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दूर-निकट के समय से सामना

Posted On: 19 Nov, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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बलदेव वंशी का नाम सामने आते ही सहसा भारत के संघ लोकसेवा आयोग के गेट पर भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के लिए चलाए गए सबसे लंबे धरने की याद आ जाती है, जिसे पुष्पेंद्र चौहान और राजकरण सिंह ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। बलदेव वंशी इस धरने के संस्थापक-अध्यक्ष रहते हुए कई बार गिरफ्तार किए गए। वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक तथा प्रख्यात कथाकार महीप सिंह सक्रिय रूप से धरने से जुड़े और समय-समय पर प्रभाष जोशी, विद्यानिवास मिश्र, कमलेश्वर और अच्युतानंद मिश्र जैसे लेखक-पत्रकार भी धरने पर बैठते रहे। अटलबिहारी वाजपेयी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, रामविलास पासवान आदि अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन द्वारा चलाए उस धरने पर बैठे थे। कहने का मतलब यह कि बलदेव वंशी कवि-लेखक के रूप में तो प्रतिष्ठित हैं ही, भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका निभा चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय कबीर सम्मेलन की अध्यक्षता भी उन्होंने की, जिसमें ज्ञानी जैल सिंह मुख्य अतिथि थे।


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कई देशों में जाकर हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ संत साहित्य के लिए दुनियाभर में धूनी रमाते फिरे। अपनी कविताओं से हिंदी का भंडार भरने का महत्वपूर्ण काम तो किया ही। उनका कविता समग्र तीन खंडों में छपा है, जिसका संपादन वरिष्ठ आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल ने किया है। कविता-समग्र के पहले खंड में दर्शकदीर्घा से, उपनगर में वापसी, अंधेरे के बावजूद, बच्चों की दुनिया, आत्मदान, कहीं कोई आवाज नहीं तथा एक दुनिया यह भी जैसे संग्रहों की कविताएं शामिल हैं तो दूसरे खंड में हवा में खिलखिलाती लौ, पानी के नीचे दहकती आग, खुशबू की दस्तक, सागर दर्शन, अंधेरे में राह दिखाती लौ, नदी पर खुलता द्वार, मन्यु, तथा इतिहास में आग जैसे संग्रहों की कविताएं संजोई गई हैं। तीसरे खंड में पत्थर तक जाग रहे हैं, धरती हांफ रही है, महाआकाश कथा, पूरा पाठ गलत तथा चाक पर चढ़ी माटी की कविताएं संग्रहीत हैं। बलदेव वंशी के 15 कविता संग्रहों की कविताओं के संकलन से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वंशी का जीवन कविता को समर्पित रहा है, जिसमें स्वातं˜योत्तर भारत के मनुष्य की तकलीफ, संघर्ष और संवेदना को हृदयग्राही अभिव्यक्ति मिली है। ये कविताएं एक तरफ दूर-निकट इतिहास के पात्र और परिवेश उठाकर समकालीन जीवन की संभावनाएं तलाशती हैं तो दूसरी तरफ मिथकों को उठाकर उनके जरिये अपनी बात अपने तरीके से कहने की कोशिश करती हैं।


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देश के समकालीन इतिहास में आपातकाल की काली यादें अब तक हमारा पीछा नहीं छोड़ रहीं। अब-तब विपक्षी दल सत्ता पर हमला करते हुए अघोषित आपातकाल का आरोप लगाकर जनता में आतंक जगा देते हैं। भारत ही नहीं, हर जगह का आदमी आजादी को अपने मनुष्य होने की पहली शर्त मानता है और उसके हरण से अधिक त्रासद उसके लिए कुछ नहीं होता। बलदेव वंशी का कविता संग्रह कहीं कोई आवाज नहीं इस संदर्भ में अक्सर आपातकाल की याद दिला जाता है। वंशी की कविताओं में निम्न और मध्य वर्ग की गहरी संवेदनाएं हैं। पचहत्तर पार के कवि बलदेव वंशी का जन्म मुल्तान में हुआ था। तय है कि विभाजन के समय उनसे उनका वतन छूट गया। शायद इसीलिए उजड़े हुए घरों से उखड़े लोगों की भूख-प्यास, तकलीफ और जिजीविषा के स्वर इनकी कविताओं में कुछ ज्यादा मुखर हैं। कविता समग्र के संपादक पालीवाल कहते हैं कि बलदेव वंशी को अज्ञेय का यह कथन हमेशा याद रहता है कि कविता तो शब्द में होती है और गद्य होता है भाषा में। कवि का काम शब्द का संस्कार करना है, क्योंकि शब्द ही स्मृति है, परंपरा है, इतिहास है, संस्कृति है, मिथक है, पुराण है। यह तो कवि का छूटा हुआ तीर है, जिसे समय की प्रत्यंचा ने आकर्ण तानकर छोड़ दिया है। बलदेव वंशी शब्द को कर्म से जोड़ने वाले सर्जक हैं।


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अभी हूं मैं/तार-तार कसा/पोर-पोर बंधा/तुम मुझे अपनी झन्नाहट भरी उंगलियों से छुओ/बजाओ/अपनी मौन धुन में सजाओ/ताकि मुक्त हो मैं तुम्हें गाऊं/तुम भी मेरे बंदी हो/मेरी लय में सज/तुम भी/मुक्त हो जाओ/अभी सिर्फ इतना करो/मुझे अपनी झन्नाहट भरी उंगलियों से छुओ! यह वंशी की वह मन:स्थिति है जब उन्होंने यह कविता लिखी होगा। उन्हें लगता है कि पचहत्तर पार भी वे इसी मन:स्थिति में हैं। एक नियति सापेक्ष स्थिति में, पर वे स्वीकार करते हैं कि संत साहित्य के अध्ययन ने उन्हें और उनके चिंतन को बदला, संवारा और गहरा करते हुए बड़ा संवेदनात्मक फलक दिया है। संतों की तो खासियत ही है कि अपने पास आए किसी भी मनुष्य को सीमित, छोटा और ओछा रहने ही नहीं देते। किसी भी प्रकार की विभेदक दीवारें, सीमाएं शेष नहीं रहतीं। किसी ग्रंथ, गुरु, संप्रदाय से न वे स्वयं बंधे होते हैं, न किसी को बंधे रहने देते हैं।


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इसलिए कह सकते हैं कि संतों की सोच, सरोकार, पहुंच और जीवनशैली मिलकर एक पृथक संस्कृति को आकार देती हैं, जबकि भक्त विशेष संप्रदाय और ग्रंथ से प्रतिबद्ध होते हैं। अपनी अप्रतिबद्धता के कारण वैष्णव और सूफी संत अपने धर्म-संप्रदाय में विद्रोही और क्रांतिकारी कहलाकर विरोध का शिकार होते रहे हैं।बलदेव वंशी अपने जीवन, कर्म और सृजन में कुछ-कुछ वैसे ही ठहरते हैं। अपने लिए उन्हें हमसे लेना नहीं है। देना था, हमें दे दिया और जब तक रहेंगे, देते रहेंगे, अपने शब्द, उनका सौंदर्य और संवेदना, जिसकी इस दुनिया को इन दिनों कुछ ज्यादा ही जरूरत है


लेखक-बलराम


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Tags:भारत, भाषा, प्रभाष जोशी, विद्यानिवास मिश्र, कमलेश्वर,अच्युतानंद मिश्र, कविता, सहित्य, इतिहास, India, Language, Prabhu Joshi, Vidyaniwas Mishra, Poetry, Literature, Journalism

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