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बंधक समस्या पर नहीं चलेंगे बहाने

Posted On: 8 May, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Balendu Dadhinchऐसा बहुत कम होता है, जब केंद्र सरकार अपने किसी विरोधी दल द्वारा शासित राज्य सरकार की तारीफ करती है। छत्तीसगढ़ में सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन के अपहरण के मुद्दे को रमन सिंह सरकार ने जिस परिपक्वता और दृढ़ता के साथ हल किया, उसकी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने खूब प्रशंसा की है। बारह दिन तक अगवा रहे मेनन की रिहाई के लिए राज्य सरकार और नक्सलियों के बीच जो करार हुआ, उसमें राज्य सरकार मजबूत पक्ष के रूप में उभरी है। यह हमारे देश में पिछले दो-ढाई दशकों से प्रचलित परिपाटी से एकदम अलग है, जब सरकारी पक्ष अपहर्ताओं के सामने दयनीय अवस्था में पड़ा दिखता रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने मेनन को छुड़ाने के लिए किसी नक्सली नेता को रिहा नहीं किया। उसने लंबी सौदेबाजी के बाद नक्सलियों की सिर्फ यह मांग मानी है कि प्रदेश में मारे गए नक्सली कार्यकर्ताओं की मौतों की जांच कराई जानी चाहिए। यह देखने के लिए कि कहीं वे बिना किसी आधार के पुलिस की ज्यादतियों के शिकार तो नहीं हुए। जैसा कि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है, मेनन की रिहाई के पांच मिनट के भीतर ही एक समिति बना दी गई, जो हर घटना की अलग से जांच कर राज्य सरकार और अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।


नक्सलियों के आगे नतमस्तक सत्ता


छत्तीसगढ़ की घटना ओडिशा से एकदम अलग थी, जहां नवीन पटनायक की सरकार ने एक विधायक और दो इतालवी नागरिकों को नक्सलियों के कब्जे से मुक्त करवाने के लिए वह सब किया, जो अपहर्ताओं ने चाहा। केंद्रीय गृह मंत्रालय के दावे पर यकीन किया जाए तो उसने नक्सलियों से कड़ाई से निपटने की उसकी हर सलाह को नजरअंदाज कर दिया। राज्य सरकार की कमजोरी को नक्सलियों ने जल्दी ही भांप लिया था। इसलिए वे तब तक अपने वादों में सुविधाजनक संशोधन करते रहे, जब तक कि वे इन अपहरणों से अधिकतम लाभ उठाने की स्थिति में नहीं आ गए। ओडिशा और छत्तीसगढ़ की ताजा घटनाओं ने यह आशंका पैदा कर दी है कि कहीं नक्सलियों की तर्ज पर देश के दूसरे भागों में सक्रिय बागी संगठन भी अपनी मांगें मनवाने के आसान तरीके के रूप में आसान लक्ष्यों के अपहरण का सिलसिला न शुरू कर दें। अगर ओडिशा सरकार ने भी छत्तीसगढ़ जैसी ही कड़ाई दिखाई होती और अपहृतों के बदले में कैदियों को रिहा करने से साफ इनकार कर दिया होता तो स्थिति अलग होती। कहा जाता है कि केंद्र ने उसे नक्सलियों को किसी भी कीमत पर रिहा न करने की सलाह दी थी। लेकिन सिर्फ नवीन पटनायक सरकार को ही क्यों दोषी ठहराया जाए।


खुद केंद्र सरकार भी अतीत में अपहरण के मामलों में आतंकवादियों के आगे समर्पण कर चुकी है। वर्ष 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के दिनों में तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की अपहृत बेटी रूबैया सईद को छुड़ाने के लिए पांच आतंकवादियों को रिहा किया था। वर्ष 1999 में नेपाल से अगवा कर अफगानिस्तान ले जाई गई एयर इंडिया उड़ान 814 के यात्रियों को रिहा कराने के लिए तत्कालीन राजग सरकार ने न सिर्फ मसूद अजहर समेत तीन दुर्दात आतंकवादियों को रिहा किया, बल्कि खुद तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह उन्हें विमान में अपने साथ लेकर अफगानिस्तान गए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जरूर 1984 में ऐसे एक मामले में कड़ा रुख अपनाया था, जब कश्मीर में फांसी की सजा पाए आतंकवादी मकबूल बट्ट को आजाद कराने के मकसद से कुछ आतंकियों ने ब्रिटेन में भारतीय राजनयिक रवींद्र म्हात्रे का अपहरण कर लिया था।


इंदिरा गांधी ने अपहर्ताओं के साथ सौदेबाजी करने से साफ इनकार कर दिया और जब आतंकियों ने राजनयिक की हत्या कर दी तो बट्ट की फांसी की सजा पर दृढ़ता से अमल कर दिया गया। नदारद है नीति लेकिन वह इंदिरा गांधी थीं। उनके बाद ऐसी दृढ़ता और कड़ाई कभी नहीं देखी गई। मांगें मनवाने के लिए अपहरण करने की घटनाओं से हमारी सरकारें कुछ इतने कमजोर ढंग से निपटती रही हैं कि भारत को ऐसे मामलों में एक नरम राज्य माना जाने लगा है। मसूद अजहर की रिहाई से हमने बहुत बड़ा सबक सीखा है कि किसी एक आतंकी सरगना का हाथ से निकलना कितना भारी पड़ सकता है। उसने पाकिस्तान पहुंचने के बाद अपने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को फिर से कश्मीर में आतंकी वारदातें करने के लिए झोंक दिया और नतीजे में सैंकड़ों निर्दोष भारतीयों को जान से हाथ धोना पड़ा। ऐसे तत्वों की रिहाई होने पर उन सैनिकों, पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा एजेंसियों पर क्या गुजरती होगी, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर और कई बार अपने साथियों की कुर्बानी देकर उन्हें गिरफ्तार किया होगा! उन परिवारों पर क्या बीतती होगी, जिनके सदस्यों ने आतंकवाद विरोधी अभियानों में जान दी? लेकिन क्या सचमुच हम अपनी गलतियों से सबक सीखते हैं? इस संदर्भ में रमन सिंह का यह बयान बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि भले ही किसी राज्य के मुख्यमंत्री का ही अपहरण क्यों न कर लिया जाए, उसके बदले में कैदियों को रिहा नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए, जो सबके लिए बाध्यकारी हो।


कई पश्चिमी देशों में बंधकों के मुद्दे पर सुस्पष्ट नीतियां मौजूद हैं। अमेरिका बंधकों के बदले में कैदियों को रिहा न करने की स्पष्ट नीति का पालन करता है। ज्यादा से ज्यादा वह अपहर्ताओं को फिरौती का भुगतान करने पर तैयार हो जाता है, लेकिन ऐसा करने के बाद वह फिरौती की रकम को वापस वसूलने के लिए भी जी-तोड़ कोशिश करता है। इजराइल भी आतंकियों के साथ कड़ाई से निपटने के लिए मशहूर है। हालांकि हाल ही में उसे फलस्तीनी आतंकियों के साथ एक आश्चर्यजनक सौदा करने पर मजबूर होना पड़ा था, जब उसने अपने एक नागरिक की रिहाई के बदले एक हजार फलस्तीनी अतिवादियों को रिहा किया था। बहरहाल, इस अदला-बदली के बाद से ही वह रिहा किए गए कैदियों की दोबारा धरपकड़ का अभियान चलाए हुए है। यह ऊहापोह क्यों बंधकों के बारे में साफ नीति न होने के कारण ऐसे मामलों से निपटने का सारा जिम्मा स्थानीय सरकारों पर आ जाता है, जो वहां के हालात के हिसाब से जैसा ठीक समझती हैं, वैसा ही फैसला करती हैं। अगर केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय नीति बनाती है तो उन्हें बंधकों के रिश्तेदारों तथा मीडिया कवरेज की बदौलत पैदा होने वाले दबावों से अप्रभावित रहते हुए ठोस फैसले करने की पर्याप्त आजादी मिल जाएगी। ऐसी घटनाओं के बाद जिस तरह का भावनात्मक माहौल बनता है, वह संबंधित अधिकारियों के फैसलों को जरूर प्रभावित करता है।


एयर इंडिया विमान के अपहरण के समय जिस तरह का नाजुक माहौल बना था, उसमें किसी भी सरकार के लिए इतने यात्रियों की जान बचाने के लिए समझौता न करना बहुत मुश्किल होता। हां, अगर पहले से ही आपके पास राष्ट्रीय स्तर पर बहस और सहमति के आधार पर तैयार की गई साफ नीति मौजूद है तो फिर भावनात्मकता का कोई महत्व नहीं रह जाता। वह न सिर्फ ठोस फैसलों का आधार प्रदान करती है, बल्कि फैसले करने वालों को नीतिगत संरक्षण भी देती है। इसका कुछ न कुछ प्रभाव अपहर्ताओं पर भी पड़ता है। अपहरण की ताजा घटनाओं के बाद भारत में इस दिशा में चर्चा शुरू हुई है। केंद्र सरकार की ओर से संकेत आए हैं कि वह ऐसी नीति के बारे में सोच रही है। हालांकि कुछ लोग बंधकों के बदले में कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर साफ-साफ लकीर खींचे जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसा कोई भी फैसला तत्कालीन हालात को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसी किसी भी नीति की सफलता में संदेह होगा, जो पूरी तरह स्पष्ट न हो और किसी किस्म के लचीलेपन की गुंजाइश रखती हो। अगर मकसद अपहर्ताओं को ऐसी घटनाओं से रोकना है तो उन्हें स्पष्ट संदेश भेजे जाने की जरूरत है और वह संदेश सिर्फ एक ही हो सकता है कि यह देश आतंकवादी तत्वों के ब्लैकमेल के आगे झुकने को तैयार नहीं है।


लेखक बालेंदु शर्मा दाधीच स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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