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अंतरिक्ष में एक और छलांग

Posted On: 30 Apr, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Sukhdev Prasadअभी अग्नि-5 की सफलता का जश्न ठंडा भी नहीं हुआ था कि इसरो ने भारत के माथे पर एक और बिंदी लगा दी। 26 अप्रैल, 2012 को भारत पहली बार अपना राडार इमेजिंग सेटेलाइट (रीसेट-1) लांच करके चार देशों-जापान, फ्रांस, कनाडा और इजराइल के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया। इसरो का एक और कीर्तिमान! ध्रुवीय रॉकेट का पहला प्रक्षेपण (पीएसएलवी-डी1) हमने 20 सितंबर, 1993 को किया था, जिसमें कतिपय तकनीकी त्रुटियों से रॉकेट दो टुकड़ों में बंटकर बंगाल की खाड़ी में जा समाया और इसी के साथ उस पर सवार उपग्रह आइआरएस-1ई भी नष्ट हो गया, लेकिन इसके बाद हमारे ध्रुवीय रॉकेट ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तबसे लेकर आज तक (पीएसएलवी-सी19) ध्रुवीय रॉकेट की कोई भी उड़ान विफल नहीं हुई है। ध्रुवीय रॉकेट की लगातार 20वीं सफल उड़ान है। हमारे ध्रुवीय रॉकेट की चौथी उड़ान (पीएसएलवी-सी1), जिसमें हमने भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह आइआरएस-1डी का प्रक्षेपण किया था, की सफलता के बाद हमें विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण के आर्डर मिलने लगे। इसका प्रमुख कारण यह था कि इसरो ने उपग्रहों के प्रक्षेपण की अंतरराष्ट्रीय कीमत से बीस-तीस प्रतिशत कम कीमत लेकर इनका प्रक्षेपण किया ताकि हमें और ऑर्डर मिल सकें, लेकिन जब हमारी प्रौद्योगिकी परिपक्व हो गई तो पहली बार 23 अप्रैल, 2007 को हमने इटली के एजाइल उपग्रह को लांच करके अंतरराष्ट्रीय स्तर की लांचिंग कास्ट वसूल की और शीघ्र ही 21 जनवरी, 2008 को इजरायल के जासूसी उपग्रह पोलरिस (अब इसका नाम टेक्सार है) को लांच करके अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार कीमत वसूली।


अग्नि-पांच पर क्यों करें नाज


इसरो के इतिहास में पहली बार दस महीने के अंतराल में दूसरी बार किसी उपग्रह को लांच किया गया। आजकल उपग्रहों के प्रक्षेपण की अंतरराष्ट्रीय कीमत 15,000 से 20,000 डॉलर प्रति किग्रा है। अंतरिक्ष विभाग की विपणन एजेंसी अंतरिक्ष कॉर्पोरेशन लि. ने इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज से यह कीमत वसूली और इसरो की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति भी हो गई। इस प्रकार ध्रुवीय रॉकेट की सफलताओं से भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के अंतराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश कर गया और आज भी इस व्यवसाय में 30 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है। इस बीच अचानक हमें इजरायल से ही मदद लेनी पड़ी। ध्रुवीय रॉकेट पीएसएलवी-सी12 ने 20 अप्रैल, 2009 को इजरायल द्वारा निर्मित एक जासूसी उपग्रह लांच किया जिसे हमने रीसेट-2 नाम दिया। इसकी विशिष्टता यह है कि यह एक्स-बैंड में काम करने वाले सार (सिंथेटिक अपरचर राडार) से लैस है, जिसका अर्थ यह है कि यह किसी भी तरह के मौसम में यहां तक कि घने बादलों के बीच भी धरती की साफ-साफ तस्वीरें लेने में सक्षम है। रात के गहन अंधकार और बादलों को चीरते हुए सीमा के आस-पास हो रही गतिविधियों पर अपनी पैनी नजर रख सकता है। इसकी मदद से एक मीटर दायरे की किसी भी चीज को पहचाना जा सकता है। इसके पूर्व हमने जिन उपग्रहों को ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया था उनमें यह विशेषता नहीं थी, क्योंकि वे प्रकाशिक सुदूर संवेदी उपग्रह थे।


विशिष्ट क्लब में भारत


स्वाभाविक है कि भारत के सुरक्षा बलों की ताकत में इससे इजाफा हुआ है। मुंबई हमलों के दौरान जब आतंकवादियों ने सुरक्षा एजेंसियों को धता बताते हुए ऐसी दहशतगर्दी मचाई जिसकी कोई मिसाल नहीं तब हमने बड़ी शिद्दत से एक ऐसे उपग्रह की जरूरत महसूस की थी। तब हमारे सुरक्षा इंतजामों पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे। ऐसे में इजरायल के एकदम से तैयार उपग्रह (टेक्सार का जुड़वां) को देश की सुरक्षा के मद्देनजर आनन-फानन में हमने 11 करोड़ डॉलर में खरीद लिया और उसे रीसेट-2 नाम से लांच कर दिया। तब इसरो के कार्यक्रमों में रीसेट-2 की कोई सूचना नहीं थी, अलबत्ता रीसेट-1 का जिक्र अवश्य था, जिसे बनाने के लिए हम प्रयासरत थे। दस वषरें के कठोर श्रम के बाद अब भारत का पहला राडार इमेजिंग उपग्रह बनकर तैयार हुआ, जिसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से 26 अप्रैल, 2012 की भोर में ध्रुवीय रॉकेट से कुशलतापूर्वक लांच कर दिया गया। 1858 किग्रा. वजनी रीसेट-1 देश का अब तक का सबसे भारी सुदूर संवेदी उपग्रह है। 71 घंटे की उल्टी गिनती के उपरांत 5:47 बजे रॉकेट ने उड़ान भरी और लिफ्ट ऑफ के प्राय: 19 मिनट बाद उसने रीसेट-1 को सही-सलामत 480 किमी. की ऊंचाई पर ध्रुवीय कक्षा में डाल दिया। यथा समय उपग्रह की रेजोनेंस प्रणाली इसे 536 किमी की ऊंचाई वाली आखिरी कक्षा में पहुंचा देगी।


राडार इमेजिंग अपने आप में जटिल प्रौद्योगिकी है। यह चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन हमें खुशी है कि अब भारत ने भी ऐसी क्षमता प्राप्त कर ली है। रीसेट उपग्रहों की विशिष्टता यह है कि ऐसे उपग्रह चौबीसों घंटे धरती के चित्र लेने में सक्षम हैं, चाहे दिन हो या रात, वर्षा, बादल, कुहरा या चक्रवात-सभी मौसमों में सर्वथा उपयुक्त। फसलों के पूर्वानुमान, चक्रवातों और बाढ़ के दरम्यान आपदा प्रबंधन में इससे मदद ली जाएगी और देश की निगरानी तो करेगा ही, जिसके लिए इसे खास तौर पर बनाया गया है। रीसेट-1 की विभेदन क्षमता एक मीटर दायरे की तस्वीर लेने की है। कुछ मामलों में हमारा यह उपग्रह कनाडा के दूसरे पीढ़ी के राडारसेट-2 से भी उत्कृष्ट है।


लेखक शुकदेव प्रसाद अंतरिक्ष, इलेक्ट्रानिक्स एवं परमाणु ऊर्जा विभाग के सलाहकार रहे हैं


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