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ड्रोनों की भेंट चढ़ी नीतियां

Posted On: 15 Dec, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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अमेरिका की अफ-पाक नीतियां और उसके प्रमुख सहयोगी पाकिस्तान की सामरिक पैठ की नीतियां, इस साल 26 नवंबर को हुए नाटो ड्रोन हमले की भेंट चढ़ गईं। नाटो के इस हमले में पाकिस्तान सेना के 28 सदस्य मारे गए, जिनमें एक मेजर और एक कैप्टन शामिल था। इसमें 13 सैनिक घायल भी हुए। इस ड्रोन हमले से पूरे पाकिस्तान में गुस्सा फैलना स्वाभाविक ही था। पहले कभी भी अमेरिकी नेतृत्व में नाटो गठबंधन सेनाओं ने पाकिस्तान आर्मी के इतने सैनिकों को नहीं मार गिराया था। पाकिस्तान सरकार, आर्मी और लोगों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक और सही थी। उन्होंने इसे अपनी अखंडता और प्रभुसत्ता पर हमला माना। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि ऐसे हमलों का माकूल जवाब दिया जाएगा। पहला काम तो उन्होंने यह किया कि पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान में नाटो अड्डों के लिए ले जाई जाने वाली खाद्य और उपकरणों आदि की रसद को रोक दिया। मई में एक दुस्साहसी अमेरिकी कमांडो हमले में एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान और अमेरिका के सम्बंधों में आया तनाव इस हमले के बाद और भी गहरा हो गया। इन हालात में, अफगानिस्तान में अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों की नीतियों में नई शर्तें जुड़ सकती हैं, जिन पर दक्षिण एशियाई और मध्य एशियाई देशों की बराबर नजर रहेगी।


पाकिस्तान में, सेना के क्रोधित होने के और भी कारण है। लोगों ने पूछना शुरू कर दिया है, जब सलाला में पाकिस्तानी सैनिक मारे जा रहे थे, तब आर्मी और आईएसआई क्या कर रही थीं? कुछ लोगों का मानना है कि यह ड्रोन हमला, घरेलू और विदेशी सभी मामलों पर उन्मादी और सैन्य प्रतिक्रिया का परिणाम है। अब अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में सैन्य अभियानों को बंद करने का समय आ गया है। अफ-पाक इलाके में आतंकवाद सहित दूसरी समस्याओं का समाधान खोजने में नाकामी की जिम्मेदारी से अमेरिका, गठबंधन सेनाएं और खुद पाकिस्तान आर्मी बच नहीं सकती, जबकि विकीलीक्स केबलों में तो अफगानिस्तान में आईएसआई की मौजूद्गी और जातीय, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के सैन्य समाधान खोजने की प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया है। ड्रोन मामले ने भी सीमापार आतंकवाद सहित सभी घरेलू और आपसी मुद्दों के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय मदद मांगने के खतरे भी उजागर हुए हैं। वैसे तो पाक इलाकों को निशाना बनाने के लिए गठबंधन सेनाओं द्वारा अफगान इलाकों के इस्तेमाल पर पाकिस्तान का भडकना समझ में आता है, लेकिन यह भी देखना होगा कि पाकिस्तान ने भी अपने ही इलाकों में अमरीकी ड्रोनों के लिए अड्डों की अनुमति दी थी और अफगानिस्तान में तैनात नाटो सेनाओं के लिए अधिकांश रसद पाकिस्तान में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से ही होकर भेजी जाती थी। ड्रोन हमले के बारे में पाक मीडिया ने बड़े दिलचस्प सवाल उठाए हैं।


डेली टाइम्स ने कहा है कि पाक की प्रभुसत्ता पर इस प्रकार के हमले रोजमर्रा की बात बन गए हैं और अमेरिका पर हम इस कदर निर्भर हो गए हैं कि हम मुस्करा कर इन्हें सहन कर लेते हैं। ऐक्सप्रेस ट्रिब्यून लिखता है कि हमने सीमा को बेधड़क पार करने और अफगानिस्तान में अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने वाले उग्रवादियों से निपटने का वायदा तो किया था, लेकिन अमेरिका को यह नहीं बताया कि हम भी थोड़ा मजा लेना चाहते हैं। सामरिक पैठ के नाम पर हम दोहरा खेल खेलने वाले हैं। अच्छे तालिबान को मदद देकर और उकसा कर हमने अमेरिका और नाटो सेनाओं को भ्रमित कर दिया है। हमारे वायदों पर यकीन करके, नाटो और अमेरिका को अफगानिस्तान में उग्रवादियों के हाथों नुकसान झेलना पड़ रहा है।


लेखक योगेंद्र बाली स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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