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शोर-शराबे में दबी एक शहादत

Posted On: 29 Aug, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Shubhasni aliकभी-कभी एक बड़ी भीड़ जो किसी मंजिल तक पहुंचने के लिए तेजी से आगे बढ़ रही हो, का एक अदना सदस्य रास्ते में ही शहीद हो जाता है और उसकी तरफ भीड़ में शामिल उसके ही तमाम साथी उसकी शहादत को देख भी नहीं पाते हैं। कभी-कभी, एक बड़े हुजूम द्वारा लगाए जा रहे नारों से जब एक अदने इंसान की आवाज गायब हो जाती है तो इसका पता भी उसके साथियों को नहीं चल पाता है। भोपाल की शेहला मसूद के साथ 16 अगस्त को कुछ ऐसा ही हुआ। उस दिन सुबह देश के लाखों लोगों की तरह शेहला भी अन्ना हजारे और उनके साथियों की गिरफ्तारी के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार करने के लिए अपने घर से निकली थी। गाड़ी में बैठने से पहले, उसने अपने तमाम जानने वालों को संदेशा भेजा कि अन्ना सरकार और विपक्ष को जगाने में सफल हुए हैं। उम्मीद है कि वह हमें भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाएंगे। 2 बजे भोपाल के बोट क्लब पर मिलना। वह अपनी गाड़ी में बैठकर जाने की तैयारी ही कर रही थीं कि उनके गले में हत्यारे की गोली ने अपना निशाना पा लिया और वहीं उनकी जान चली गई।


शेहला उन तमाम लोगों से कुछ भिन्न थीं जो 16 अगस्त को अचानक कार्यकर्ता बन गए या आंदोलित हो गए। वर्षो से वह मध्य प्रदेश में तमाम मुद्दों को बराबर उठाने की हिम्मत कर रही थी। सूचना के अधिकार का सहारा लेकर वह लगातार ऐसे सवाल उठाती रहती थीं जो राज्य की भाजपा सरकार को फूटी आंख नहीं भाते थे। विशेष रूप से वह जंगल की जमीन की लूट और जंगल पर आश्रित तमाम जीवों जिनमें आदिवासी और गरीबों के अलावा शेर और तमाम जानवर भी शामिल थे, के अधिकारों और खुशहाली से संबंधित सवाल उठाती थीं। कभी लकड़ी की चोरी, कभी पेड़ों का काटा जाना, कभी आदिवासियों और जंगल में रहने वाले गरीबों को जबरदस्ती उनके जीविका के स्नोत से दूर किया जाना-इन सारे सवालों के बारे मे वह जानकारी इकट्ठा करतीं और फिर उसके आधार पर सरकार की गलत नीतियों और गतिविधियों को रोकने या बदलने का प्रयास करतीं। उनको धमकियां मिलतीं, लेकिन वह बिना परवाह किए अपने काम में लगी रहतीं। शेहला अन्ना हजारे और उनके साथियों द्वारा भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए मुहिम में भी सक्रिय सदस्य थीं। इसीलिए 16 अगस्त की सुबह वह घर से निकलकर सीधे मौत के मुंह में समा गई थीं, लेकिन उनकी मौत का कारण शायद उस मुहिम में उनकी सक्रियता नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के जंगलों और जंगल के प्राणियों के साथ उनका घनिष्ठ रिश्ता था। पेड़ काटने वाले, गरीबों को जंगलों से बाहर करने वालों और शेर व अन्य जानवरों की हत्या करने वालों से भी ज्यादा खतरनाक लोगों का प्रवेश मध्य प्रदेश के जंगलों में हो गया है।


एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मध्य प्रदेश में हीरों का खनन करने के लिए आई है। शेहला और उनके साथ तमाम अन्य लोगों का मानना था कि इस कंपनी द्वारा मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में किया जा रहा हीरों का खनन पूरी तरह से गैरकानूनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में हीरों का विशाल भंडार अधिक है। शेहला का मानना था कि इस कंपनी की अवैध गतिविधियों के चलते यह पूरा संवेदनशील इलाका बर्बाद हो जाएगा, नदी, वन और उनमें रहने वाले तमाम प्राणी सब इस बहुराष्ट्रीय कंपनी के निर्मम शोषण के शिकार बन जाएंगे। उसका ऐसा सोचना अनुचित भी नहीं था, क्योंकि यह कोई मामूली कंपनी नही है। इस कंपनी पर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जंगली इलाकों में इस कंपनी की गतिविधियां इस प्रकार की रही हैं कि उन इलाकों के पर्यावरण पर उनका विपरीत असर पड़ा है।इस कंपनी के दृष्टिकोण का अंदाजा इस बात से लगता है कि उसकेचेयरमैन ने कहा था कि जमीन का अधिकार उसको सुरक्षित रखने की क्षमता पर आधारित है। वाकई इस कंपनी के हाथ इतने लंबे हैं कि उसके द्वारा किए जा रहे गैरकानूनी कार्यों को रोकना असंभव सा होता जा रहा है। सख्ती करने वाले दो जिलाधिकारियों का स्थानांतरण हो चुका है। यहां तक कि मध्य प्रदेश के उच्च न्यायलय के आदेशों का पालन करने से राज्य सरकार इंकार कर रही है। यही नहीं, पर्यावरण और वन मंत्रालय की सलाहकार समिति की बैठक के एजेंडे में इस खनन के बारे में चर्चा दर्ज थी, लेकिन समय की कमी का कारण दिखाते हुए इस पर चर्चा नहीं की गई।


शेहला मसूद ने मध्य प्रदेश के डीजीपी को पत्र द्वारा इस बात की सूचना दी थी कि उनकी जान को खतरा है और एक पुलिस अधिकारी उन्हें धमकियां दे रहा है। इस शिकायत को बिल्कुल अनदेखा और अनसुना कर दिया गया और 16 अगस्त को जिस बात का डर शेहला को था वह हो ही गया। एक ही गोली का शिकार बनकर उसने दम तोड़ दिया। शेहला बहुत अद्भुत महिला थीं। एक साधारण, मुस्लिम परिवार में उनका जन्म हुआ। उनके अंदर बड़ी हिम्मत और दिलेरी रही होगी, क्योंकि उन्होंने अपने तमाम रवायतों को किनारे करते हुए अपने जीवन के मकसद तय किए। उन्होंने शादी नहीं की। उन्होंने घर की हदों को नहीं माना। प्रकृति की सुरक्षा, जंगल, नदी, जानवर और आदिवासियों के आपसी रिश्तों की सुरक्षा तथा सरकार, माफिया और धनाढ्य कंपनियों की मनमानी के खिलाफ संघर्ष यह उसके जीवन के लक्ष्य थे। मध्य प्रदेश की पुलिस ने फौरन अनुमान लगा लिया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली है, जबकि हत्या में इस्तेमाल की जाने वाली पिस्तौल का शेहला की लाश के आस-पास कोई पता न था। पुलिस के रवैये के खिलाफ फैले आक्रोश का नतीजा है कि शेहला की हत्या की छानबीन अब सीबीआइ को सौंपी गई है।


लेखिका सुभाषिनी अली सहगल लोकसभा की पूर्व सदस्य हैं


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