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एक और निराशाजनक नीति

Posted On: 15 Nov, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Bharat Jhunjunbalaकेंद्र सरकार द्वारा घोषित नई उत्पादन नीति की खामियों को रेखांकित कर रहे हैं डॉ. भरत झुनझुनवाला


केंद्र सरकार ने नई उत्पादन नीति घोषित की है। कहा गया है कि एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था में उत्पादन का हिस्सा 34 प्रतिशत है, जबकि भारत में मात्र 16 प्रतिशत। इसे अगले 10 वषरें में 25 प्रतिशत पर ले जाना है। इस सकल्प में समस्या है। अर्थव्यवस्था में उत्पादन के हिस्से में वृद्धि का अर्थ है कि दूसरे क्षेत्र के हिस्सों में सकुचन होगा। अर्थव्यवस्था में तीन मुख्य हिस्से माने जाते है-कृषि, उद्योग [उत्पादन] और सेवा। कृषि का हिस्सा घटाने का अर्थ होगा कि आधे नागरिकों की आय में कटौती होगी। सेवा क्षेत्र में कटौती का अर्थ होगा कि हम सूर्योदय क्षेत्र को त्याग सूर्यास्त क्षेत्र की ओर बढ़ना चाहते हैं। 1951 में भारत में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 33 प्रतिशत था, जो आज 55 प्रतिशत हो गया है। विकसित देशों में यह 75-80 प्रतिशत है। सर्वत्र देखा जाता है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ता है। कारण कि आय में वृद्धि के साथ मनुष्य द्वारा सेवाओं की खपत में वृद्धि होती है। वह दो रोटी और एक टेलीफोन की ही खपत कर सकता है, परंतु सगीत, पर्यटन, ब्यूटी पार्लर की खपत बहुत बढ़ सकती है। आगामी समय में सेवा क्षेत्र ही विश्व अर्थव्यवस्था का इंजन होगा। अत: सेवा को सकुचित करके उत्पादन को बढ़ाना घातक होगा।


हर देश को अपने प्राकृतिक ससाधन एव क्षमताओं के अनुकूल धंधा करना चाहिए। दूसरे की नकल के सुपरिणाम नहीं होते हैं। सचिन तेंदुलकर बीए-एमए पढ़ते तो आगे न बढ़ पाते। उन्होंने अपनी क्षमता को परखते हुए क्रिकेट खेला और सफलता पाई। भारतवासियों की क्षमता अंग्रेजी भाषा और तीक्ष्ण बुद्धि की है। ये क्षमताएं सेवा क्षेत्र के लिए अनुकूल पड़ती हैं। दूसरे एशियाई देशों ने उत्पादन क्षेत्र का सहारा इसलिए लिया है, क्योंकि उनके पास सेवा क्षेत्र के लिए आवश्यक क्षमताएं नहीं हैं। हाथ में पड़े हीरे को छोड़कर काच के टुकड़े को नहीं पकड़ना चाहिए। इसी प्रकार अपनी क्षमता के अनुकूल सेवा क्षेत्र को नहीं छोड़ उत्पादन को नहीं पकड़ना चाहिए।


एशियाई देशों ने उत्पादन का विस्तार निर्यात के आधार पर किया है। उत्पादित माल को मुख्यत: यूरोप एव अमेरिका के विकसित देशों को भेजा जा रहा है। यूरोप एव अमेरिका की अर्थव्यवस्था के फिसलने के साथ-साथ इन देशों पर सकट गहराएगा। हमें अनायास ही उस सकट को आमत्रित नहीं करना चाहिए। उत्पादन क्षेत्र में पर्यावरण की भारी क्षति होती है। खनन, जंगल की कटान, कार्बन उत्सर्जन, जल का प्रदूषण आदि समस्याएं उत्पादन क्षेत्र में गंभीर रहती हैं। इन समस्याओं को झेलने की हमारी क्षमता सीमित है, क्योंकि लोगों का घनत्व ज्यादा है। भारत में प्रति वर्ग किलोमीटर 333 व्यक्ति रहते हैं, जबकि चीन में 135। भारत में जंगल, खुली जमीन, तालाब आदि का क्षेत्र कम है। तदानुसार हमारी प्रदूषण वहन करने की क्षमता भी कम है। अत: हमें स्वच्छ सेवा क्षेत्र को छोड़कर प्रदूषित उत्पादन क्षेत्र को नहीं पकड़ना चाहिए।


सरकार की दलील है कि उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि आने से आगामी वषरें में 10 करोड़ रोजगार उत्पन्न होंगे, परंतु अब तक का रिकार्ड बिल्कुल विपरीत है। वित्त मत्रालय द्वारा प्रकाशित आकड़ों के अनुसार 1991 से 2008 के बीच सगठित निजी क्षेत्र में कृषि में एक लाख, उत्पादन में पांच लाख और सेवा में 16 लाख रोजगार उत्पन्न हुए हैं। अधिकतर रोजगार सेवा क्षेत्र में उत्पन्न हुए हैं। दरअसल उत्पादन क्षेत्र में आटोमैटिक मशीनों का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। उत्पादन की मात्रा बढ़ रही है, परंतु रोजगार नहीं बन रहे हैं। उत्पादन क्षेत्र के इस स्वभाव को देखते हुए 10 करोड़ रोजगार उत्पन्न करने की बात मात्र ढकोसला साबित होती है।


ध्यान देने वाली बात यह है कि उत्पादन क्षेत्र में जो थोड़ी बहुत रोजगार सृजन की संभावना थी उसे भी क्रियान्वित होने में सदेह दिखाई देता है। नई उत्पादन पालिसी में कहा गया है कि श्रम सघन उद्योगों को पर्याप्त समर्थन दिया जाएगा। इस समर्थन का क्या स्वरूप होगा, इस पर पालिसी खामोश है। चाहिए था कि श्रम-सघन क्षेत्रों पर एक्साइज ड्यूटी तथा सेल टैक्स की दरें न्यून रखी जातीं। तब श्रम-सघन उद्योग आटोमैटिक मशीनों की प्रतिस्पर्धा में खड़े रह सकते थे, परंतु पालिसी में श्रम-सघन उद्योगों को प्रोत्साहन देने के नाम पर केवल लीपापोती की गई है। उत्पादन पालिसी में कहा गया है कि दूसरे देशों द्वारा पर्यावरण सरक्षण के नाम पर लगाए गए टैक्स का विरोध किया जाएगा। मूल रूप से यह मंतव्य स्वागत योग्य है। विकसित देश चाहते हैं कि पर्यावरण के नाम पर हमारे देश के सस्ते उत्पादों पर भारी टैक्स लगाकर इन्हें महंगा कर दें, परंतु इस समस्या का दूसरा पक्ष और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमें निर्यातों के लालच में अपने पर्यावरण की बलि नहीं चढ़ानी चाहिए। भारत का प्रयास होना चाहिए कि पर्यावरण मानक का विरोध करने के साथ-साथ अपने पर्यावरण की होने वाली क्षति को रोकें। यहा समस्या दूसरे विकासशील देशों से उत्पन्न होती है। यदि चीन अपने पर्यावरण को नष्ट करके सस्ता माल बना रहा है तो भारत प्रतिस्पर्धा में पीछे हो जाता है। इसका उपाय है कि भारत चीन से आयातित सस्ते माल पर पर्यावरण टैक्स लगाए और निर्यातों पर पर्यावरण सब्सिडी दे। तब देश की सरहद में माल का दाम ऊंचा रहेगा और हम अपने पर्यावरण का सरक्षण कर सकेंगे। साथ-साथ निर्यातों पर सब्सिडी देकर हम विश्व बाजार में चीन के सस्ते माल के सामने टिक सकेंगे, परंतु उत्पादन पालिसी इस गंभीर मामले पर खामोश है।


ऐसा प्रतीत होता है कि यह पालिसी पूर्णतया असफल होगी। मेरा अनुमान है कि अधिकारियों को ज्ञात है कि यह पालिसी मात्र एक कागज का टुकड़ा है। पालिसी का असल मुद्दा भूमाफियाओं को पोसने का है। कहा गया है कि राष्ट्रीय निवेश एव उत्पादन क्षेत्र बनाए जाएंगे। इनका न्यूनतम क्षेत्रफल 5000 हेक्टेयर होगा। इन क्षेत्रों में श्रम एव पर्यावरण कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी क्षेत्र के कर्मचारियों के हाथ में होगी, न कि केंद्र अथवा राज्य सरकार के विभागों की। समस्या यह है कि इन क्षेत्रों के बाहर लगे वर्तमान उद्योगों के प्रति भेदभाव किया जाएगा। जैसे कक्षा में बच्चे कमजोर हों तो तीक्ष्ण बुद्धि के बालक को दाखिला देने से शिक्षा में सुधार नहीं होता है, ठीक इसी प्रकार संपूर्ण देश की फैक्ट्रियां अप्रासगिक कानूनों एव भ्रष्टाचार से पीड़ित हों तो नए क्षेत्र बनाने से देश का उत्पादन क्षेत्र नहीं सुधरेगा। जरूरत थी कि श्रम-सघन एव पर्यावरण के प्रति नरम उद्योगों को टैक्स में छूट दी जाती। ऐसा करने से रोजगार सृजन एव पर्यावरण सरक्षण, दोनों स्वय हो जाते। दुर्भाग्यवश इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।


लेखक डॉ. भरत झुनझुनवाला आर्थिक मामलों के जानकार हैं


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