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महामहिम की तलाश

Posted On: 4 May, 2012 Others में

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Narayan Dixitराष्ट्रपति के चुनाव के लिए राजनीतिक दलों के बीच हो रही जोर-आजमाइश पर निराशा जता रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित


राष्ट्र अविभाज्य सत्ता है। यह संपूर्ण जनगणमन की निष्ठा है। इसलिए राष्ट्र के सर्वोच्च पदधारक राष्ट्रपति को संपूर्ण जनगणमन का प्रिय नायक ही होना चाहिए। भारत का राष्ट्रपति भारत की संस्कृति, रीति-नीति और संविधान का प्रमुख संरक्षक प्रतीक और उच्च प्रतिमान होता है। वह विश्व में हमारा सर्वोच्च प्रतिनिधि और राष्ट्र का प्रथम महामहिम नागरिक होता है। वह विविध आयामी असहमतियों, सहमतियों, पंथों, वर्गो, दलों से ऊपर होता है। वह भारतीय जनगणमन का राजमुकुट होता है। राष्ट्रपति दलपति नहीं होता। वह राजप्रमुख नहीं, राष्ट्र प्रमुख होता है। वह राजनीतिक दलतंत्र के अलावा समूचे राष्ट्र का भी महामहिम प्रतिनिधि होता है। बावजूद इसके देश का दलतंत्र अपने मनमाफिक व्यक्ति को ही इस पद पर बैठाने की कोशिश कर रहा है। दल गठबंधन जोर-आजमाइश कर रहे हैं। आम सहमति की सुहावनी बातें भी चल रही हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में अपने को ही पदासीन करने का चलन है। सत्तारूढ़ संप्रग मनमाफिक राष्ट्रपति की दिशा में सक्रिय है। गैरकांग्रेसी विपक्ष भी गोटियां चल रहा है।


जोड़तोड़ जारी है। विभिन्न राजनीतिक गुटों में बंटी स्वार्थी राजनीति से राष्ट्र आहत है। राष्ट्र के सर्वोच्च आसन के प्रश्न पर भी सर्वानुमति का अभाव है। शरद पवार ने गैरराजनीतिक राष्ट्रपति का सवाल उठाया है। राजनीतिक रागद्वेष से मुक्त राष्ट्रपति समूचे देश की अभिलाषा है। बहुत कठिन है राजनीति में राजनीति से ऊपर उठा व्यक्ति खोजना। संविधान सभा सर्वोच्च आसन पर रागद्वेष मुक्त लोगों का चयन चाहती थी। राजनीतिमुक्त राष्ट्र प्रमुख की मांग प्रबल थी। पंडित नेहरू ने कहा था, मैं खुद भी फैसला नहीं कर सका कि चुनाव बाद राष्ट्रपति को अपनी पार्टी से किस प्रकार का संबंध रखना चाहिए। नेहरू असमंजस में थे, लेकिन कांग्रेस ने समर्थक राष्ट्रपति की परंपरा चलाई। इंदिरा गांधी ने पार्टी के घोषित उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हराकर वीवी गिरि को राष्ट्रपति बनाया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति की गरिमा को आसमान पहुंचाया था। आर वेंकटरमण, डॉ. शंकरदयाल शर्मा, केआर नारायण राजनीतिक होकर भी प्रतिष्ठित रहे। राधाकृष्णन, डॉ. कलाम जैसे गैर-राजनीतिक महानुभावों ने राष्ट्रपति पद की गरिमा को नई ऊंचाइयां दीं।


भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं। एपीजे कलाम अभी भी उपलब्ध हैं, अन्य अनेक राष्ट्रभक्त, चिंतक, समाजसेवी हैं। असली कठिनाई है राजनीतिक दलतंत्र के दुराग्रह। सत्तारूढ़ संप्रग ने सर्वानुमति बनाने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं की। संप्रग अपने मन का आदमी चाहता है तो प्रतिपक्ष अपने मन का। भारतीय दलतंत्र राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी सर्वानुमति नहीं बना पाता। आतंकवाद भारत से युद्ध है, इस युद्ध को लेकर भी सर्वानुमति नहीं है। विदेश नीति राष्ट्रीय प्रश्न है, विदेश नीति का निर्धारण दलनिष्ठा से ऊपर ही होना चाहिए। इसके लिए सर्वानुमति चाहिए। सत्तारूढ़ संप्रग विदेश नीति के प्रश्नों पर भी सबको विश्वास में नहीं लेता। विचार असहमति बेशक दलतंत्र की आधारभूत आवश्यकता है, लेकिन सारी असहमतियों और विचार निष्ठा का उद्देश्य अंतत: राष्ट्र का संव‌र्द्धन ही है, लेकिन दलतंत्र राष्ट्रीय सहमति के क्षेत्रों में भी टकराव करता है। राष्ट्रपति का आसन राष्ट्रीय सहमति का शिखर है, लेकिन यहां सेनाएं आमने-सामने हैं।


तलवारें म्यान से बाहर हैं। विपक्ष की काट के लिए सत्तापक्ष के दूत दौरों पर हैं। विपक्ष भी सत्तापक्ष की रणनीति को ढेर करने पर आमादा है। जो दलतंत्र अपने राष्ट्रपति के निर्वाचन में भी परस्पर संवाद और आम सहमति नहीं बना सकता उससे अन्य राष्ट्रीय प्रश्नों पर राष्ट्र सर्वोपरिता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आखिरकार राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी टकराव के मूलभूत कारण क्या हैं? राष्ट्रपति राजनीति और राज्यव्यवस्था से ऊपर होता है। जापान में वह संविधान (भाग 1) के सम्राट से भी ज्यादा शक्तिशाली है। इंग्लैंड का सम्राट राज्य करता है, शासन नहीं करता। फ्रांस का राष्ट्रपति संविधान (धारा 5 से 11) का संरक्षक है, शासन में भी भागीदार है, लेकिन भारत का राष्ट्रपति संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधि है। बहुमत की सरकार संविधान से शासन की शक्ति पाती हैं। वह भारत के संपूर्ण लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। संविधान सभा में यह विषय 10 दिसंबर, 1948 को उठा। प्रो. केटी शाह ने कहा, शासन का प्रमुख प्रधानमंत्री अथवा प्रधान हो सकता है, परंतु लोगों को ऐसे प्रतिनिधि की आवश्यकता होती है जिसमें समूचे राष्ट्र की सर्वसत्ता सन्निहित हो। राष्ट्रपति में राष्ट्र की सर्वसत्ता है। महावीर त्यागी ने भी कहा, जनतंत्र में कोई भी सरकार दावा नहीं कर सकती कि वह सभी लोगों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करती है। कोई इकाई, व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जिसमें सर्वसत्ता और लोगों के परमाधिकार निहित हों ..अच्छा तो यह होता कि राष्ट्रपति लोगों की इच्छा का प्रतीक और आदर का पात्र हो।


संविधान निर्माताओं के मन में राष्ट्रपति के पद को लेकर विशिष्ट गरिमामय भावना थी। बेशक वे अमेरिकी संविधान जैसा सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति नहीं, ब्रिटिश परिपाटी वाला क्राउन चाहते थे, लेकिन यह भी सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष दोनों के आदर का पात्र होता है। ब्रिटिश संसदीय परंपरा में प्रतिपक्ष और सत्तापक्ष, दोनों को ही राजा का आज्ञापालक माना जाता है। भारत के दलतंत्र को यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए। संविधान सभा में राष्ट्रपति को आम जनता से चुने जाने का प्रस्ताव भी आया था। देश की विशाल जनसंख्या के चलते यह अव्यावहारिक कहा गया। तर्क यह भी था कि राजनीतिक दल के प्रत्याशी के रूप में ही ऐसा चुनाव लड़ना संभव होगा। इसलिए लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभा के सदस्यों को मतदाता माना गया। यहां सामान्य चुनावों वाले आरोप-प्रत्यारोप से भिन्न निर्वाचन पद्धति अपनाई गई, लेकिन वीवी गिरि और नीलम संजीव रेड्डी के चुनाव में घमासान हुआ। 2007 का निर्वाचन भी प्रीतिकर नहीं था। तब संप्रग ने अपने प्रत्याशी के महिला होने को प्रचार का हिस्सा बनाया। प्रतिभा पाटिल को लेकर तमाम समाचार भी छपे। वही हमारी राष्ट्रपति हुईं। राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों के बारे में आरोप-प्रत्यारोप उचित नहीं होते। राष्ट्रपति निंदा, आलोचना से परे होता है। चुनाव युद्ध में कही गई बातों के बावजूद विजयी प्रत्याशी समूचे राष्ट्र का महामहिम होता है। बेहतर यही है कि राष्ट्रपति सर्वानुमति का परिणाम हो। वह सबका है, उसे समूचे राजनीतिक दलतंत्र का समर्थन मिले और संपूर्ण जनगणमन का सम्मान।


लेखक हृदयनारायण दीक्षित उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं


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