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पश्चिम बंगाल में निर्ममता

Posted On: 20 Apr, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Anant Vijayपश्चिम बंगाल की जनता ने बड़ी उम्मीदों से ममता बनर्जी का साथ दिया था और उसी उम्मीद पर सवार होकर ममता ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टियों का डिब्बा गोल कर दिया था। अब तो विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने भी ममता बनर्जी को सौ ताकतवर शख्सियतों में शुमार कर लिया है। जनता के विशाल बहुमत मिलने से नेताओं के बेअंदाज होने का जो खतरा होता है, ममता बनर्जी उसकी शिकार हो गई। जबसे ममता बनर्जी सत्ता में आई हैं, उनसे अपनी और अपनी नीतियों की आलोचना बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। वह अपने और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही हैं। पहले सरकारी सहायता प्राप्त पुस्तकालयों में सिर्फ आठ अखबारों की खरीद को मंजूरी और बाकी सभी अखबारों पर पाबंदी लगाकर अखबारों को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सरकार के खिलाफ लिखना बंद करें। ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप यह लगे कि उन अखबारों की सरकारी खरीद पर पाबंदी लगाई गई, जो लगातार ममता और उनकी नीतियों के खिलाफ लिख रहे थे। जब देशभर में ममता बनर्जी के इस कदम की जमकर आलोचना हुई तो चंद अखबारों को और खरीद की सूची में जोड़कर उसे संतुलित करने की कोशिश करने का दिखावा किया गया। पिछले दिनों ममता और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का कार्टून बनाने वाले को जेल की हवा खिलाकर ममता बनर्जी ने अपनी फासीवादी छवि और चमका ली है।


गलत दिशा में पश्चिम बंगाल


जाधवपुर विश्वविद्यालय के विज्ञान के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र पर आरोप है कि उन्होंने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं के कार्टून ई-मेल पर सर्कुलेट किए। उन कार्टून में ममता बनर्जी और रेलमंत्री मुकुल रॉय के बीच दिनेश त्रिवेदी से निपटने की मंत्रणा है, जो ममता को नागवार गुजरी। प्रोफेसर महापात्र पर तमाम धाराओं के अलावा आउटरेजिंग द मॉडेस्टी ऑफ वुमेन लगा दी गई है, जिसमें साल भर की सजा का प्रावधान है। लेकिन ममता बनर्जी पुलिस की कार्रवाई को जायज ठहरा रही है। उनकी पार्टी के नेता कोलकाता पुलिस के कदम को उचित करार दे रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत और बार-बार केंद्र सरकार से अपनी बात मनवा लेने से ममता के हौसले सातवें आसमान पर हैं। उन्हें लगता है कि वह बहुत बड़ी नेता हो गई हैं। हो भी गई हैं, लेकिन अभी वह बड़े नेता के बड़प्पन को हासिल नहीं कर पाई हैं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़ा नेता वह होता है, जिसमें अपनी आलोचनाओं को सुनने और सामना करने का माद्दा होता है। इस संबंध में 1939 का एक वाकया याद आता है।


गांधी जी ट्रेन यात्रा कर रहे थे, उनके साथ उनके सहयोगी महादेव देसाई भी थे। अचानक महात्मा गांधी के डिब्बे में एक युवक आया। उसके हाथ में गोविंद दास कौंसुल की किताब महात्मा गांधी: द ग्रेट रोग (क्त्रश्रद्दह्वद्ग) ऑफ इंडिया थी। वह युवक उस किताब पर गांधी जी की सम्मति लेना चाहता था। जब वह किताब लेकर गांधी की ओर बढ़ा तो महादेव देसाई ने उसके हाथ से किताब झटक ली और उसका शीर्षक देखकर वह उसे फेंकने ही वाले थे कि इतने में गांधीजी की नजर उस पर पड़ गई। उन्होंने महादेव देसाई से लेकर वह किताब देखी और उस युवक को अपने पास बुलाकर उससे उसकी इच्छा पूछी। युवक जिसका नाम रणजीत था, उसने पुस्तक लेखक का पत्र देकर गांधी जी से उस किताब पर उनकी राय पूछी। बगैर क्रोधित हुए गांधी ने किताब को उलटा-पलटा और फिर उस पर लिखा, मैंने किताब को उलटा-पुलटा और इस नतीजे पर पहुंचा कि शीर्षक से मुझे कोई आपत्ति नहीं है।


लेखक जो भी उचित समझे, उसे लिखने की छूट होनी चाहिए। ये गांधी थे, जो अपनी आलोचना से जरा भी नहीं विचलित होते थे और आलोचना करने वाले को भी अभिव्यक्ति की छूट देते थे। लेकिन गांधी के ही देश में आज एक नेता का कार्टून बनाने पर एक प्रोफेसर को जेल की हवा खानी पड़ती है। लगता है कि ममता बनर्जी कार्टून के माध्यम को दरअसल समझ नहीं पाई, उनके कदमों से ऐसा ही प्रतीत होता है। दरअसल, कार्टूनिस्ट उन्हीं राजनेताओं के कार्टून बनाते हैं, जिनकी शख्सियत में कुछ खास बात होती है। आम राजनेताओं के कार्टून कम ही बनते हैं। पूरे विश्व में कार्टून एक ऐसा माध्यम है, जिसके सहारे कभी-कभी तो पूरी व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी की जाती है, जो लोगों को गुदगुदाते हुए अपनी बात कहते हैं और बहुधा किसी राजनेता या समाज के अहम लोगों के क्रियाकलापों को परखते हैं। आज ममता बनर्जी जैसी नेता कार्टून जैसे माध्यम की भावना को समझे बगैर कलाकार को जेल भिजवाने जैसा काम कर रही हैं, उससे उनका कद राजनीति में छोटा ही हो रहा है। किसी प्रोफेसर को झुग्गी-झोपड़ी वालों का समर्थन करने पर जेल जाना पड़ता है।


ममता बनर्जी की पार्टी के नेता अपने विरोधियों के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं बनाने की वकालत करते हैं। उनकी पार्टी के सांसद खुलेआम यह ऐलान करते हैं कि संसद के सेंट्रल हॉल में वे लेफ्ट पार्टियों के नेताओं के साथ नहीं बैठ सकते। इस तरह की राजनीतिक छुआछूत का माहौल इस देश में पहले कभी नहीं बना था। यह सही है कि लेफ्ट के शासनकाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर जमकर अत्याचार हुए। टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन का आरोप है कि लेफ्ट के इशारे पर तृणमूल के कई कार्यकर्ताओं की हत्या भी की गई, लेकिन इन तमाम बातों को आधार बनाकर जिस तरह से ममता विरोधियों की आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है, वह घोर निंदनीय है। ममता बनर्जी को याद होगा कि जब वह लेफ्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थीं तो उस वक्त बंगाल के बुद्धिजीवियों ने उनका खुलकर साथ दिया था। अब वही बुद्धिजीवी ममता के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। पश्चिम बंगाल में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाने के लिए सड़क पर उतरे लोगों के साथ भी पुलिस ने बदतमीजी की, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब वक्त आ गया है कि ममता बनर्जी को भारतीय राजनीति में अपनी गंभीर छवि के बारे में शिद्दत से सोचना चाहिए। वरना, उनके लिए इतिहास के अंधेरे में गुम होने का खतरा पैदा हो जाएगा। क्योंकि वह किसी पार्टी की मुख्मंत्री नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल की सीएम हैं। लेफ्ट को भी बंगाल ने कई बार भारी बहमनुत से जिताया था, लेकिन जब सूबे की आवाम को लगा कि जिसे वह शासन की बागडोर सौंप रही है, उस पार्टी में और उस पार्टी के नेताओं में शासन में आने के बाद तटस्थता नहीं रहती है तो उसे भी उखाड़ फेंका। लेफ्ट ने भी वोट बैंक की खातिर तसलीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से निकालने की गलती की थी, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। अब ममता भी वही गलती दोहरा रही हैं। क्या इतिहास से वह कोई सबक नहीं लेना चाहतीं!


लेखक अनंत विजय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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