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सोशल मीडिया में रोजगार

Posted On: 26 Sep, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Peeyush Pandeyसोशल मीडिया एनालिस्ट, सोशल मीडिया मैनेजर, ट्विटर एकाउंट मैनेजर और फेसबुक गुरु। सोशल मीडिया के विस्तार के साथ इन पदों के लिए विज्ञापन अब समाचार पत्रों और इंटरनेट पर कई साइट्स पर खूब दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपने ब्रांड को मजबूत करने से लेकर इमेज सुधारने और नया बाजार बनाने के मकसद से कंपनियों को सोशल मीडिया के तमाम पहलुओं की जानकारी रखने वाले लोगों की आवश्यकता हो रही है। सरकारी स्तर पर भी इन नए माध्यमों की जानकारी रखने वाले लोगों की मांग बढ़ने वाली है। सरकारी विभागों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार नए नियम बनाने जा रही है। सरकारी विभागों के लिए दिशानिर्देश संबंधी मसौदा सूचना तकनीक विभाग की साइट पर लोगों की राय जानने के लिए रखा गया है। आम लोगों से 30 सितंबर तक सुझाव मांगे गए हैं। कई नए शोध इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि सोशल मीडिया के जरिये अलग-अलग किस्म के कई नए रोजगारों का सृजन हो रहा है।


मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट एच स्मिथ स्कूल ऑफ बिजनेस की ताजा स्टडी के मुताबिक फेसबुक के चलते बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला है। इस अध्ययन के मुताबिक सिर्फ फेसबुक से जुड़े विभिन्न एप्लिकेशंस के विस्तार के जरिये इस साल अमेरिका में दो लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को करीब 15.71 अरब डॉलर यानी 75 हजार करोड़ रुपये का योगदान मिला। वायर्ड पत्रिका के मुताबिक ब्रिटेन का लगभग आधा कारोबार अब किसी न किसी स्तर पर सोशल मीडिया के मंचों का लाभ ले रहा है। यही वजह है कि सोशल मीडिया से जुड़े रोजगार बढ़ रहे हैं। भारत में भी हाल अलग नहीं है। खास बात यह कि इस क्षेत्र में उन युवाओं के लिए ज्यादा मौके हैं जिनके पास खास अनुभव नहीं है। मुंबई-चेन्नई और दिल्ली के अखबारों में हाल में ऑनलाइन सोशल मीडिया मैनेजमेंट नाम से निकले कई भर्ती विज्ञापनों में अनुभव कैटेगरी में लिखा गया शून्य, लेकिन सवाल सोशल मीडिया से जुड़े रोजगारों की मांग का नहीं बल्कि उनकी पूर्ति का है। इसमें भी बड़ा सवाल महानगरों से इतर युवाओं के इस नए किस्म के रोजगार में संभावना का है।


इंटरनेट पर महानगरीय और अपेक्षाकृत छोटे शहर व कस्बों के युवाओं के लिए समान अवसर हैं। यही इंटरनेट की खासियत भी है कि यह एक लोकतांत्रिक मंच है जहां सभी के लिए समान अवसर हैं। इंटरनेट पर जो कंटेंट दिल्ली का युवा पढ़ सकता है वही औरेया का भी। जो एक्टिविटी मुंबई का युवा कर सकता है वह झुमरीतलैया का भी। कई मायनों में सोशल मीडिया की बेहतर समझ रखने वाले युवा छोटे शहरों में भी हैं, लेकिन क्या छोटे शहर के युवाओं तक सोशल मीडिया में पैदा होती रोजगार की नई संभावनाएं पहुंच पा रही हैं। कानपुर-आगरा और रांची जैसे शहरों के युवाओं के ट्विटर पर हजारों फॉलोवर्स हैं। वे फेसबुक पर सक्रिय हैं। सोशल मीडिया की बेहतर समझ के बावजूद इससे जुड़े रोजगारों की तरफ उनका ध्यान नहीं है। दरअसल, यह बहुत महत्वपूर्ण बात है जिस पर अभी चर्चा नहीं हो रही है। सोशल मीडिया के क्षेत्र में लाखों नए रोजगारों का सृजन आने वाले दिनों में होना है।


सोशल मीडिया के मंचों की लोकप्रियता और इंटरनेट के विस्तार के साथ इस क्षेत्र में अलग-अलग किस्म के कई नए रोजगार पैदा होंगे। आशंका यह है कि रोजगार के ये नए मौके कहीं छोटे शहरों के युवाओं के हाथ से छिटक न जाएं। ऐसा इसलिए नहीं होगा, क्योंकि उन्हें इन माध्यमों की जानकारी नहीं होगी, बल्कि ऐसा इसलिए हो सकता है कि उन्हें इन नई संभावनाओं की जानकारी ही न हो अथवा वे इस नए क्षेत्र की रोजगार संबंधी जरूरतों को पूरा करने में ही पिछड़ जाएं। सोशल मीडिया मनोरंजन से आगे निकल चुका है अब यह बात समझने की आवश्यकता है। फेसबुक-ट्विटर और यू-ट्यूब जैसे मंचों पर सक्रियता से संचित पूंजी का अपना महत्व है। युवाओं को अब यह भी समझना है। महानगरों में कई बड़े संस्थानों और बड़ी कंपनियों ने इस तरह की पहल की है, लेकिन छोटे शहरों के युवाओं को कौन जागरूक करेगा इस सवाल पर भी अब बहस होनी चाहिए।


इस आलेख के लेखक  पीयूष पांडे हैं


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