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चीन का राजनीतिक हथियार

Posted On: 31 Aug, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Brahmaचीन ने दुर्लभ खनिजों के एकाधिकार को व्यापारिक लाभ के हथियार के रूप में इस्तेमाल करके और दक्षिण चीन सागर में सीमा विवाद पर बहुपक्षीय प्रयासों से पहले ही दुनिया में खतरे की घंटी बजा दी है। अब उसने पानी को संभावित राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अपने पड़ोसी देशों को गहरी चिंता में डाल दिया है। एशिया की धुरी चीन में ऐसी नदियों की संख्या पूरे विश्व में सबसे अधिक है जो चीन से निकलकर अन्य देशों में बहती हैं। ये नदियां रूस, भारत, कजाकिस्तान आदि देशों से होकर गुजरती हैं। ऐसी तमाम बड़ी नदियां उन क्षेत्रों से निकली हैं, जिन पर चीन ने जबरन कब्जा किया है और जो चीन के भूभाग का 60 प्रतिशत क्षेत्र है। इस शक्तिशाली जल संसाधन के संबंध में जल बंटवारे की व्यवस्था या फिर अन्य सहयोगी संस्थागत तंत्र विकसित करने के तमाम प्रयास विफल साबित हुए हैं। वास्तव में, जैसा कि बांधों के निर्माण से संकेत मिलता है, चीन अपने फायदे के लिए उलटी धारा में तैर रहा है। मेकोंग, सलवीन, ब्रह्मपुत्र, अरुण, इरटिश इली और अमुर जैसी नदियों पर चीन बड़े-बड़े बांध बना रहा है। यह सब उन देशों की चिंताओं को दरकिनार करके किया जा रहा है, जहां से होकर नदियां गुजरती हैं।


दुनिया के किसी भी देश में इतने बांध नहीं हैं जितने चीन में। इनमें विश्व का सबसे बड़ा बांध थ्री जॉर्जेस भी शामिल है। विश्व के 50 हजार बड़े बांधों के करीब आधे बांध चीन में ही हैं। इसके बावजूद बांधों के साथ अपनी दीवानगी कम करने के बजाय चीन ने नदियों का प्रवाह बदलने के प्रयास भी शुरू कर दिए हैं। इस प्रकार चीन अंतरराष्ट्रीय नदियों का स्वरूप बदलकर उन्हें राष्ट्रीय बनाने में जुटा है।


मेकोंग नदी पर चीन का नवीनतम बांध पेरिस के एफिल टॉवर से भी ऊंचा है। यह अकेला बांध इतनी ऊर्जा का उत्पादन कर रहा है, जितना इस नदी पर बांध बनाकर अन्य तमाम देश कर रहे हैं। इसी प्रकार 5,850 मेगावाट की विद्युत क्षमता वाला निर्माणाधीन नूओझाडु बांध ऊंचाई में तो मेकोंग बांध जितना नहीं होगा, किंतु क्षमता में उससे बड़ा होगा। पिछली गर्मियों में, चीन के सरकारी पनबिजली उद्योग ने एक नक्शा जारी किया था, जिसमें निर्माण के लिए स्वीकृत प्रमुख नए बांधों की सूची थी। इनमें ब्रह्मपुत्र पर मेटोग पर बनने वाले बांध का भी जिक्र था। यह बांध चीन में स्थित विश्व के सबसे बड़े 18,300 मेगावाट के थ्री जोर्जेस बांध से भी दोगुना होगा। मेटोग भारत सीमा पर विवादित क्षेत्र में आता है।


अंतरराष्ट्रीय आंकलनों के अनुसार अगले एक दशक में विकसित देशों में बांधों की संख्या स्थिर रहने का अनुमान है, जबकि विकासशील देशों में बनने वाले बांधों में आधे से अधिक चीन में होंगे। बांधों के निर्माण को लेकर इस अतिउत्तेजना के दुष्परिणाम पहले ही नजर आने लगे हैं। पहला तो यह कि चीन अपने अधिकांश पड़ोसी देशों के साथ जल विवाद में उलझा हुआ है। इनमें रूस और भारत जैसे बड़े देशों से लेकर उत्तर कोरिया और म्यांमार जैसे छोटे देश भी शामिल हैं। दूसरे, परंपरागत आबादी वाले क्षेत्रों में विशाल बांधों के निर्माण के कारण तिब्बत, जिनजियांग और इनर मंगोलिया जैसे क्षेत्रों में चीनी शासन के खिलाफ विद्रोह या विरोध का विस्फोट हो गया है। तीसरा दुष्परिणाम यह है कि इन परियोजनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय नदियों के चीन की आंतरिक नदियों में तब्दील होने का खतरा पैदा हो गया है।


देश में ही नहीं, चीन विदेशों में भी बांध बनाने वाले देशों में अग्रणी है। पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर म्यांमार के समस्याग्रस्त कचिन और शान प्रांतों में भी चीन बांध बनाकर विवादों को हवा दे रहा है। पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्रों में चीनी सेना की इकाइयां बांध निर्माण कर भारत की चिंताओं को बढ़ा रही हैं तो म्यांमार में चीन द्वारा बांध निर्माण के कारण कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी और सरकार के बीच 17 साल से चला आ रहा युद्धविराम फिर से खूनी संघर्ष में बदल गया है। चीनी नदियों के साझीदार देश पनबिजली परियोजनाओं पर गोपनीयता के आवरण से चिंतित हैं। इनका निर्माण चुपचाप, लगभग गोपनीय रूप से किया जाता है और फिर इन्हें बाढ़ नियंत्रण के लिए जरूरी बताकर अपरिवर्तनीय घोषित कर दिया जाता है।


इससे भी बदतर स्थिति यह है कि चीन अपने किसी पड़ोसी देश के साथ जन-बंटवारे पर कोई संधि करने का इच्छुक नहीं है। जल बंटवारा, साझा जल संसाधन, जल संधि, सामान्य मानक और नियम जैसी शब्दावली चीन के लिए अभिशाप है। चीन उन तीन देशों में से एक है जिन्होंने 1997 में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय जल नीति पर साझा संसाधन के प्रस्ताव का विरोध किया था।


किसी दुर्घटनावश ऐसा नहीं है कि दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया के सभी साझा नदियों वाले देशों के बीच जल संधियां हैं, किंतु चीन की अपने किसी पड़ोसी के साथ ऐसी संधि नहीं है। सभी प्रमुख एशियाई नदियों के गले को दबाने वाला चीन एक उभरती हुई महाशक्ति है। वह अपनी दबंगई का खुला प्रदर्शन कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में चीन एशिया में एकमात्र बड़ी बाधा है जो साझा नदियों पर संस्थागत सहयोग और परस्पर व टिकाऊ लाभ के लिए किसी भी प्रकार की संधियों के पक्ष में हैं। असल में सबसे अधिक आबादी वाले एशिया में पानी विभिन्न देशों के बीच बढ़ते मतभेद और मनमुटाव के स्रोत के रूप में उभर रहा है। एशिया की प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वैश्विक औसत के आधे से भी कम है। पानी की बढ़ती तंगी से एशिया के तेजी से बढ़ते आर्थिक विकास पर ग्रहण लग सकता है। निवेशकों के लिए इसका खतरा गैरविकास ऋण, रियल एस्टेट बुलबुला और राजनीतिक भ्रष्टाचार से कम घातक नहीं है। इस खतरे के प्रति ध्यान देने की आवश्यकता है।


जल नक्शे पर एशिया का केंद्रीय भाग होने के नाते बीजिंग पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाना चाहिए कि वह पड़ोसी देशों के हितों को प्रभावित न करे और साझा जल के मनमाने इस्तेमाल से बाज आए। उसे संस्थागत जल सहयोग को स्वीकार करना चाहिए, जो सभी पार्टियों के बीच संयम की मांग करता है ताकि कोई भी देश प्रभावित देश को नुकसान पहुंचा कर साझा जल का अनुचित इस्तेमाल न कर सके।


लेखक ब्रह्मा चेलानी सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं


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