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चीन की कुटिल चाल

Posted On: 1 Sep, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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भारत को हिंद महासागर में संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था के चीन के प्रस्ताव पर बड़ी चतुराई से गौर करना होगा। चीन से इस बात की ठोस गारंटी की जरूरत होगी कि वह उन देशों को मदद देना बंद करे जो इस्लामी कट्टरवादी आतंकवाद का इस्तेमाल सरकारी नीति के तौर पर कर रहे हैं। चीन को यह व्यवस्था भी करनी होगी कि पहले वह दक्षिण चीन सागर में समुद्र संधि कानूनों की मूल भावना को लागू करे, जिसमें प्रशांत महासागर से लेकर हिंद महासागर तक समुद्री डाकुओं के खतरे को समाप्त करने के लिए बहु-पक्षीय समझौते में भारत भी एक भागीदार होगा। अगर भारत यह नहीं करता है, तो वह स्टि्रंग ऑफ प‌र्ल्स के चक्रव्यूह में फंस जाएगा। इस बात पर जोर देने से कि इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद को चीन मदद देना और बढ़ावा देना बंद करे, सऊदी अरब के वहाबी फलसफे को बढ़ावा देकर पाकिस्तान में और हिंद महासागर के तटवर्ती देशों में अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाने की खतरनाक सोच से पर्दा उठाया जा सकेगा।


यह त्रिपक्षीय गठजोड़ तो उस समय ही स्पष्ट हो गया था, जब तानाशाह जिया उल हक के सौजन्य से चीन ने सऊदी अरब को तीन डोंग फेंग मिसाइलें दी थीं। जिया उल हक ने इस्लाम के सऊदी स्वरूप का पाकिस्तान में आयात किया था और काफी पहले 1987 में पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव की काट के लिए मिसाइल समझौता कराने में मदद की थी। हाल ही में चीन ने परमाणु-सक्षम डीएफ मिसाइलें सऊदी अरब को बेची हैं, जिससे साफ संकेत मिलते हैं कि हिंद महासागर में अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए चीन इस्लामी कट्टरता के बढ़ते प्रभाव का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले, समुद्री डाकुओं पर काबू पाने के नाम पर सोमालियाई समुद्र में गश्त लगाने का एकाधिकार प्राप्त करने के प्रयासों से उसके इरादों के बारे में संदेह पैदा हुआ था, क्योंकि सभी जानते हैं कि अरब सागर में समुद्री डाकुओं पर सोमालियाई इस्लामी कट्टरपंथियों का नियंत्रण है। हथियारों के प्रसार और इस्लामी जिहादी सोच के विस्तार, दोनों लिहाज से चीन एक केंद्रीय हस्ती के रूप में उभर रहा है। कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से सटे चीन के मुस्लिम-बहुल झिंगजियांग प्रांत में हाल ही में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा कराए गए दंगों को देखते हुए खुद चीन ही जिहादी आतंकवाद का शिकार है। लगता तो ऐसा ही है।


लेकिन चीन की सर्वसत्तात्मक सरकार को पूरा भरोसा है कि वह इस आंदोलन को कुछ ही दिनों में कुचल देगी। इसलिए उसे शैतान के साथ जश्न मनाने के परिणामों की कोई चिंता नहीं है। वह इन ताकतों का ध्यान अपनी ओर से हटा कर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के जरिए भारत के खिलाफ मोड़ सकता है। पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर जिहादी आतंकवाद को मजबूत बनाने में चीन की भूमिका इस्लामी सोच के साहूकार-सऊदी अरब और पाकिस्तान की आइएसआइ का विश्वास हासिल करने की एक सोची-समझी चाल है। क्षेत्रीय आधार पर आतंकवाद से लड़ने के लिए शंघाई कोऑपरेशन आर्गनाइजेशन में जो उपदेश दिए गए थे, वे पाकिस्तान से कार्रवाई चला रहे तालिबान के खतरे को देखते हुए जमीनी हकीकत से परे हैं। एशियाई परिधि में उभरती भूराजनीति की इस पृष्ठभूमि में भारत को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि अगले दशक में, खास तौर पर इस प्रचलित सोच को देखते हुए कि अमेरिकी ताकत उतार पर है, हालात क्या करवट लेते हैं। हाल ही में सऊदी शाह और अमेरिकी प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठकों से इस संभावना को और बल मिलता है, जिनमें इस क्षेत्र में अमेरिकी पिट्ठू समझे जाने वाली सल्तनत ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। चीन की कुटिल चालों पर अंकुश लगाने के लिए भारत को अपने पुराने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए। इसी से शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और आपसी सहयोग की भावना के पक्ष में जनमत तैयार किया जा सकेगा।



लेखक सेसिल विक्टर स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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