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शास्त्री का नेतृत्व

Posted On: 3 Oct, 2011 Others में

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लालबहादुर शास्त्री का जीवन लखनऊ से दिल्ली तक काफी उथल-पुथल भरा रहा। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में गोविंदबल्लभ पंत जब मुख्यमंत्री बने तो लाल बहादुर शास्त्री को उत्तर प्रदेश का गृहमंत्री बना दिया गया। प्रयाग विश्वविद्यालय के गंगानाथ झा छात्रावास में नवंबर 1950 में एक आयोजन हुआ जिसमें लालबहादुरजी मुख्य अतिथि थे। नाटे कद व कोमल स्वभाव वाले शास्त्री को देखकर किसी को कल्पना भी नहीं थी कि वह कभी भारत के दूसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री बनेंगे। 1951 में बेंगलूरू में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नेहरू ने संपूर्णानंद की सलाह पर जवाहर लाल नेहरू ने लालबहादुर शास्त्री को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महामंत्री नियुक्त करा दिया, लेकिन लालबहादुर शास्त्री ने अनमने मन से ही पद ग्रहण किया। लालबहादुर शास्त्री ने महामंत्री पद तो ग्रहण कर लिया, परंतु सामने 1952 का प्रथम आम चुनाव एक बड़ी समस्या बन गया।


नेहरू प्रधानमंत्री थे और उन्हीं की तरह लालबहादुर शास्त्री भी उच्च नैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे। वह किसी उद्योगपति से धन मांगना नहीं चाहते थे। खैर शास्त्रीजी ने किसी प्रकार संगठन में जान फूंकी। इस प्रथम चुनाव में पं.जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद के फूलपुर सीट से और लालबहादुर मिर्जापुर और बनारस के ग्रामीण सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। मेरा सामना लालबहादुरजी से 7 जनवरी 1952 को आनंद भवन में हुआ। उस समय मैं इलाहाबाद युवक कांग्रेस के सचिव के रूप में आनंद भवन में कार्यरत था। फूलपुर चुनाव संचालन का दायित्व बहन मृदुला साराभाई व इंदिरा गांधी पर था। विपक्ष में एकजुट होकर नेहरू को हराने के लिए हिंदू नेता प्रभुदत्त ब्रह्मचारी को खड़ा कर दिया। दोनों तरफ से धुंआंधार प्रचार हुआ, परंतु जब परिणाम सामने आया तब ब्रह्मचारीजी करीब 5000 मतों से अपनी जमानत बचा पाए। कांगे्रस ने इलाहाबाद से 3 संसदीय सीट व 16 विधायक सीटें जीती। पूरे भारत में कांगे्रस ने भारी बहुमत से लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की और जवाहर लाल नेहरू पुन: प्रधानमंत्री बन गए।


लालबहादुर शास्त्री को बहुत ही महत्वपूर्ण रेल मंत्रालय का दायित्व मिला। वर्ष 1954 में इलाहाबाद में महाकुंभ मेला लगा। करीब 20 लाख तीर्थयात्रियों के लिए व्यवस्था की गई। नेहरू ने खुद जायजा लिया ताकि कोई दुर्घटना न हो जाए। लालबहादुर शास्त्री स्वयं समय-समय पर रेल व्यवस्था का जायजा लेते रहते। दुर्भाग्यवश मौनी अमावस्या स्नान के दौरान बरसात होने के फलस्वरूप बांध पर फिसलन होने से प्रात: 8.00 बजे दुर्घटना हो ही गई। सरकारी आंकड़ों ने 357 मृत व 1280 को घायल बताया, परंतु ग्राम सेवादल कैंप जिसकी देखरेख मृदुला साराभाई व इंदिरा गांधी कर रही थी की गणना के अनुसार यह संख्या दोगुनी थी। दुर्घटना पर जांच कमीशन बैठा। उसने डेढ़ वर्ष बाद रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए रत्तर प्रदेश सरकार और रेल अव्यवस्था को दोषी करार दिया। 1956 के मध्य में भी कुछ और रेल दुर्घटनाएं हो गई। इसलिए नैतिकता के आधार पर शास्त्रीजी ने नैतिक दायित्व मानते हुए रेलमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। इसी तरह लालबहादुर जब जून 1964 में प्रधानमंत्री बने तो अनेक उद्योगपतियों ने उन्हें घेरना चालू कर दिया। साजिश के तहत उनके पुत्र हरीशास्त्री को गोयनका ग्रुप के भारत बैरल्स लि. में 10 हजार प्रतिमाह के वेतन पर निदेशक बना दिया गया। जैसे ही लालबहादुर को इसका पता चला उन्होंने त्यागपत्र दिलवा दिया। ऐसी ही एक घटना है कि उद्योगपति शांति प्रसाद जैन की। वह अक्टूबर 1964 में उनसे मिलने दिल्ली आए, लेकिन लालबहादुर ने मना कर दिया। बाद में पता चला कि जब मोरारजी देसाई नेहरू मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री थे तब लंदन से जैन ने उनके साथ यात्रा की थी और वह पालम हवाई अड्डे पर विदेशी मुद्रा के चक्कर में पकड़े गए थे और उन पर मुकदमा चल रहा था इसीलिए वह उनसे नहीं मिले। प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू व शास्त्री में जमीन-आसमान का अंतर था। नेहरू निर्देश देते थे और चाहते कि तीनों सेना प्रमुख उसका पालन करें। इसके विपरीत लालबहादुर ने भारत-पाक युद्ध में तीनों सेना प्रमुखों को खुली छूट दी।


1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परंपरानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के चीफ व मंत्रिमंडल सदस्य शामिल थे। लालबहादुर शास्त्री कुछ देर से पहुंचे। विचार-विमर्श हुआ तीनों अंगों के प्रमुखों ने पूछा सर क्या हुक्म है? शास्त्री ने तुरंत कहा आप देश की रक्षा कीजिए और मुझे बताइए कि हमें क्या करना है? इतिहास गवाह है रात्रि के करीब 11.00 बजे करीब 350 हवाई जहाजों ने पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की ओर उड़ान भरे। कराची से पेशावर तक जैसे रीढ़ की हड्डी को तोड़ा जाता है ऐसा करके सही सलामत लौट आए। बाकी जो घटा उसका इतिहास गवाह है। शास्त्रीजी ने इस युद्ध में पं. नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सब एकजुट हो गए। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी नहीं की थी। ताशकंद समझौते के दौरान उनकी मृत्यु देश के लिए दुखद आघात था।


इस आलेख के लेखक ललित बिहारी लाल हैं


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