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भाजपा का वैचारिक भटकाव

Posted On: 22 Nov, 2011 Others में

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Swapan Das2014 के चुनाव को लेकर उत्साहित भाजपा को अपनी दिशा-दशा पर आत्मचिंतन की सलाह दे रहे हैं स्वप्न दासगुप्ता


कुछ दशक पहले एक विशिष्ट ब्रिटिश सांसद ने टिप्पणी की थी कि विपक्ष सिद्धांतों की बात कर सकता है, जबकि समझौतों के कारण सरकार इन्हे कभी क्रियान्वित नहीं कर सकती। ये सज्जान हमेशा राजनीतिक रूप से अलग-थलग रहने के बावजूद एक अनूठी शख्शियत थे। वास्तविक जीवन में विपक्ष धरातल की तलाश में दबाव, असंगति और दोहरा रवैया अपना लेता है। युद्ध या गृहयुद्ध जैसे हालात को छोड़कर विपक्ष संसदीय राजनीति को अपना जनाधार बढ़ाने का अखाड़ा मानता है। अंतर्निहित विश्वास यह है कि अधिकांश आम चुनावों में मतदाता विपक्ष को सत्तारूढ़ करने के बजाय सत्ता पक्ष को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए मतदान करते है। भारत में भी यह धारणा मोटे तौर पर लागू है, यद्यपि उदारीकरण के बाद के दौर में कुछ सरकारे, खासतौर पर राज्यों में अपने प्रदर्शन के बल पर सत्ता में लौटने में सफल हुई है। पिछले 12 महीनों में जिस तरह संप्रग सरकार एक के बाद एक संकट में फंसती चली गई और धीरे-धीरे दशा-दिशा व नैतिक अधिसत्ता गंवा बैठी तो भारत के प्रमुख विपक्षी दल को लगने लगा कि जब भी चुनाव होंगे, जीत उसे ही मिलेगी। 2009 चुनाव के बाद जो हताश-निराश दिखाई दे रहे थे, अचानक उछलने लगे है। उन्हे सौगात मिलती नजर आ रही है।


यह अपरिहार्यता का भ्रम है जो स्पष्ट कर सकता है कि हालिया महीनों में भाजपा क्यों निरुद्देश्य ढंग से सक्रिय हो गई है और उसने राजनीतिक अस्तित्व के प्रमुख कार्यक्रम में संदेश देने में चुप्पी क्यों साध ली है? गत सप्ताह, जैसे ही संप्रग सरकार असहाय निष्क्रियता की अपनी कुंभकरणी नींद से जागी और संसद के शीतकालीन सत्र में सुधारोन्मुख विधेयक लाने की तत्परता दिखाई, भाजपा ने चौंकाने वाली असंबद्धता के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की। कारण का अनुमान लगाना दूर की कौड़ी नहीं है। 2004 में शिकस्त के बाद से भाजपा नकार और खिंचाव की मुद्रा में है। विपक्ष में पांच साल के दौरान निष्प्रभावी रहने के बाद नकार की प्रक्रिया 2009 के चुनाव के बाद खत्म हो गई और लालकृष्ण आडवाणी को नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिया गया। हालांकि, खिंचाव की प्रक्रिया तब शुरू हुई जब संप्रग-2 सत्ता में आ गया और नेतृत्व के अनसुलझे संघर्ष से घिर गया।


भाजपा के पास कोई ठोस विचार नहीं है कि कांग्रेस को अगले चुनाव में बेदखल करके गठबंधन सरकार बनाने के बाद वह किस तरह के भारत के निर्माण की परिकल्पना रखती है। जो आवेग व्यक्तियों और संप्रदायों को कांग्रेस के बजाय भाजपा को समर्थन देने को उत्पेरित करते हैं वे है- राष्ट्रीयता, व्यापारोन्मुख अर्थव्यवस्था, विनियमन और ढेर सारा सांस्कृतिक प्रतीकवाद। ये 21वीं सदी के वैश्विक युग में किस तरह कारगर होते है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।


एक समय था जब भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आहरित विचारधारा को पसंद करती थी, जबकि आज इसमें भौतिकवादी लाभ अहम हो गया है। एक सफल व्यावसायी नितिन गडकरी के नेतृत्व में भाजपा ने ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के मंत्र का जाप बंद कर दिया है। आज यह धारणा बन गई है कि राजनीति संसाधनों का अधिग्रहण करना है, जो जितना कर सके उतना ही बेहतर। गडकरी खुद भी इसी राजनीतिक संदेश में यकीन रखते है कि मुद्रा ही राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कुंजी है। महाराष्ट्र में गडकरी ने प्रमोद महाजन का विरोध किया था, किंतु दिल्ली में वह उन्हीं की स्टाइल पर चलने लगे। अपने सिद्धांतों और विचारधारा से भाजपा का विश्वास डिग रहा है। दूतावास के निकट संपर्क से प्रभावित होने वाली विदेश नीति हो, कॉर्पोरेट लॉबिंग से निर्धारित होने वाली अर्थव्यवस्था हो या फिर राजनीति की नैतिक अर्थव्यवस्था-भाजपा किसी पर भी सुनिश्चित राय नहीं रखती। भाजपा ने एक कार्यकारी समूह गठित किया था जो दृष्टि दस्तावेज के आधार पर पार्टी की मूल आस्थाओं को जिंदा रखने के काम में जुटा था। आखिरकार, दीनदयाल उपाध्याय के निधन को 47 साल जो हो चुके है, किंतु असलियत में उन लोगों की परंपरा को निभाते हुए जो बिना पढ़े ही किताब लिखते है, इस दस्तावेज की जिम्मेदारी कर्नाटक के एक उद्योगपति को सौंप दी गई थी।


भाजपा का अपना ही विशिष्ट अंदाज है। बहुत छोटे से कालखंड में ही एक सामान्य से आकार की पार्टी से कांग्रेस को चुनौती देने वाली पार्टी बनने तक भाजपा स्व-नियमन की वैकल्पिक व्यवस्था विकसित नहीं कर पाई है। यह एक तरफ वंशवाद और भाईभतीजावाद के लिए कांग्रेस को कोसती रही है, वहीं दूसरी तरफ अब खुद भी उसी रंग में रंगी हुई है। और इसके विनाशकारी नतीजे निकले है। कर्नाटक तो इसका सबसे खराब उदाहरण है ही, उत्तराखंड में भी अजीबोगरीब तमाशा हुआ है। भाई-भतीजावाद के विरोध के कारण ही 2009 में बीसी खंडूड़ी को मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया था, किंतु अब जब यह स्पष्ट हो गया कि उनके उत्तराधिकारी निशंक का भाई-भतीजावाद इतना अधिक हो गया है कि आगामी चुनाव में उन्हे जनता का समर्थन मिलना कठिन है, तो उन्हे हटाकर फिर से खंडूड़ी को पद पर बैठा दिया गया। भाजपा में जो कुछ भी घट रहा है, उससे उन लोगों का मोहभंग हो जाता है जो सोचते थे कि यह कांग्रेस का हितकारी विकल्प बन सकती है। सौभाग्य से सड़न ज्यादा नहीं है और अभी इसने पार्टी की जिजीविषा को खत्म नहीं किया है, किंतु यह महत्वपूर्ण है कि अगर भाजपा को 2014 के चुनाव में जीत हासिल करनी है तो अपनी साख और संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। पार्टी में दूसरे दर्जे का समर्थ नेतृत्व है, जो इस सफाई के काम को अंजाम दे सकता है।


लेखक स्वप्न दासगुप्ता वरिष्ठ स्तंभकार हैं


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