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गरिमा गिराने वाला गतिरोध

Posted On: 1 Dec, 2011 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Subhash Kashyapरिटेल कारोबार में एफडीआइ और अन्य मसलों पर संसद में जारी गतिरोध को संसदीय व्यवस्था के लिए अशुभ मान रहे हैं सुभाष कश्यप


एक ऐसे समय जब संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी है और उन्हें पारित किया जाना है तब संसद में गतिरोध का जारी रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी स्थिति किसी भी संसदीय लोकतंत्र के लिए घातक है। यह सरकार और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वे संसद के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करें और सदन में गरिमापूर्ण व स्वस्थ बहस हो। हालांकि ताजा गतिरोध के लिए वास्तव में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार जिम्मेदार है, क्योंकि उसने एक बड़े नीति विषयक मामले पर विपक्ष से चर्चा किए बगैर ही न केवल एकतरफा फैसला ले लिया, बल्कि इसकी घोषणा भी संसद में करने की बजाय प्रेस के सामने की। इंग्लैंड में भी यह परंपरा है कि जब किसी बड़े नीतिगत मामले पर फैसला लिया जाता है, फिर वह चाहे विदेश अथवा सुरक्षा नीति से ही जुड़ा क्यों न हो तो प्रतिपक्ष के नेता और सदस्यों के साथ अनिवार्य रूप से विचार-विमर्श किया जाता है। यदि ऐसे मामलों में विपक्ष सहमत नहीं होता है तो सदन में बहस कराई जाती है और जरूरत होने पर मतदान होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष भी सरकार का एक अंग है, जिसका काम सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करना, उसे रोकने का प्रयास करना और रचनात्मक भूमिका निभाना होता है। इसलिए विपक्ष की मांगों को अनसुना करना, उसे बोलने न देना अथवा नीति निर्णय की प्रक्रिया में शामिल न करना एक गलत परंपरा होगी।


यदि विपक्ष एफडीआइ पर एकतरफा निर्णय लिए जाने के मामले में संसद में बहस के साथ-साथ मतदान चाहता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं, क्योंकि यह उसका संवैधानिक अधिकार और संसदीय कर्तव्य है। इस तरह की मांग का अधिकार संसद के सभी सदस्यों को है। ऐसे में सरकार यदि बहस और मतदान से बचना चाह रही है तो इसका एक ही अर्थ है कि उसके पास पर्याप्त बहुमत का अभाव है अथवा उसे सदन में अपने फैसले को पारित करा पाने का विश्वास नहीं है। दोनों ही स्थितियों में सरकार की भूमिका संदिग्ध और अनैतिक है। बेहतर यही होगा कि पिछले सात दिनों से जारी गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार पहल करे और विपक्ष को विश्वास में लेने की कोशिश करे। सरकार का यह बहाना भी ठीक नहीं होगा कि उसने सर्वदलीय बैठक बुलाकर हल तलाशने की कोशिश की है, इसलिए संसद के न चलने देने में उसका कोई दोष नहीं है। वास्तव में संसद को चलाना सरकार की जिम्मेदारी है और यदि संसद में गतिरोध जारी रहता है तो इसके लिए जवाब भी सत्ता पक्ष को ही देना होगा। यहां मसला दलगत राजनीति का नहीं, बल्कि संसदीय मर्यादाओं और परंपराओं का है।


जब कांग्रेस विपक्ष में थी तो उसने भी संसद को लंबे समय तक नहीं चलने दिया था और अब जब भाजपा विपक्ष में है तो वह भी यही कर रही है। संभवत: कोई भी इस पर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है कि जब भी संसद को हंगामे का केंद्र बनाया जाता है तो लोकतंत्र की इस सर्वोच्च संस्था का अवमूल्यन होता है। संसद के सम्मान को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है, लेकिन वे अपनी जिम्मेदारी समझने से इंकार कर रहे है। पूरा मसला व्यवस्था और परंपराओं का है, जिसे सभी को मानना चाहिए। आज टकराव सरकार और प्रतिपक्ष की संस्कृति का भी है। सरकार जहां विपक्ष के साथ अछूत जैसा व्यवहार कर रही है, एकतरफा निर्णय ले रही है और संसद में उसे अपनी बात रखने व सदस्यों को बोलने से रोक रही है वहीं विपक्ष भी रचनात्मक भूमिका निभा पाने में असफल हो रहा है, लेकिन ताजा संकट के लिए दोषी कोई व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि सरकार की वह संस्कृति है जिसमें प्रतिपक्ष को साथ लेने की आवश्यकता नहीं समझी जा रही और संसद के बजाय फैसलों को मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। यदि विपक्षी दल स्थगन प्रस्ताव की मांग करते हैं तो इससे सरकार को भागने अथवा बचने की जरूरत ही क्यों होनी चाहिए?


संसद के इस सत्र में लोकपाल समेत कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित किया जाना है। इस कारण संसद के गतिरोध के संदर्भ में कुछ लोगों की यह भी राय है कि गतिरोध जानबूझकर पैदा किया गया है ताकि इन विधेयकों के पारित न होने देने की जिम्मेदारी से राजनीतिक वर्ग बच सके। यह कहना मुश्किल है कि इस बारे में सच क्या है, लेकिन कुल मिलाकर नुकसान तो देश का और आम लोगों का हो रहा है। पूर्व में भी संसद को कई बार ठप किया जा चुका है और लंबे समय तक गतिरोध बने रहे हैं, लेकिन अब यह समस्या एक परंपरा का रूप लेती जा रही है, जो सही नहीं है।


अब यह स्पष्ट है कि प्रतिपक्ष और सरकार की संस्कृति में काफी बदलाव आ गया है और संसद पर सरकार का नियंत्रण धीरे-धीरे बढ़ रहा है। यही कारण है कि प्रतिपक्ष की परवाह किए बगैर सरकार अपने हिसाब से फैसले कर रही है और विरोध होने पर सर्वसम्मति से किसी निर्णय पर पहुंचने की बजाय हठधर्मिता का सहारा लिया जा रहा है। राष्ट्रहित के मामलों में दलगत हठधर्मिता की कोई जगह नहीं होती। मतभेद वाले विषयों पर सहमति बनाने का काम सरकार का है, जिसे फिलहाल वह नहीं निभा रही है। इसलिए मौजूदा गतिरोध को और ज्यादा लंबा खींचने की बजाय सरकार को चाहिए कि वह बहस और मतदान के लिए तैयार हो ताकि सही और गलत का फैसला संसद सदस्यों के मत के आधार पर हो सके। यहां सरकार की मंशा पर सवाल इसलिए भी उठते हैं, क्योंकि वह राजनीतिक प्रबंधन के उपायों का भी सहारा लेती नहीं दिख रही है।


यदि सरकार और विपक्ष अपनी-अपनी बातों पर अड़े रहते हैं तो इसका नतीजा संसदीय परंपरा के लिहाज से ठीक नहीं होगा। यह सही है कि कैबिनेट को किसी भी मामले में फैसला लेने का सर्वोच्च अधिकार है, लेकिन यहां यह नहीं भूला जाना चाहिए कि यदि किसी मसले पर संसद का बहुमत कैबिनेट के निर्णय के खिलाफ है तो इसे अंतिम स्वीकृति नहीं मिल सकती और न ही इसकी कोई वैधता होगी। बेहतर हो कि कोई भी फैसला सदन के भीतर हो, न कि सड़क पर। दुर्भाग्य से स्थिति कुछ ऐसी ही दिख रही है, जो किसी भी लिहाज से ठीक नहीं मानी जा सकती। संसद का बहुत दिनों तक ठप बने रहना न तो सरकार के हित में है, न विपक्ष के और न ही देश अथवा संसदीय लोकतंत्र के।


लेखक सुभाष कश्यप संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं


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