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मेल-मिलाप पर सवाल क्यों

Posted On: 30 Apr, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Awdhesh Kumarशुक्रवार को मिलाप और सोमवार को तलाक! स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के बीच यही हुआ है। तलाक शब्द थोड़ा ज्यादा कड़ा लग सकता है, क्योंकि अन्ना के साथियों ने यह कहा है कि अलग-अलग होते हुए भी जरूरत पड़ने पर आंदोलन में एक दूसरे का साथ देंगे। किंतु 21 अप्रैल को गुड़गांव में एक दूसरे को गले लगाते और मुस्कराते अन्ना और रामदेव ने साझा पत्रकार वार्ता में जो घोषणाएं की थीं, उनकी ध्वनि यह थी कि भ्रष्टाचार, लोकपाल और कालाधन वापस लाने के मुद्दे पर एक मई से दोनों का अभियान एक हो जाएगा। यानी एक ही योजना के तहत अन्ना शिरडी से अभियान आरंभ करेंगे तो रामदेव दुर्ग से और 3 जून को दोनों एक साथ दिल्ली में सांकेतिक अनशन पर बैठेंगे। 23 अप्रैल को अन्ना की कोर कमेटी की बैठक की ध्वनि के अनुसार अभियान तो वैसे ही चलेगा, लेकिन ये अलग-अलग होंगे। इनके बीच कोई समन्वय नहीं होगा। 3 जून को रामदेव के अनशन में अन्ना रहेंगे, पर उसका व्यावहारिक अर्थ कुछ नहीं हो सकता। सच कहा जाए तो यह व्यवहार में तलाक यानी एकला चलो ही है। बयान में थोड़ा व्यामोह बनाए रखने की कोशिश से कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। इससे उन लोगों को अवश्य धक्का लगा होगा, जो दोनों को साथ जोड़कर जोरदार आंदोलन की कल्पना कर रहे थे। रामदेव और उनके अभियान का हश्र, उनका तरीका तथा अन्ना के अब तक के अभियान, खुद उनका व कोर टीम के सदस्यों के आचरण को देखते हुए इसमें आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। जरा सोचिए, कोर कमेटी की बैठक बुलाई गई थी।


टीम अन्ना को सही जवाब


हिमाचल चुनाव में अपनी भूमिका तय करने तथा इस बीच आंदोलन को कैसे बनाए रखा जाए, इस पर विचार करने के लिए और एजेंडा बन गया रामदेव व अन्ना का मिलाप। हंगामा ऐसा कि लगा जैसे अन्ना ने किसी ऐसी चीज को हाथ लगा दिया है, जिसके बाद पूरी टीम ही अस्पृश्य हो जाएगी। यह देश को भ्रष्टाचार और कुशासन से मुक्ति दिलाने की उत्तम कामना वाली टीम का आचरण नहीं हो सकता। अगर सोच यह होती कि भ्रष्टाचार और कुशासन से मुक्ति का लक्ष्य कमजोर हो जाएगा तो इसका समर्थन किया जा सकता था। यहां विचार का केंद्र केवल अपनी छवि और भूमिका थी। कोई कह रहा था कि हमने अब तक जो उपलब्धियां हासिल कीं, उसका भागीदार रामदेव को क्यों बना दें, तो कोई रामदेव को ही विफल साबित कर रहा था। किसी की चिंता यह थी कि साथ आने के बाद अन्ना की कोर कमेटी की भूमिका क्या होगी? यानी भय यह कि हमारी निर्णायक भूमिका नहीं रह पाएगी। ऐसी सोच से क्या भारत जैसे बहुविध आकांक्षाओं वाले विशाल देश में कोई युगांतकारी परिवर्तन तो छोडि़ए, लंबे समय का देशव्यापी आंदोलन चलाया जा सकता है? कतई नहीं। आंदोलन के नेतृत्व की पहली ही शर्त है स्व का विलोप यानी सार्वजनिक हित की वेदी पर निजी अहं, छवि आदि की बलि चढ़ा देना। ऐसा न करने से ही अहं उभरता और एक-दूसरे से टकराता है। अन्ना अभियान से अतिशय उम्मीद लगाने वालों को यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश के कारण पिछले वर्ष अप्रैल और अगस्त के उनके अनशन में लोगों की भागीदारी अवश्य दिखाई दी, सत्याग्रही के रूप में टीम का विकास हुआ ही नहीं।


आपसी मतभेद और अविश्वास इतना है कि अकेले में वे एक-दूसरे पर ही आरोप लगाते हैं। दिसंबर के मुंबई अनशन की विफलता का अन्ना की टीम ने पूरा सबक लिया हो, ऐसा लगता नहीं। बाबा रामदेव ने देशव्यापी दौरे से अपना संगठन बनाया और उसकी ताकत की भूमिका भी अप्रैल और अगस्त के अन्ना अनशन में थी, लेकिन सच यह है कि अभी जनांदोलन आरंभ भी नहीं हुआ है। दिल्ली जैसे शहर में व्यापक प्रचार रणनीति, आकर्षक मंच, बेहतरीन ध्वनि तंत्र, भाषण, गीत और कुछ भावनात्मक घटनाओं की फिल्मों के संयोजन से एक-दो-तीन-चार.. दिन का आकर्षक कार्यक्रम कर लेना आंदोलन नहीं है। मुद्दों और लक्ष्यों के प्रति जनजुड़ाव का जमीनी अभियान, आंदोलनकारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और कार्यक्रमों से उनका सतत विकास करते हुए ही लंबा आंदोलन चलाया जा सकता है। यह अत्यंत कठिन काम है। अन्ना ने पिछले वर्ष इस तरह की घोषणा की थी, लेकिन उसे मूर्त रूप देने की दिशा में काम नहीं हुआ। ऐसा करने के लिए स्वयं के अंदर भी वैसी दूरदृष्टि, पूरी कल्पना तथा संकल्प शक्ति होनी चाहिए। बाबा रामदेव का संगठन भी इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता। यह नहीं भूलना चाहिए कि 2010 में अन्ना और उनकी वर्तमान कोर टीम के प्रमुख सदस्य रामदेव के सहभागी दिखते थे। अगर ये अलग हुए तो उसके पीछे मुख्य भूमिका निजी अहं की ही थी। अन्ना ने स्वयं यह बयान दिया कि रामदेव तानाशाह की तरह व्यवहार करते हैं। जाहिर है, एक-दूसरे के प्रति इनके अंदर विश्वास और सम्मान का अभाव था। आज इनके बीच फिर से विश्वास पुनस्र्थापित हो गया होगा, इसका तो कोई कारण नजर नहीं आता।


यह कहना ज्यादा उचित होगा कि जिस तरह अलग होने के पीछे किसी विशाल सोच की भूमिका नहीं थी, वैसे ही पुन: साथ आने की घोषणा के पीछे भी। सच यह है कि पिछले दिनों अपने अभियान की धार कमजोर होने से चिंतित अन्ना के बेहद करीबी ही रामदेव से मिलने हरिद्वार गए थे। उसके पीछे अन्ना की सहमति अवश्य रही होगी। अन्यथा, वे साझा पत्रकार वार्ता नहीं करते। हां, यह साफ है कि कोर कमेटी में इस पर विचार नहीं हुआ था। आप किसी बड़े लक्ष्य के लिए आंदोलन कर रहे हैं तो साथियों का एक-दूसरे पर इतना विश्वास होना चाहिए कि अगर किसी ने कोई कदम उठा लिया तो उसे समर्थन दिया जाए। इस प्रकार मिलाप और तलाक का यह प्रसंग जिसे अन्ना की कोर कमेटी कहा जाता है, उसके अंदर आपसी अविश्वास का सार्वजनिक प्रकटीकरण भी है। ऐसी टीम से हम किसी बड़े अभियान की उम्मीद कर ही नहीं सकते। इसमें अगर ये साथ बने रहे तब भी बिल्कुल एकजुट होकर किसी संघर्ष को अंजाम नहीं दिया जा सकता। वैसे भी आंदोलन या अभियानों में व्यक्तियों की सहमति का महत्व तभी है, जब उनके बीच एजेंडे पर सहमति हो। न रामदेव, न अन्ना या उनकी टीम में साझा अभियान के समर्थकों ने ऐसा कोई संयुक्त एजेंडा बनाया, जिस पर साथ काम किया जा सके। तो रामदेव बनाम अन्ना पर हमारी-आपकी प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए? यदि आप तटस्थ नजरिया अपनाते हैं तो इससे भाव विह्वल होने का कोई प्रश्न नहीं है। अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अन्ना या रामदेव वैसे समग्र व्यापक परिवर्तन की विचारधारा से अभियान नहीं चला रहे, जिसकी यह समय मांग कर रहा है।


संसदीय लोकतंत्र में मजबूत लोकपाल जैसी सशक्त संस्था की आवश्यकता है और इस नाते अन्ना के अभियान की सार्थकता रही है, लेकिन इसे रचना और संघर्ष का व्यापक रूपाकार देने की न उनकी कल्पना थी, न है और आपसी कलह तथा अविश्वास इन्हें अंदर से खोखला कर रहा है। बाबा रामदेव के अभियान में रचना और संघर्ष सम्मिलित है, लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों से टक्कर लेने के लिए स्वयं उसी तरह के महाकाय मशीनी और उत्पादन ढांचे का कारखाना और बाजार तंत्र खड़ा करना उसका जवाब नहीं हो सकता। हर प्रकार की उपभोग जरूरतों का उत्पादन और बिक्री तंत्र का संचालन करते हुए आंदोलन का सफल संचालन नहीं किया जा सकता। दुनिया में परिवर्तनकारी आंदोलनों का नेतृत्व उन्हीं लोगों ने किया, जो सर्वस्व त्याग कर मैदान में कूदे। भारत में ही महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया सरीखे मनीषियों की लंबी श्रृंखला है। हां, हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि इनके अभियानों के व्यापक मीडिया करवेज से जो जन जागरण हुआ है या आगे होगा, उससे ही शायद ऐसा एकल या सामूहिक नेतृत्व उभरे, जो समय की मांग के अनुरूप जनांदोलन खड़ा कर पाए। कुल मिलाकर अन्ना और रामदेव के तलाक पर आंसू बहाने का कोई कारण नहीं है।


लेखक अवधेश कुमार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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