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हज सब्सिडी का औचित्य

Posted On: 10 May, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Imtiyaz Ahmadहज सब्सिडी खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रकाश डाल रहे हैं इम्तियाज अहमद


पंथनिरपेक्ष शासन में सरकार का यह उत्तरदायित्व नहीं बनता कि वह नागरिकों को उनके धार्मिक कर्मकांड अथवा परंपरा को पूरा करने के लिए आर्थिक सहायता दे। सरकार कर्मकांड के लिए सुविधाएं जैसे कानून व्यवस्था कायम रखने, लोगों को जनसुविधाएं उपलब्ध कराने और यातायात के लिए सड़क आदि बनाने में तो सार्वजनिक धन का इस्तेमाल कर सकती है, लेकिन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से कर्मकांड के लिए उस धन का इस्तेमाल नहीं कर सकती। ऐसा करने से विवादग्रस्त परिस्थिति पैदा हो हो सकती है और यह पंथनिरपेक्षता पर आघात भी होगा। हमारे देश में लंबे अर्से से सार्वजनिक नीति में पंथनिरपेक्षता के मौलिक सिद्धांत स्थान पाते रहे हैं। सरकार मुसलमान नागरिकों को मक्का में हज यात्रा के लिए सब्सिडी देती रही है। कुछ राज्यों में सरकारें नागरिकों को अमरनाथ या सूरजकुंड की तीर्थयात्रा के लिए नकद मदद देती रही हैं। हिंदू नागरिकों को दी जाने वाली सहायता छोटी होती है, इसलिए वह कभी विवाद का विषय नहीं बनी, जबकि हज सब्सिडी की रकम अधिक होने के कारण पिछले कुछ समय से यह मुद्दा विवादों में घिरा हुआ है। हज सब्सिडी के बारे में बहुत सी गलतफहमियां फैली हैं।


क्या हज पर भी गर्माएगी सियासत !!


आम लोग समझते हैं कि हज सब्सिडी हजयात्रियों को सीधे तौर पर नकदी के रूप में दी जाती है। सब्सिडी का बड़ा हिस्सा हवाई कंपनियों और खासतौर से सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया को बड़े पैमाने पर हजयात्रियों को जेद्दा ले जाने और वापस लाने के लिए किराये में राहत के रूप में दिया जाता है। सरकार का यह तर्क गलत नहीं है कि हज सब्सिडी उस बंदोबस्त का हिस्सा है जो यात्रियों की हज यात्रा के लिए जरूरी है। इसी कारण उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में यह नहीं कहा कि हज सब्सिडी असंवैधानिक है। उसका आदेश है कि जिन परिस्थितियों में हज सब्सिडी देने की परंपरा शुरू हुई थी, वे आज बदल गई हैं। इसलिए आज हज सब्सिडी की कोई जरूरत नहीं रह गई है और धीरे-धीरे सरकार को आने वाले दशक में इसे समाप्त कर देना चाहिए। एक समय था जब हवाई सफर की सुविधा थी ही नहीं। लोग आम तौर पर पानी के जहाज से हज करने जाया करते थे। आम लोग यात्रा के लिए अपना राशन-पानी साथ लेकर जाते थे ताकि सफर के दौरान खाना पका सकें। जब हवाई सफर की गुंजाइश पैदा हुई तो लोगों ने हवाई जहाज से हज के लिए जाना शुरू किया।


हालांकि गरीब यात्री इसके बाद भी लंबे समय तक पानी के जहाज से ही सफर करते रहे। उस समय की दरों पर हवाई सफर अत्यंत महंगा था और सुविधा इतनी विकसित भी नहीं थी कि हज करने के इच्छुक सभी यात्रियों को हज पर ले जाया जा सके। तब सरकारी हवाई कंपनी (उस समय एयर इंडिया एकमात्र कंपनी थी) की यात्रियों को ले जाने-लाने की क्षमता सीमित थी। इस कठिनाई पर काबू पाने के लिए हज सब्सिडी दी जानी शुरू हुई। आज हवाई सफर की सुविधाओं का बड़े पैमाने पर विकास हुआ है। इस क्षेत्र में बहुत सी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां परिचालन कर रही हैं। साथ-साथ टिकट की दरें भी पहले की अपेक्षा कम हो गई हैं। उस समय की दरों के अनुसार हवाई टिकटों की दरों में 20 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आई है। इसलिए आज की तारीख में सब्सिडी देने की नीति का कोई तार्किक आधार नहीं बनता। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में जो कहा वह सरकार को स्वयं करना चाहिए था। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो उसका कारण राजनीतिक था, आर्थिक नहीं। भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी है। सरकार आम मुसलमान की नाराजगी से बचने के लिए फैसला नहीं ले रही थी। सत्तारूढ़ दल को अंदेशा था कि हज सब्सिडी के खिलाफ फैसला लेने का उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा। इस कारण वह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह दबाए बचती रही। न्यायालय का निर्णय सरकार को बाध्य करेगा कि वह हज सब्सिडी देने की नीति का पुन: अवलोकन करे। पिछले 20 वर्षो में मुसलमान समुदाय और समाज में व्यापक परिवर्तन आया है। एक मध्यम वर्ग पैदा हुआ है। देश के बाकी सभी नागरिकों की तरह उसके पास भी पैसा आया है, जिसे वह खर्च भी करना चाहता है। जब किसी समुदाय में आर्थिक गतिशीलता आती है तो वह सबसे पहले धार्मिक यात्राओं पर खर्च करता है।


मुस्लिम समुदाय में भी दो दशकों से यही प्रवृत्ति नजर आ रही है। मुसलमान बड़े पैमाने पर देश भर में पवित्र स्थलों की यात्रा कर रहे हैं ताकि समुदाय के भीतर उनकी प्रतिष्ठा बढ़े। न तो वे सब्सिडी की परवाह करते हैं और न ही केवल एयर इंडिया से सफर करते हैं। इसी कारण उमरा और हज के लिए ले जाने वाली तमाम निजी कंपनियां मुसलमान के मोहल्लों में जगह-जगह शिविर लगा रही हैं। मध्यम वर्ग का मुसलमान इन्हीं कंपनियों से यात्रा पैकेज लेकर उमरा और हज करता है। यदि सब्सिडी दिए जाने की नीति खत्म होगी तो इस वर्ग के मुसलमानों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हां मुसलमानों का एक बड़ा तबका गरीब है, जिसके पास इतना पैसा नहीं है कि वह हज यात्रा का खर्च उठा सके। हज सब्सिडी को खत्म करने से उस पर अवश्य असर पड़ेगा। बेहतर होता कि न्यायालय हज सब्सिडी को बिल्कुल खत्म करने की जगह उसे सामाजिक-आर्थिक दशा से जोड़ता। यह कहा जा सकता था कि बहुत गरीब मुसलमान के सफर के लिए हवाई कंपनी को सब्सिडी दी जाएगी।


शायद इस प्रकार की नीति को लागू करने में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए ही न्यायालय ने सब्सिडी पूरी तरह खत्म करने का आदेश दिया है। पिछले दो दशकों में मुस्लिम समाज में गतिशीलता तो आई है, लेकिन अभी भी एक बहुत बड़ा तबका गरीब है। न्यायालय ने कहा है कि सब्सिडी पर जो खर्च आता है उसे मुसलमानों में शिक्षा फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाए। सब्सिडी बंद करने से जो राशि बचेगी उसे ऐसी योजनाओं के लिए इस्तेमाल करना अच्छा होगा जिनसे मुसलमानों कीआर्थिक परिस्थितियों में सुधार लाया जा सके। किसी संपन्न देश में आवश्यकता होती है कि सभी समुदाय सामान्य रूप से संपन्नता में भागीदारी का हक ले सकें। आर्थिक विकास उसकी पहली कड़ी हो।


लेखक इम्तियाज अहमद प्रख्यात समाजशास्त्री हैं


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