्टी दिखनी चाहिए। सरकार का नेतृत्व करने वाली पार्टी के रूप में कांग्रेस की भूमिका, उसकी संगठन संरचना, राजनीतिक शैली और नेताओं के व्यवहार की आलोचना करना आसान है पर उसके समानांतर जरा भाजपा पर नजर दौड़ाइए। इस संदर्भ में लालकृष्ण आडवाणी की 20 नवंबर तक चलने वाली जनचेतना को लिया जा सकता है। चूंकि यह सरकार के विरुद्ध देशव्यापी जनजागरण कार्यक्रम है इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी को परास्त करने के लिए ध्यान इस पर होना चाहिए था कि इस यात्रा का अधिकतम राजनीतिक लाभ कैसे उठाया जाए? इसमें सर्वप्रमुख नीति यही होनी चाहिए कि इसे सबसे ज्यादा प्रचार मिले और सारी चर्चा को इस पर केंद्रित रखा जाता, लेकिन इसके लिए पार्टी में शीर्ष से लेकर नीचे तक एकजुटता जरूरी है जिसका फिलहाल अभाव दिख रहा है। कुछ वर्ष पूर्व आडवाणी की यात्राओं के दौरान पूरी पार्टी एक साथ दिखती थी और देश का पूरा ध्यान इस ओर खींचने की रणनीति होती थी। इस बार भी हालांकि सिताबदियारा से आरंभ यात्रा में भाजपा के कई प्रमुख केंद्रीय नेता इसमें शामिल हुए पर सच यह है कि आज पार्टी के अंदर मुख्य ध्यान और चर्चा आडवाणी की यात्रा नहीं है।


येद्दयुरप्पा की गिरफ्तारी जैसी घटनाएं उनकी यात्रा की आभा ही मलिन नहीं कर रहे हैं, बल्कि पार्टी के दूसरे नेताओं के बयानों और कार्यक्रमों से भी इसकी महत्ता घट रही है। यात्रा आरंभ होने के पूर्व सितंबर महीने के उत्तरार्ध में मुख्य चर्चा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का उपवास रही। पार्टी की दुर्दशा यह रही कि दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी आडवाणी की यात्रा मुख्य विषय नहीं बनी। वहां अनुपस्थित रहकर नरेंद्र मोदी ही लोगों की अभिरुचि का विषय बने। उसके बाद मोदी के दस वर्षीय कार्यकाल की उपलब्धियां आ गईं। यानी मोदी..मोदी.मोदी..। ठीक यात्रा के दिन मोदी का ब्लॉग आ गया आडवाणी की प्रशंसा एवं यात्रा के समर्थन में। यह स्थिति केवल मोदी तक सीमित नहीं। अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कार्यकारिणी के ठीक पहले पत्रकार सम्मेलन में जनचेतना यात्रा का विवरण देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि यह पार्टी द्वारा निर्धारित शीर्ष नेतृत्व का निर्णय है। इसमें भी इसे मुख्य फोकस बनाने की रणनीति ओझल थी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में आडवाणी की यात्रा का सघन कार्यक्रम होना चाहिए था पर वाराणसी से उनकी यात्रा मध्य प्रदेश मोड़ दी गई। उनके समानांतर उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह एवं कलराज मिश्र के नेतृत्व में दो अलग यात्राएं चल रहीं हैं। इसके पीछे तर्क है कि प्रदेश चुनाव के कारण ये यात्राएं आवश्यक थीं, क्योंकि यदि चुनाव आयोग ने फरवरी में चुनाव घोषित कर दिया तो यह कार्यक्रम संभव नहीं हो पाता।


क्या आडवाणी की यात्रा को केंद्र एवं प्रदेश सरकार के खिलाफ नहीं किया जा सकता था? इससे आम नागरिकों और भाजपा कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। साफ है कि उत्तर प्रदेश में आडवाणी की यात्रा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया और यह लोगों की दृष्टि से छिपी नहीं है। अपने ही राजनीतिक लाभ को पर्याप्त महत्व न देने की ऐसी कोशिशों को किस नजर से देखा जाए? गडकरी द्वारा यात्रा का पूरा विवरण देते समय ही साफ हो गया था कि आडवाणी भले इसे काफी महत्व दे रहे हों, लेकिन पार्टी नेतृत्व केवल औपचारिकता पूरा कर रही है। सच यह है कि घोषणा करने के पूर्व आडवाणी अपने साथियों से इस पर चर्चा कर चुके थे, लेकिन जब नेताओं का मुख्य फोकस अपना पद, अपना कद और अपनी अहमियत बनाए रखना हो तो फिर ऐसे किसी कार्यक्रम के लिए आवश्यक एकजुटता कहां से आती। यात्रा के लिए उपयुक्त माहौल बनाने की राष्ट्रीय कोशिशें बिल्कुल नदारद हैं। ऐसे में यात्रा के अपेक्षित फलितार्थ को हासिल करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? निश्चित ही यह कोई अच्छी बात नहीं कही जा सकती।


इस आलेख के लेखक अवधेश कुमार हैं


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