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मदरसों की प्रासंगिकता

Posted On: 10 Apr, 2012 Others में

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Balbir Punjराजनीति में प्रचलित सेक्युलरवाद को मुस्लिम कट्टरपंथ के पोषण का पर्याय बनते देख रहे हैं बलबीर पुंज


सेक्युलरिज्म के नाम पर तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दल देश में इस्लामी कट्टरवाद को कब तक बढ़ाते रहेंगे? वोट बैंक से प्रेरित इस कुत्सित सांप्रदायिकता के विष का देश के शरीर और आत्मा पर क्या प्रभाव होगा? हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच इस्लामी वोट बैंक को हासिल करने की प्रतिस्पद्र्धा थी। उस दौड़ में समाजवादी पार्टी बाजी मार गई और शायद उसी से प्रेरणा लेकर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने हाल ही में राज्य के करीब तीस हजार से अधिक इमामों को सम्मान के तौर पर हर महीने 2500 रुपये देने की घोषणा की है। इसके साथ ही उन्होंने इमामों को निजी घर बनाने के लिए सरकार की ओर से भूमि देने और भवन निर्माण के लिए आर्थिक सहायता देने के अलावा सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू करने की भी घोषणा की है। ममता बनर्जी ने इमामों को खुश करने के साथ ही अल्पसंख्यकों के लिए बीस हजार घर बनाने, अल्पसंख्यकों के रोजगार के लिए रोजगार बैंक स्थापित करने और उनकी शिक्षा के लिए मदरसों की स्थापना की घोषणा भी की है। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय खोलने का भी एलान किया है। इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए एक टास्क फोर्स गठित करने का भी वादा किया गया है। इधर दिल्ली में नगर निगम के चुनाव सिर पर हैं, इसलिए मुस्लिम वोट बैंक के लिए सेक्युलर दलों में मारामारी स्वाभाविक है।


पिछले दिनों दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल ने मुस्लिम मतदाताओं को एकमुश्त मतदान करने की अपील करते हुए यह समझाने की कोशिश की कि मुस्लिमों का वोट बंटने से उनके हित भी प्रभावित होते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ऐसी क्षुद्र मानसिकता के रहते सामाजिक समरसता और समाज के समेकित विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है? सच तो यह है कि भारत में प्रचलित सेक्युलरवाद मुस्लिम कट्टरपंथ के पोषण का पर्याय बन गया है। प्राय: सभी सेक्युलर दल मदरसा शिक्षा के प्रबल समर्थक और पोषक हैं। क्या आज की बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था वाले दौर में उर्दू-फारसी की तालीम के बल पर कोई प्रतिस्पद्र्धा में खड़ा रह सकता है? जहां तक मदरसों का संबंध दीनी तालीम से है, किसी को इस पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती, किंतु गणित, अंग्रेजी, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कंप्यूटर आदि से वंचित मदरसों का पाठ्यक्रम मुख्यधारा वाले विद्यालयों व उससे शिक्षित छात्रों का मुकाबला कैसे कर सकता है? दूसरा, मदरसा शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी खामी यह भी है कि मदरसों के छात्रों का संपर्क केवल मुसलमान बच्चों के साथ होता है। प्रारंभिक परवरिश में ही बाहरी दुनिया से कटाव उन्हें दूसरे समुदाय के आचार-विचार और जीवनदर्शन से अपरिचित रखता है।


मुसलमान बच्चे केवल मुसलमान बच्चों के ही संपर्क में रहेंगे तो स्वाभाविक तौर पर उनका दृष्टिकोण और भाषा शेष समाज से अलग होगी। उनकी मुस्लिम पहचान भारतीय पहचान से बड़ी हो जाएगी। देश के नागरिकों की कई पहचान हो सकती है, किंतु उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी राष्ट्रीयता से है, उसकी भारतीयता से है। यह पहचान जब उपेक्षित होगी तो स्वाभाविक तौर पर कई प्रश्न खड़े होंगे। मुसलमानों में शिक्षा का अभाव है और उनके लिए रोजगार के अवसर कम हैं। इसके लिए उनके प्रति बहुसंख्यकों द्वारा भेदभाव बरते जाने का आरोप भी लगाया जाता है। यदि यह सत्य होता तो मुस्लिम समुदाय के जो लोग अपनी प्रतिभा के बल पर शिखर पर हैं उन्हें वह सम्मान और कद कैसे मिल पाया? सिनेमा, कला, खेल, व्यवसाय आदि कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां मुस्लिम समुदाय के लोग शिखर पर हैं, किंतु कोई मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए मदरसा शिक्षा व्यवस्था को दोषी नहीं ठहराता। सेक्युलरिस्ट पिछड़ चुके मुस्लिम समाज को आगे लाने के लिए आरक्षण की पैरवी करते हैं। इससे मुस्लिम समाज का भला हो या नहीं हो, किंतु यह देश के लिए घातक होगा और देश को इसका अनुभव भी है। मजहब के आधार पर आरक्षण देना संविधान के विरुद्ध है। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मजहब के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था ने ही अंतत: देश के रक्तरंजित विभाजन की नींव रखी थी।


दलितों-वंचितों को आरक्षण की व्यवस्था उनके साथ किए गए सदियों के भेदभाव का परिमार्जन है और बहुसंख्यक समाज ने इसे अपनी कीमत पर सहर्ष स्वीकार भी किया, किंतु मुसलमानों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। यह मानना कि भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, झूठ है। सच्चाई तो यह है कि वे इस देश में दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यक हैं। दूसरी सच्चाई यह भी है कि मुसलमान इस देश में करीब छह सौ साल तक शासक की भूमिका में रहे, जब उन्हें समाज के अन्य वगरें की अपेक्षा ज्यादा अवसर और अधिकार प्राप्त थे। मुस्लिमों को नौकरी में आरक्षण देने की पैरवी करने वालों का तर्क है कि उनकी आबादी (13.5 प्रतिशत) की तुलना में आइएएस जैसे उच्च प्रशासनिक पदों पर उनकी भागीदारी चार प्रतिशत से भी कम है। उनका कुतर्कहै कि ऐसा उनके साथ भेदभाव किए जाने के कारण हुआ है। भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी पाने के लिए स्नातक होना अनिवार्य है, जबकि स्वयं रंगनाथ मिश्रा आयोग की रपट में स्नातक मुस्लिमों का अनुपात केवल 3.6 प्रतिशत बताया गया है। पश्चिम बंगाल के 30 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे प्राइमरी शिक्षा से भी वंचित हैं।


राजनीति की विचित्र करवट


प्राथमिक शिक्षा के लिए नाम लिखवाने वाले 50 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे प्राइमरी शिक्षा तक पूरी नहीं कर पाते। शेष 50 प्रतिशत में से केवल 12 प्रतिशत मुस्लिम छात्र ही मैट्रिकुलेशन पास कर पाते हैं। यह मुसलमानों के साथ किसी भेदभाव का परिणाम नहीं है। मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक प्रगति, समाज में समरसता और देश के सभी मजहबों में राष्ट्रभाव समान रूप से हो, इसके लिए जरूरी है कि मदरसे खुद को दीनी तालीम तक सीमित रखें और उनका वित्त पोषण मुस्लिम समाज खुद करे। एक सेक्युलर देश किसी खास मजहब के प्रचार तंत्र या शिक्षा प्रणाली का वित्त पोषण क्यों करे? समाज के दूसरे तबके से होड़ लेने के लिए मुस्लिम बच्चों को देश की मुख्यधारा वाले स्कूलों में जाने का अवसर प्रदान किया जाए। मदरसों का वित्तपोषण करके, इमामों-मौलवियों को आर्थिक संबल देकर या मुस्लिम समाज को मजहब के आधार पर आरक्षण की बैसाखी पकड़ा कर उनके उत्थान की कल्पना बेमानी है।


लेखक बलबीर पुंज भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं


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