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आशाजनक संकेत

Posted On: 7 Oct, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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शांतिपूर्ण माहौल और पर्यटन कारोबार में तेजी के बीच हाल के दिनों में कश्मीर घाटी में जैसे बहार खिल गई हो। यह कोई नाम की शांति नहीं है। मैंने राज्य के विभिन्न हिस्सों में जिन कश्मीरियों से मुलाकात की, उन सभी ने पर्यटकों के प्रवाह पर प्रसन्नता व्यक्त की। प्रसिद्ध डल झील के एक शिकारा मालिक ने कहा कि अल्लाह की रहमत से अमरनाथ यात्रा शांति से पूरी हो गई। पूरे भारत से पर्यटक आ रहे हैं और हमारा कारोबार अच्छा चल रहा है। अल्लाह शरारतियों को सही रास्ता दिखाए। ऐसा कारोबार पिछले कई सालों से नहीं हुआ है। झील के इलाके में 700 से अधिक हाउसबोट हैं। हालांकि ये टिप्पणियां उत्साहव‌र्द्धक हैं, फिर भी उग्रवाद के जमाने से कश्मीर को निकट से देखने की वजह से अभी से मैं कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा। जरा से उकसावे से डल झील में आग लग सकती है। दरअसल दुश्मन ताकतों के आतंकवाद का पैटर्न ऐसा ही रहा है। यहां आतंकवाद एक बड़ा कारोबार है। कुछ स्वयंभू और सुरक्षित उग्रवादी नेताओं की समृद्ध जीवनशैली ऐसी ही अचर्चित कहानियां बयां करती है। वैसे सभी जानते हैं कौन क्या है और कौन किसके लिए तथा किस मकसद से काम करता है। इसलिए हैरानी नहीं होती कि इनमें से कुछ पुराने नेता कश्मीर की शरारती राजनीति का स्थायी अंग हैं। जमीनी हकीकतों को न समझने और राजनीतिक व्यावहारिकता का इस्तेमाल न करने के कारण कश्मीर समस्या पेचीदा हो गई है।


मुख्यमंत्री को सबसे बड़ी चुनौती बिक चुके नेताओं और उनके शरारती खेल से नहीं है, बल्कि जम्मू, लद्दाख और कश्मीर युवक-युवतियों की उच्च आकांक्षाओं और अपेक्षाओं से है। वे अच्छी शिक्षा और भरोसेमंद रोजगार, अवसर तथा सामाजिक सुरक्षा चाहते हैं। ये कोई बड़ी अपेक्षाएं नहीं हैं। इसके लिए एक नए साहसिक, सामाजिक-आर्थिक, पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त कार्य-योजना की जरूरत होगी। इसमें सरकारी-निजी क्षेत्र की भागीदारी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। नए विचारों और गंभीर प्रयासों से कल एक नए कश्मीर के अभ्युदय में मददगार सिद्ध हो सकता है। दूसरी चुनौती के लिए गिलानी, मीरवाइज और यासीन मलिक जैसे लोगों से चतुराई से निपटना होगा। अब सभी जान गए हैं कि श्रीनगर हत्याओं के लिए सुरक्षा बल नहीं, बल्कि लश्कर का ही एक गुट जिम्मेदार था। तीसरी बड़ी चुनौती सीमापार घुसपैठ की है। इस साल जून और 15 अगस्त के बीच घुसपैठ की 12 कोशिशें हुईं और करीब 40 उग्रवादी मुठभेड़ में मारे गए। एक उच्च सुरक्षा अधिकारी ने एक बार मुझसे कहा था कि घुसपैठ रोक दीजिए और उग्रवाद की रीढ़ टूट जाएगी।


आइएसआइ द्वारा हाल की घुसपैठ की कोशिशों को देखते हुए लगता है कि अभी भी चौकसी और निगरानी प्रणाली में कुछ कमियां हैं। हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि कुछ घुसपैठिए दाखिल होने में कामयाब हो गए हैं या नहीं। इसका मतलब यह है कि अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से चौकसी और निगरानी प्रणाली को और चुस्त बनाने की जरूरत है। सच है कि पूरे का पूरा प्रबंधन ऑपरेशन एक बेमतलब की कवायद साबित होती है। एक कश्मीरी जनरल ने मुझे बताया कि हम चक्कर काटते रहते हैं और घूम-फिर कर वहीं लौट आते हैं। इसी वजह से कश्मीर में राजनीति और उग्रवाद का दोहराव होता रहा है। यहीं एक कड़ी चुनौती आती है, जिसका सामना करने के लिए एक केंद्रित और दृढ़-निश्चयी व्यावहारिक राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत होगी। और दिक्कत यह है कि यह व्यावहारिकता कम ही नजर आती है। उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई नाजुक दौर में पहुंच गई है। अगर दिक्कतों और उकसावों से सही तरह से निपटा जाए और घुसपैठ के रास्तों को कारगर ढंग से बंद कर दिया जाए तो सामान्य स्थिति बहाली की प्रक्रिया को मजबूत किया जा सकता है। काफी कुछ दारोमदार उमर अब्दुल्ला सरकार के काम-काज के तरीके और जमीनी बलों के व्यवहार पर निर्भर करता है।


लेखक हरी जयसिंह स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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