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संसद के लिए संदेश सुनने का समय

Posted On: 23 Aug, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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सरकार ठीक कहती है, दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर मुंबई के आजाद मैदान तक हवा में लहराती हजारों मुट्ठियां संसद पर ही सवाल उठा रही हैं। जनता के सवाल लोकतंत्र में महाप्रतापी संसद की गरिमा और सर्वोच्चता पर हैं नहीं, लोग तो संसद की स्थिति, उपयोगिता, योगदान, नेतृत्व, दूरदर्शिता, सक्रियता और मूल्यांकन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। बदहवास सरकार, जड़ों से उखड़ी कांग्रेस और मौकापरस्त विपक्ष को यह कौन बताए कि जब-जब संसदीय गरिमा का तर्क देकर संविधान दिखाते हुए पारदर्शिता रोकने की कोशिश होती है तो लोग और भड़क जाते हैं। देश उस संसद से ऊब रहा है जो चलती ही नहीं है। वह संसद, जिसका आचरण शर्म से भर देता है। वह संसद, जहां नोट बांटने वाले सम्मान के साथ बरी हो जाते हैं। वह संसद, जो उन्हें लंबे इंतजार के बावजूद भ्रष्टाचार का एक ताकतवर पहरेदार यानी लोकपाल नहीं दे सकी। वह संसद, जो महिलाओं के आरक्षण पर सिर्फ सियासत करती है। वह संसद, जहां से दूरदर्शी सुधार और कानून निकलते ही नहीं। वह संसद, जो सरकार के अधिकांश खर्च पर अपना नियंत्रण खो चुकी है, जनता इस संसद से खफा हैं, उस संवैधानिक संसद से नहीं। गरीबों को रैन बसेरा दिलाने से लेकर पुलिस को सुधारने तक और गंगा से लेकर भ्रष्टाचारियों की सफाई तक जब बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट ही कराता है तो अपनी विधायिका यानी संसद के योगदान व भूमिका पर सवाल उठाना नागरिकों का हक बनता है। जनलोकपाल का आंदोलन दरअसल संसद पर ही सवाल उठा रहा है, जिनके दायरे में सत्ता पक्ष व विपक्ष, दोनों आते हैं। यह एक नए किस्म का मुखर लोकतांत्रिक मोहभंग है।


राजनीति अभी भी भाड़े की भीड़ वाली रैली छाप मानसिकता में है। उन्हें अन्ना के आंदोलन में जुटी भीड़ तमाशाई लगती है, जबकि अन्ना के पीछे खड़ी भीड़ आधुनिक संचार की जबान में एक ‘वाइज क्राउड’ है यानी एक समझदार समूह। यह छोटा समूह जो संवाद, संदेश और असर में बहुत बड़ा है। तकनीक जिसकी उंगलियों पर है, जिसे अपनी बात कहना और समझाना आता है। जिसके पास भाषा, तथ्य, तजुर्बे और तर्क हैं। भ्रष्टाचार पूरे देश की पोर-पोर में भिदा है इसलिए अन्ना की आवाज से वह गरीब ग्रामीण भी जुड़ जाता है, जिसने बेटे की लाश के लिए पोस्टमार्टम हाउस को रिश्वत दी है और वह बैंकर भी सड़क पर आ जाता है जो कलमाड़ी व राजा की कालिख से भारत की ग्रोथ स्टोरी को दागदार होता देखकर गुस्साया है। जनलोकपाल की रोशनी में जनता यह तलाशने की कोशिश कर रही है कि आखिर पिछले तीन दशक में उन्हें संसद से क्या मिला है?


5 लोकसभाएं बना चुके मुल्क के पास अब इतिहास, तथ्य व अनुभवों की कमी नहीं है। अगर ग्रेटर नोएडा के किसान हिंसा पर न उतरते तो संसद को यह सुध नहीं आती कि उसे सौ साल पुराना जमीन अधिग्रहण कानून बदलना है। अगर सुप्रीम कोर्ट आदेश (विनीत नारायण केस) न देता तो सीबीआइ प्रधानमंत्री कार्यालय के दरवाजे बंधी रहती। केंद्रीय सतर्कता आयोग के मातहत शायद न आई होती। दलबदल ने जब लोकतंत्र को चौराहे पर खड़ा कर दिया तब संसद को कानून बनाने की सुध आई। आर्थिक सुधारों के लिए संकट क्यों जरूरी था? नक्सलवाद जब जानलेवा हो गया तब संसद को महसूस हुआ आदिवासियों के भी तो कुछ कानूनी हक हैं। वित्तीय कानून बदलने के लिए सरकार ने शेयर बाजारों में घोटालों की प्रतीक्षा की। संसद से मोहभंग के जायज कारण हैं। भारतीय संसद की कानून रचना क्षमता भयानक रूप से संदिग्ध है। एक युवा देश आधुनिक कानूनों के तहत जीना चाहता है, मगर भारतीय विधायिका के पास हंगामे का वक्त है, कानून बनाने का नहीं। कानून बनाने में देरी अच्छे कानून की गारंटी नहीं है, बल्कि यह साबित करती है कि विधायिका गंभीर नहीं है। हमारी संसद न तो वक्त पर कानून दे पाती और न कानूनों की गुणवत्ता ऐसी होती है जिससे विवाद रहित व्यवस्था खड़ी हो सके।


जनलोकपाल के लिए सड़क पर खड़े तमाम लोगों के पास कार्यपालिका के भ्रष्टाचार के व्यक्तिगत अनुभव हैं। संविधान ने विधायिका यानी संसद को पूरे प्रशासन तंत्र (कार्यपालिका) की निगरानी का काम भी दिया था। संसद यह भूमिका गंवा चुकी है या राजनीति को सौंप चुकी है। इसलिए अब नए मसीहा उभरते हैं और अदालतें इंसाफ ही नहीं करतीं, बल्कि लोगों को रोटी, शिक्षा तक दिलाती हैं। लोग महसूस करते हैं कि संसद प्रभावहीन है। इसलिए न्यायपालिका को आधारभूत ढांचे की तरफ लौटना पड़ा, जिसके तहत संविधान के बुनियादी मूल्यों को बचाना भी अदालत की जिम्मेदारी है (गोलकनाथ केस-1967)। नेता जब अदालतों पर गुस्साते हैं या संवैधानिक संस्थाओं को उनकी सीमाएं बताते हैं तो लोग और चिढ़ जाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का अंतरराष्ट्रीय इतिहास जनता और स्वयंसेवी संस्थाओं ने बनाया है। सरकारें दबाव के बाद ही बदलती हैं। इन जन आंदोलनों की बदौलत ही आज भ्रष्टाचार के तमाम अंतरराष्ट्रीय पहरेदार हमारे पास हैं। यह पहला मौका नहीं है जब जनता विधायिका को राह दिखा रही है। 2002 में निकारागुआ में पांच लाख लोगों ने एक जन याचिका के जरिए संसद को इस बात पर बाध्य कर दिया था कि भ्रष्ट राष्ट्रपति अर्नाल्डो अलेमान पर मुकदमा चलाया जाए। संसद की सर्वोच्चता पर किसे शक होगा, मगर इसके क्षरण पर अफसोस सबको है। जनता, अदूरदर्शी, दागी और निष्प्रभावी संसद से गुस्सा हैं। वह संसद को उसकी संवैधानिक साख लौटाना चाहती है। कानून तो संसद ही बनाएगी, लेकिन इससे अच्छा लोकतंत्र क्या होगा कि जनता मांगे और संसद कानून बनाए। जनलोकपाल की कोशिश को क्या संसद की गरिमा बढ़ाने वाले अनोखे लोकतांत्रिक प्रयास के तौर पर नहीं देखा जा सकता।


लेखक अंशुमान तिवारी दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख हैं


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