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बेहद जरूरी है प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव

Posted On: 10 Oct, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Dhandeकभी फीस तो कभी स्वायत्तता तो अब अपनी गुणवत्ता को लेकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) चर्चा में हैं। आइआइटी प्रवेश परीक्षा की प्रक्रिया और कोचिंग परंपरा के चलते छात्रों की गुणवत्ता में गिरावट का मुद्दा उठाकर इंफोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति ने शिक्षा जगत में भूचाल ला दिया है। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश द्वारा शिक्षण गुणवत्ता का सवाल उठाने के बाद नारायणमूर्ति ने ऐसे समय में यह सवाल उठाया है जब देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आइआइटी, आइआइएम आदि शीर्ष संस्थानों के 26 कुलपति या निदेशक इस समय अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थान येल विश्वविद्यालय में नेतृत्व के गुण और मौजूदा चुनौतियों से निपटने के गुर सीख रहे हैं। व‌र्ल्ड लीडरशिप अभियान के तहत गए इस दल के चेयरमैन और आइआइटी कानपुर के निदेशक संजय गोविंद धांडे से दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता राजकिशोर ने फोन पर बात की। प्रधानमंत्री की प्रौद्योगिकी सलाहकार टीम के सदस्य धांडे ने नारायणमूर्ति के कथन पर सीधी टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन आइआइटी समेत दूसरे उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश परीक्षा के मानक बदलने और कोचिंग के जंजाल से छात्रों को मुक्त कराने की पुरजोर पैरवी की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश-


नारायणमूर्ति कह रहे हैं कि आइआइटी की गुणवत्ता में फर्क आया है, कितना सहमत हैं आप?

चाहे आइआइटी हो या आइआइएम या फिर दूसरे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान, सबमें अच्छा अकादमिक नेतृत्व और सक्षम छात्र तैयार करना प्राथमिकता होनी चाहिए। पिछले पांच साल में उच्च शिक्षा में विश्वविद्यालयों, आइआइटी, आइआइएम आदि की संख्या बढ़ गई है। वैश्विक स्तर की चुनौतियों के मद्देनजर अकादमिक नेतृत्व तैयार करना और गुणवत्ता वाले छात्रों को निकालने के प्रयासों में सरकार से लेकर समाज के सभी वर्गो और उद्योग जगत को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।


नाराणमूर्ति ने जो कहा उसे आप कैसे ..?

मुझे इसमें नहीं पड़ना। हमारे लिए अकादमिक नेतृत्व तैयार करना ज्यादा बड़ा सवाल है।


लेकिन नारायणमूर्ति का मानना है कि कोचिंग की वजह से प्रतिभाशाली छात्र आइआइटी में नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिससे गुणवत्ता पर फर्क पड़ रहा है।

यह हमारी प्रवेश प्रक्रिया की कमी है कि कोचिंग क्लासेज का भूत खड़ा हो गया। प्रवेश परीक्षा में ऐसे सवाल पूछे जाते है जो स्कूल में पढ़ाए जाते हैं। चूंकि आइआइटी में सीटें कम हैं और अभ्यर्थी बहुत ज्यादा, इसलिए जो विषय पढ़ते चले आ रहे हैं उनको लेकर ही घमासान हो जाता है और ऐसे में कोचिंग वालों की बन आती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान है कि बच्चों का सर्वागीण विकास नहीं हो पाता। इसलिए सर्वागीण विकास बड़ा मुद्दा है, उसे तवज्जो देना आवश्यक है।


आप सालों से आइआइटी से जुड़े हैं। क्या इन वर्षो में आइआइटी आने वाले छात्रों के स्तर में फर्क आया है? खासतौर से कोचिंग से आए छात्रों की वजह से आइआइटी की गुणवत्ता पर फर्क पड़ रहा है?

नहीं मैं यह तो नहीं कहता। वे छात्र भी प्रतिभावान हैं। मगर यह देखा गया है कि जिन छात्रों का स्कूल में प्रदर्शन अच्छा रहा है वे आइआइटी में भी ज्यादा अच्छा करते हैं। यह जरूरी नहीं है कि जो लड़के आइआइटी प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंक लेकर आए हों, उनका प्रदर्शन अच्छा ही हो।


तो क्या आइआइटी की प्रवेश प्रक्रिया बदलना इस समय बेहद जरूरी है?

बिल्कुल यह समय की जरूरत है। वरना पहले एक, फिर दूसरे और फिर तीसरे विषय में ही लड़के उलझे रहेंगे और अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे। अभी येल विश्वविद्यालय में व‌र्ल्ड लीडरशिप के तहत हुए चिंतन में भी न सिर्फ आइआइटी, बल्कि दूसरे ऐसे संस्थानों में भी प्रवेश प्रक्रिया के बारे में चर्चा हुई, ताकि सही लोग आ सकें। वैसे इस बारे में गंभीरता से प्रयास भी शुरू हो चुके हैं।


कैसी प्रवेश प्रक्रिया होनी चाहिए?

देखिए, येल समेत दुनिया के सभी प्रतिष्ठित संस्थानों में एक टेस्ट पर चयन नहीं होता। प्रवेश प्रक्रिया में सभी विश्वविद्यालयों या संस्थानों में स्कूल में छात्र के प्रदर्शन को महत्व दिया जाता है। उसकी प्रतिभा और क्षमता का समग्र आकलन होता है। इसमें पढ़ाई के अलावा दूसरे क्षेत्रों की गतिविधियों को भी महत्व दिया जाता है। एप्टीट्यूड लेवल टेस्ट की तरफ हमें बढ़ना होगा। हालांकि हमारे यहां छात्र ज्यादा हैं, लिहाजा यह मुश्किल है, लेकिन इसे करना ही होगा।


इसमें किस तरह की मुश्किलें हैं?

स्कूलों का स्तर पहले सुधारना होगा। सवाल यह है कि बड़े संस्थानों और आइआइटी वालों ने इस दिशा में क्या किया? कम से कम वे संवाद तो करें और बताएं कि कैसे बच्चों को रटने या रटाने के बजाय उनका समग्र विकास किया जाए।


आप क्या सुझाव देंगे?

केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों में बदलाव आना चाहिए। सरकार की नीतियां चलाने के लिए अकादमिक स्वतंत्रता होनी चाहिए।


बदलावों-स्वायत्तता से क्या आशय है?

देखिए, एक बात तो साफ नजर आ रही है कि विश्वविद्यालय या संस्थान चलाने के लिए सक्षम प्रोफेसर चाहिए। एक अच्छा खासा कार्यक्रम और मजबूत ढांचा होना जरूरी है। अच्छे प्रोफेसर प्रशासन के काम में लग रहे हैं, जिससे गुणवत्ता पर आंच आ रही है। यह भी जरूरी है कि संस्थान और विश्वविद्यालय अपना फंड बढ़ाएं और आत्मनिर्भर हों।


क्या आप आइआइटी या दूसरे संस्थानों की फीस बढ़ाने का सुझाव दे रहे हैं?

कतई नहीं..जनता बल्कि उद्योग जगत के साथ कुछ कार्यक्रम चलाकर ये जरूरतें पूरी करनी चाहिए। फीस बढ़ाकर यह काम नहीं हो सकता। फिर सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन कंपनियों की है जो प्लेसमेंट के लिए बच्चों को विभिन्न संस्थानों से लेकर जाते हैं।


आइआइटी में चयन के बाद कितने छात्र इंजीनियरिंग पढ़ना चाहते हैं और कितने आगे फाइनेंस-बैंकिंग के लिए आइआइटी को सीढ़ी की तरह प्रयोग करना चाहते हैं?

यह ब्रेन ड्रेन का पुराना सवाल है। हमारा काम सिर्फ इंजीनियर तैयार करना नहीं, बल्कि 21 साल का अच्छा जवान बनाना है, जो समाज के विकास में अपना योगदान दे सके। हां, यह जरूर है कि विश्वसरैया, साराभाई और भाभा जैसा इंजीनियर अगर संस्थान दे सके तो हमें ज्यादा नाज होगा।


भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा पर आपका क्या कहना है?

यह सही है कि अपनी भाषा में व्यक्ति तेजी से सीखता है, मगर अंग्रेजी में हाथ तंग न हो तो उसके लिए भी अच्छा है, क्योंकि सिर्फ अंग्रेजी न आने की वजह से कोई पढ़ न सके, यह गलत है तो यह भी ठीक नहीं कि ज्ञान होने के बावजूद अंग्रेजी कमजोर होने से उसे उसका फायदा न मिल सके।


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