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येद्दयुरप्पा के जेल जाने का मतलब

Posted On: 19 Oct, 2011 Others में

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Awdhesh Kumarयह कितनी बड़ी विडंबना है कि दक्षिण के किसी राज्य में जिस व्यक्ति के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी पहली सरकार गठित की, वही व्यक्ति उसी सरकार के कार्यकाल के अंदर भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल की हवा खाने को मजबूर है। जरा 2008 का वह समय याद करिए, जब येद्दयुरप्पा का विजय जूलूस निकला था और उनका शपथ ग्रहण समारोह हुआ था। भाजपा के सभी प्रमुख नेताओं ने उसमें शिरकत की थी। उसके कुछ ही समय बाद तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने दावा किया था कि अब कांग्रेस नहीं, भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है। आज जब वही येद्दयुरप्पा जेल गए तो उनका ढाढस बंधाने तक के लिए कोई शीर्ष भाजपा नेता मौजूद नहीं था। हां, मुख्यमंत्री पद पर उनका स्थानापन्न करने वाले सदानंद गौड़ा ने अवश्य उनसे भेंट की। कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता था कि तीन साल के अंदर भाजपा के लोकप्रिय माने गए किसी नेता का ऐसा हस्त्र होगा। लेकिन ऐसा हुआ तो इसके लिए किसी दूसरे को दोषी मानने की बजाय भाजपा को स्वयं की रीति-नीति या पार्टी के पूर्व थिंक टैंक गोविंदाचार्य के शब्दों में कहें तो चाल, चेहरा और चरित्र तीनों पर गहरा आत्मंथन करना चाहिए। यह घटना भाजपा के लिए इसलिए भी एक बड़ी राजनीतिक त्रासदी है, क्योंकि यह ऐसे समय हुई जब लालकृष्ण आडवाणी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन चेतना रथयात्रा पर हैं।


येद्दयुरप्पा के मंत्रिमंडल के दो सदस्य एसएन कृष्णैया शेट्टी, कट्टा सुब्रह्मण्यम नायडू, एच हलप्पा पहले ही जेल जा चुके हैं। इनमें नायडू पर कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड में भूमि घोटाले और हलप्पा पर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का आरोप है। हालांकि हलप्पा को जमानत मिल चुकी है। अगर जनार्दन रेड्डी को शामिल कर लें तो जेल जाने वाले पूर्व मंत्रियों की संख्या चार हो चुकी है। हालांकि रेड्डी की गिरफ्तारी आंध्र प्रदेश की सीमा के अंदर अवैध खनन मामले में सीबीआइ द्वारा की गई और उसके लिए केंद्र को कठघरे में खड़ा भी किया गया, लेकिन येद्दयुरप्पा और कृष्णैया का मामला तो लोकायुक्त अदालत का है। वैसे बीएस येद्दयुरप्पा पहले ही जेल जा चुके होते, लेकिन 30 सितंबर को उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम रोक लगाने के कारण लोकायुक्त अदालत के हाथ बंध गए थे। जैसे ही अंतरिम रोक हटी, उनकी गिरफ्तारी का रास्ता साफ हो गया।


वस्तुत: लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी इन पर मुकदमा चलाने की अनुशंसा की गई थी और इसकी गंभीरता भांपकर ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने को मजबूर किया। एक व्यक्ति द्वारा दायर भूमि आवंटन में अनियमितता संबंधी यह मामला या लोकायुक्त की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों एवं उनसे जुड़े तथ्यों पर अलग-अलग राय की गुंजाइश है। इस मामले में लगाए गए आरोप के अनुसार उन्होंने अपने रिश्तेदारों को गलत तरीके से जमीन आवंटित करने तथा सरकारी जमीन को अनियमित तरीके से गैर-अधिसूचित किया था। जिन मामलों में उनकी जमानत याचिका नामंजूर हुई, उनमें बेंगलूर विकास प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित 2.05 एकड़, 1.07 एकड़ एवं 3.05 एकड़ जमीन अपने रिश्तेदारों को देने का आरोप है। इस भूमि आवंटन में सरकारी खजाने को 124 करोड़ रुपये की चपत लगाने का आकलन याचिकाकर्ता ने किया है। एक अन्य मामले में कृष्णैया शेट्टी एवं उनके पुत्रों व दामाद आदि के पक्ष में जमीन को गैर अधिसूचित करने का आरोप है। यहां भी सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने का आकलन है। भद्रा सिंचाई परियोजना में एक ठेकेदार को ठेका देने के बदले रिश्वत लेने का आरोप भी उन पर है। कोई भी यह नहीं कह सकता कि जो आरोप लगाए गए हैं, वे शत-प्रतिशत सही हैं और कानून व साक्ष्यों की कसौटी पर खरे उतरेंगे। नुकसान के आकलन पर कभी एक राय नहीं होती। संभव है कि मुकदमे का अंतिम परिणाम वैसा नहीं आए, जैसा अभी लग रहा है। किंतु क्या खुद भाजपा यह कहने की हालत में है कि येद्दयुरप्पा सरकार में भ्रष्टाचार व अनियमितताएं नहीं हुई? क्या मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों ने प्रभाव एवं अधिकारों का इस्तेमाल अपनों को लाभान्वित करने के लिए नहीं किया? हम यह मानने को तैयार हैं कि जो कुछ येद्दयुरप्पा सरकार के मातहत हुआ, वैसा होना अन्य सरकारों में भी आम है। मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त हैं और ऐसा दूसरे राज्यों में भी होता है। वैसे कर्नाटक की वर्तमान सदानंद गौड़ा सरकार ने लोकायुक्त की रिपोर्ट और उसकी भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करके अपना इरादा जता दिया है। गौड़ा ने कहा कि पार्टी येद्दयुरप्पा के साथ है और कानूनी तौर पर मामला लड़ा जाएगा।


भाजपा की दलील है कि उसने लोकायुक्त की रिपोर्ट में आरोप लगते ही येद्दयुरप्पा का त्यागपत्र ले लिया और कानूनी प्रक्रिया का वे सामना कर रहे हैं, लेकिन गौड़ा या पार्टी की दलीलें अपनी सातवीं रथयात्रा लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़े आडवाणी की सहायता नहीं कर सकतीं। आडवाणी शेर की तरह केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते और दहाड़ते आगे बढ़ रहे थे। उनकी दहाड़ अब भी कम नहीं हुई है, लेकिन उन शब्दों की आभा अवश्य मलीन हुई है। यह मानने में तो कोई आपत्ति ही नहीं है कि उनका आत्मबल अवश्य कम हुआ होगा। कांग्रेस ने तो इस घटना को आधार बनाकर आडवाणी को अपने गिरेबान में झांकने का सुझाव दे ही दिया है। हालांकि कांग्रेस का कथन उसी प्रकार है, जैसे कोई एक शातिर चोर दूसरे को कह रहा है कि अरे, मुझे कठघरे में खड़े करना बंद करो और अपने घर के अंदर देखो, वहां भी चोर का पता चल रहा है। यानी चूंकि तुम्हारे घर में भी चोर हैं, इसलिए हमारी ओर पत्थर न उछालो। कांग्रेस की जगह यदि दूसरी पार्टी होती तो उसकी प्रतिक्रिया भी ऐसी ही होती। यह हमारे समूचे राजनीतिक प्रतिष्ठान का चरित्र है। इसलिए मामले की कानूनी क्षमता का अपने तरीके से विश्लेषण कर शीर्ष राजनीतिक प्रतिष्ठान की भयावह स्थिति को गलत मोड़ देने की कोशिशों से बचने तथा इससे परे विचार करने की जरूरत है। वर्तमान शीर्ष राजनीति का डरावना यथार्थ यही है कि कांग्रेस की संस्कृति पर प्रहार कर सत्ता तक पहुंचने वाली अन्य पार्टियां भी धीरे-धीरे उसी रास्ते पर चलती हैं और उन कदमों को नियमों, कानूनों, परंपराओं का हवाला देकर सही ठहराती हैं, जिनका वे कभी विरोध करती थीं। आखिर येद्दयुरप्पा को एक नई राजनीतिक एवं शासन संस्कृति की स्थापना की उम्मीद में जनता ने विजय का सेहरा बांधा था। उसे भाजपा के आचरण में एक नई ताजगी की उम्मीद थी। इसलिए उसने उसे अकेले बहुमत के करीब पहुंचाया तथा पूर्व सरकार के उसके साथी दल जनता दल (सेक्युलर) व कांग्रेस दोनों की संसदीय शक्ति कमजोर हुई। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा बचेंगे या सजा पाएंगे, इसके बारे में एकदम स्पष्ट भविष्यवाणी उचित नहीं है।


येद्दयुरप्पा एवं उनके साथी नेता तो पूरी राजनीतिक एवं प्रशासनिक सड़ांध के एक अंग भर हैं। क्या कोई यह विश्वासपूर्वक कह सकता है कि उनकी जगह दूसरा मुख्यमंत्री होता या दूसरी पार्टी की सरकार होती तो जमीन आवंटन के लिए ऐसे कदम नहीं उठाती? साफ है कि देश के लिए येद्दयुरप्पा मामले का कानूनी पहलू महत्वहीन है। जो पार्टी अन्य से विशिष्ट होने का दावा करती हो, उसके मुख्यमंत्री, मंत्री एवं नेताओं का ऐसा हस्त्र सामान्य स्थिति का परिचायक नहीं हो सकता। वास्तव में इस प्रकरण से एक बार फिर संपूर्ण राजनीतिक संस्कृति में आमूल बदलाव की जरूरत रेखांकित हुई है। राजनीतिक संस्कृति तभी बदलेगी, जब वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को संपूर्ण रूप से बदलकर आदर्श राजनीति की स्थापना हो। बगैर इसके पतित राजनीतिक एवं शासकीय आचरण का अंत संभव नहीं। आज येद्दयुरप्पा हैं, कल कोई और होगा।


लेखक अवधेश कुमार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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