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खतरनाक जातीय संक्रमण

Posted On: 22 Dec, 2011 Others में

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Prashant Mishraक्षेत्रीय दलों की जातिवादी राजनीति का जहर अब राष्ट्रीय दलों में भी फैलता देख रहे हैं प्रशांत मिश्र


उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल को जातिवादी प्रदूषण ने विषैला बना दिया है। जातिवाद एक सामाजिक सच्चाई है, लेकिन हमारे नेताओं ने उसका सियासी दुरुपयोग करते-करते उसे विघटनवाद की कगार तक पहुंचा दिया है। चुनावी राजनीति में ‘जनता और आम आदमी’ का विघटन हो गया है। उसकी जगह जातियों का गणित हावी हो गया है। यह बात दूसरी है कि जाति की जगह पर ‘बिरादरी या समाज’ जैसी सद्भावना पूर्ण शब्दावली का प्रयोग होने लगा है। जातिवादी गोलबंदी के लिए भाईचारा सम्मेलन का नया नामकरण भी सामने आया है। जातिवादी रोग के संक्रामक और संघातिक होने की एक दुखद मिसाल राहुल गांधी के रमाबाई नगर के चुनावी भाषण से मिली है। जहां राहुल गांधी ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि भारत में उनके पिता के साथ कंप्यूटर क्रांति के पुरोधा सैम पित्रोदा वास्तव में सत्यनारायण गंगाराम हैं। वह उड़ीसा की विश्वकर्मा जाति के है। कांग्रेस द्वारा अति पिछड़ी जातियों के प्रोत्साहन की बात को समझने में उत्तर प्रदेश की जनता कहीं चूक न कर जाए, इसलिए राहुल गांधी ने इसे और अधिक साफ करते हुए कहा—वह ‘बढ़ई’ हैं। पूरे मीडिया ने राहुल गांधी की इस बेलगाम जातिवादी भाषणबाजी के विचित्र निहितार्थ पर ध्यान दिया। यह दृष्टांत दुखद है, क्योंकि कम से कम राहुल गांधी से इतना नीचे उतरने की अपेक्षा नहीं थी। कंप्यूटर से शुरू हुए भारत के आधुनिकीकरण अभियान को जातिवाद से जोड़ना अत्यधिक अनुचित है।


राहुल के भाषण से जातिवादी राजनीति के बढ़ते असर का अनुमान आसानी से लग सकता है। राजनीति में जातिवाद का नया जोश पिछड़ावाद और अतिपिछड़ावाद के रूप में सामने आया है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि इस बार कांग्रेस के विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में बेनी प्रसाद वर्मा का काफी दबदबा रहा है। अवध क्षेत्र में इससे असंतुष्ट हुए पुराने कांग्रेसियों ने राहुल की कई जनसभाओं तक में उपद्रव किया। कांग्रेस नेतृत्व ने इसके लिए जनपद स्तर के अपने कई नेताओं को पार्टी से निकालने में भी संकोच नहीं किया। यह साफ है कि अब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बेनी वर्मा शैली की राजनीति पर चल पड़ी है। ऐसा लग रहा है कांग्रेस ने पिछड़ी जातियों में पकड़ बनाने के लिए सपा-बसपा से इस चुनाव में होड़ लगाने की ठानी है।


यूपी में जब कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल ने इस खुले तरीके से जातिवाद को अपना लिया है, तो बसपा और सपा से विकासवादी राजनीति की आशा करना उचित नहीं होगा। अभी हाल में बसपा ने मुस्लिम-वैश्य-क्षत्रिय रैली करके रही-सही कसर को भी पूरा कर दिया है। रैली के पहले सार्वजनिक रूप से हिदायत दी गई कि मुस्लिम टोपी और क्षत्रिय साफा पहन कर आएं। वैश्यों ने मुख्यमंत्री को तराजू भी भेंट किया। इससे पहले ब्राह्मणों की बुलाई गई रैली में कहा गया था कि ब्राह्मण तिलक लगाकर सभा में आएं। बसपा की यह राजनीति नई नहीं है। 2007 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद यह ऐलान किया गया था कि सभी ब्राह्मण विधायक सतीश चंद्र मिश्र के आवास पर और मुस्लिम विधायक नसीमुद्दीन सिद्दीकी के आवास पर इकट्ठा हों। बसपा ने अपने जन्म के समय से ही समाज को इसी तरह देखा है। उसके लिए तो समाज शब्द का सीधा मतलब ही जाति है। शुरुआत में ही उसकी सभाओं में हर जाति की अलग-अलग गणना की जाती थी और उसके समाचार पत्र ‘बहुजन संघटक’ में इस गणना का विस्तारपूर्वक उल्लेख होता था।


यूपी की राजनीति में एक नए जातिवादी गणित का जज्बा लोगों में भरा जा रहा है। इस सिलसिले में ही राहुल गांधी ने सैम पित्रोदा की जाति का जिक्र किया था। इस नए जातिवादी अभियान में बसपा, भाजपा और कांग्रेस अलग-अलग तरीके से मंडलवाद के किले में दरार पैदा करके चुनावी लाभ लेने की कोशिश कर रही हैं। लगभग दो दशक पहले भाजपा ने भी कल्याण सिंह के जरिए मंडलवाद से अति पिछड़ों को तोड़ने की कोशिश की थी, जो इस दौड़ में उमा भारती के माध्यम से जारी है। अभी तक भाजपा व बसपा ने यादवों के समानांतर कुर्मी नेतृत्व को सशक्त बनाने की कोशिश की थी। अब इस अभियान में बेनी वर्मा के माध्यम से कांग्रेस भी शामिल हो गई है। इसके अलावा यादव व कुर्मी प्रभुत्व से अति पिछड़ों को बाहर निकालने के समीकरण भी राजनीतिक दलों ने तेज किए हैं। कांग्रेस ने पिछड़ों के कोटे में ही मुसलमानों को अलग आरक्षण देने की नीति का समर्थन करके सपा को और अधिक परेशान किया है। बसपा की नीति भी इससे अलग नहीं है। हालांकि, मायावती यह भी कहती हैं कि संविधान में संशोधन करके मुस्लिमों के लिए अलग से आरक्षण करके कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ा दिया जाना चाहिए। निश्चित रूप से फिलहाल संविधान में संशोधन और सर्वोच्च न्यायालय की सोच में परिवर्तन संभव नहीं है। इसलिए मायावती के इस प्रस्ताव का भी व्यावहारिक अर्थ यही है कि अति पिछड़ों और मुसलमानों को पिछड़ी जातियों के कोटे से ही अलग आरक्षण मिलना चाहिए।


जातिवादी राजनीति के इस नए दौर में आरक्षण के अंदर आरक्षण का पेचीदा गणित शामिल है। वास्तव में दक्षिण भारत में यह गणित काफी पहले से इस्तेमाल हो रहा है। उत्तर भारत में मंडलवाद के भीतर आरक्षण के लिए अलग उपवर्ग बनाने की बात नई है। बिहार में भी कुछ दिनों तक कर्पूरी ठाकुर ने ऐसा फार्मूला चलाया था। अब उत्तर प्रदेश में उसी तरह के फार्मूले की बातें करके अति पिछड़ों व मुसलमानों को लुभाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा उपवर्गीय आरक्षण के इस अभियान में मजबूरीवश मुसलमानों को शामिल नहीं कर सकती, लेकिन अति पिछड़ों को यादव-कुर्मी से अलग करने की नीति राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल में ही बन गई थी।


कई बार ऐसा लगता है कि चुनाव के कारण उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिवाद का असर अधिक दिख रहा है, जबकि वास्तविकता में हमारी राष्ट्रीय राजनीति भी उसी रास्ते चल पड़ी है। लोकपाल में आरक्षण व्यवस्था हो रही है। अभी हाल में लोकसभा में न्यायपालिका में आरक्षण की वकालत भी हुई। आरक्षण का यह रूप कुछ इस तरह फैलता दिख रहा है कि भविष्य में क्रिकेट टीम में भी आरक्षण की मांग अगर सुनी जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। दुखद तथ्य यह है कि जातिवादी आंकड़ों का वास्तविक उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक नियोजन नहीं, बल्कि शुद्ध चुनावी व राजनीतिक है। हमारी पंथनिरपेक्ष व्यवस्था में धार्मिक आधार पर वोट की राजनीति को तो प्रतिबंधित कर दिया गया है, लेकिन जातिवादी भारतीय समाज के विकट विभाजन पर हम मौन है। अगर हमारे रहनुमा बंद आंखों से यह राजनीति करते रहे तो कहीं भविष्य में सांप्रदायिक राजनीति का रास्ता ही न साफ हो जाए। वक्त आ गया है कि आम जनमानस राजनीति के इस विध्वंसक रूप पर विचार करे।


लेखक प्रशांत मिश्र दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं


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